भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७९


गङ्गाकी जो धारा पाताललोकको जाती है, उसका नाम भोगवती है। वह सदा दुग्ध-फेनके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। अमूल्य रत्नों तथा श्रेष्ठ मणियोंकी वह सदा खान बनी रहती है। सुस्थिर यौवनवाली नागकन्याएँ उसके तटपर सदा ही क्रीड़ा करती हैं। स्वयं देवी गङ्गा वैकुण्ठको चारों ओरसे घेरकर सदा प्रवाहित होती रहती हैं। मेरी इस पुत्रीका विनाश प्रलयकालमें भी नहीं होता। उसका परम मनोहर दिव्य तट नाना रत्नोंकी खान है। इस प्रकार गङ्गाके जन्मका सारा पुण्यदायक प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया। अब ब्रह्माजीको मोहिनीके शापसे किस प्रकार छुटकारा मिला, यह सुनो।

(अध्याय ३४)


गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— प्रिये! तदनन्तर सबने गङ्गाको देखकर मेरी माया मानी। उस समय नारायणने कृपापूर्वक ब्रह्माजीसे कहा।

श्रीनारायण बोले— चतुर्मुख! उठो, जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हें शाप लगा है; अतः मेरी आज्ञासे इस गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो जाओ। यद्यपि तुम स्वयं पवित्र हो और वे समस्त तीर्थ तुम वैष्णवपतिका स्पर्श प्राप्त करना चाहते हैं, तथापि प्रकृतिकी अवहेलना करने (हँसी उड़ाने)-से तुम्हें शाप मिला है। अहंकार सभीके लिये पापोंका बीज और अमङ्गलकारी होता है। तुम शीघ्र मेरे परात्पर धाम गोलोकको जाओ। वहाँ प्रकृतिकी अंशरूपा मङ्गलदायिनी भारतीको पाओगे। कल्याण-सृष्टिकी बीजरूपिणी प्रकृतिको अपनाओ। अहो! तुमने एक कल्पतक तप किया है तो भी इस समय एक अप्सराके शापसे कोई भी तुम्हारे मन्त्रको नहीं ग्रहण करते हैं। अन्य देवताओंकी पूजामें भी तुम्हारी ही पूजा होगी; क्योंकि तुम्हीं जगत्के धारण-पोषण करनेवाले, स्वात्माराम, सर्वरूपी तथा सब ओर समस्त देहोंमें पूजास्वरूप हो।

उस समय मेरी आज्ञा मानकर जगद्गुरु ब्रह्माने गङ्गाके जलमें स्नान किया और मुझे प्रणाम करके वे शीघ्र ही गोलोकको चले गये। फिर समस्त देवता और मुनि भी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। वे बारंबार मेरे परम निर्मल यशका गान कर रहे थे। ब्रह्माजीने गोलोकमें जाकर मेरे मुखारविन्दसे निर्गत, सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी सती भारतीको प्राप्त किया। वागीश्वरी भारतीको पाकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन त्रिभुवनमोहिनी देवीको प्राप्त करके मुझे प्रणाम करनेके अनन्तर वे लौट आये। ब्रह्मलोकके निवासियोंने उन भारतीदेवीको देखा। वे कौतूहलसे भरी हुई, परम सुन्दरी, रमणीया तथा श्वेतवर्णा थीं। उनके मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैल रही थी। मुख शरद् ऋतुके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान जान पड़ते थे। दीप्तिमान् ओष्ठ और अधरपल्लव पके बिम्बफलकी प्रभाको छीने लेते थे। मुक्तापंक्तिकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्तियोंसे उनके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। रत्ननिर्मित केयूर-कंगन हाथोंकी और रत्नोंके नूपुर चरणोंकी शोभा बढ़ाते थे। रत्नमय युगल कुण्डलोंसे कानोंके नीचेके भाग झलमला रहे थे।