भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६८ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुई वहाँ राधिकाकी वेश-भूषा सँवारकर बड़े हर्षके साथ आगे बढ़ीं। मार्गमें बारंबार वे हरि-नामका जप करती थीं। वृन्दावनमें पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँका दृश्य स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमाकी किरणें उस वनप्रान्तको अनुरञ्जित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमोंसे अलंकृत तथा फूलोंको छूकर प्रवाहित होनेवाली मलयवायुसे सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियोंके प्रेमभावको जगानेवाला और मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाला था। उन सबको वहाँ कोकिलोंकी मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरोंका अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुञ्जारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियोंके साथ रह फूलोंका मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे।

तदनन्तर शुभ वेलामें सम्पूर्ण सखियोंके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करके श्रीराधिकाने रासमण्डलमें प्रवेश किया। राधाको अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेमसे मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेमसे आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियोंके बीचमें रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर दिव्य वस्त्रोंके परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवनसे श्यामसुन्दरकी ओर देखती हुई गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेश-भूषा, नयी अवस्था तथा रूपसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं। वे मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। उनकी अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे सिरपर मालतीकी मालासे युक्त वेणीका भार वहन करती थीं।

श्रीराधाने भी किशोर अवस्थासे युक्त श्यामसुन्दरकी ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थे। करोड़ों कामदेवोंकी लावण्यलीलाके मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनोंसे उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिकाको देख रहे थे। उनके परम अद्भुत रूपकी कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रोंके कोणसे बार-बार प्रीतमकी ओर देख-देखकर सती राधाने लज्जावश मुखको आँचलसे ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभावका उद्दीपन होनेसे उनके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिकाका परस्पर प्रेम-शृङ्गार हुआ।

मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप-विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण—ये अठारह लाख गोपी-कृष्ण रासमण्डलमें परस्पर मिले। नारद! वहाँ कङ्कणों, किङ्किणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्न-निर्मित नूपुरोंकी सम्मिलित झनकार कुछ कालतक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थलमें रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जलमें उतरे और वहाँ जल-क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँसे निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पणमें अपना-अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी मधुर-मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे।

फिर पवित्र उद्यानके निर्जन प्रदेशमें सरोवरके रमणीय तटपर जहाँ बाहर चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा था, जहाँकी भूमि पुष्प और चन्दनसे चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दनसे सम्पृक्त मलय-समीरद्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ नर-कोकिलोंकी मधुर काकली कानोंमें पड़ रही थी; योगियोंके परम गुरु