ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७१
चरणकमलोंमें पड़ गये और श्रीराधा तथा गोविन्द दोनोंके सामने ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। उनका शरीर भगवान्के पाद-पद्मोंके समीप गिर पड़ा और उससे प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान उनका तेज ऊपरको उठा। वह सात ताड़के बराबर ऊँचा उठकर भगवान्के चारों तरफ घूमकर पुनः उनके चरणोंमें गिरा और वहीं विलीन हो गया।
जो प्रातःकाल उठकर अष्टावक्रद्वारा किये गये स्तोत्रका पाठ करता है, वह परम निर्वाणरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। नारद! यह स्तोत्रराज मुमुक्षुजनोंके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। श्रीहरिने पहले इसे वैकुण्ठधाममें भगवान् शंकरको दिया था। (अध्याय २९)
भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय
नारदजीने पूछा—ब्रह्मन् ! (नारायणदेव !) उन महामुनिका कौन-सा अद्भुत रहस्य सुना गया ? मुनि अष्टावक्रके देह-त्यागके पश्चात् भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने क्या किया ?
भगवान् श्रीनारायण बोले—मुनिको मरा देख भगवान् श्रीकृष्ण उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेको उद्यत हुए। महात्मा अष्टावक्रका वह रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे हीन शरीर साठ हजार वर्षोंतक निराहार रहा; अतः प्रज्वलित हुई जठराग्निने उस शरीरके रक्त, मांस तथा हड्डियोंको दग्ध कर दिया था। मुनिका चित्त श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा था; अतः उन्हें बाह्य ज्ञान बिलकुल नहीं रह गया था। मधुसूदन श्रीकृष्णने चन्दन-काष्ठकी चिता बनाकर उसमें अग्निसम्बन्धी कार्य (संस्कार) किया और फिर शोक-लीला करते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे मुनिके शवको उस चितापर स्थापित कर दिया। तदनन्तर शवके ऊपर भी काठ रखकर चितामें आग लगा दी। मुनिका शरीर जलकर भस्म हो गया। आकाशमें देवता दुन्दुभियाँ बजाने लगे और तत्काल ही वहाँसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। इसी बीच वहाँ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाला तथा वस्त्रों और पुष्पहारोंसे अलंकृत एक सुन्दर विमान गोलोकसे उतरा और श्रीहरिके सामने प्रकट हो गया। उसमें श्रीकृष्णके समान ही रूप और वेश-भूषावाले श्रेष्ठ पार्षद विराजमान थे। वे उत्तम पार्षद तत्काल ही विमानसे उतर गये। उन सबके आकार श्रीकृष्णसे मिलते-जुलते थे। उन्होंने राधिका और श्यामसुन्दरको प्रणाम करके सूक्ष्म-देहधारी मुनीश्वर अष्टावक्रको भी मस्तक झुकाया और उन्हें उस विमानपर बिठाकर वे उत्तम गोलोकधामको चले गये। मुनीन्द्र अष्टावक्रके गोलोकधामको चले जानेपर वृन्दावनविनोदिनी साध्वी राधाने चकित हो जगदीश्वर श्रीकृष्णसे पूछा।
श्रीराधिका बोलीं—नाथ ! ये मुनिश्रेष्ठ कौन थे, जिनके समस्त अङ्ग ही टेढ़े-मेढ़े थे ? ये बहुत ही नाटे थे। इनके शरीरका रंग काला था और ये देखनेमें अत्यन्त कुत्सित होनेपर भी बड़े तेजस्वी जान पड़ते थे। उनका जो प्रज्वलित अग्निके समान तेज था, वह साक्षात् आपके चरणारविन्दमें विलीन हो गया। वे कितने पुण्यात्मा थे कि तत्काल विमानमें बैठकर गोलोकधामको चले गये और उन स्वात्माराम मुनिके लिये आपको भी रोना आ गया। प्रभो ! आपने अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे इनका सत्कार किया है; अतः मैंने जो कुछ पूछा है, वह सारा विवरण शीघ्र ही विस्तारपूर्वक बताइये।