भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 591

··· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८१

जाय।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर जाते हुए भगवान् शिवके पीछे वह दैत्यराज दौड़ा। फिर तो मृत्युञ्जय शंकर मृत्युके भयसे त्रस्त होकर भागे। उनका डमरू गिर पड़ा। मनोहर व्याघ्रचर्मकी भी यही दशा हुई। वे दिगम्बर होकर दानवके भयसे दसों दिशाओंमें भागने लगे। वे चाहते तो उसे मार डालते; परंतु भक्तवत्सल जो ठहरे। अतः भक्तपर कृपा करके उसे मारते नहीं थे। साधु पुरुष दुष्टके अनुसार बर्ताव कदापि नहीं करते हैं। भगवान् शिव उसे समझा भी न सके। उन्होंने कृपापूर्वक उसे अपना स्वरूप ही माना; क्योंकि उनकी सर्वत्र समान दृष्टि थी। शिव उसे अपनी मृत्यु मानकर भयभीत हो उठे। उनका अहंकार गल गया। भद्रे! मुझे याद करते हुए उन्होंने मेरी ही शरण ली। उस समय मुझे अपने आश्रमपर आते देख उन्हें कुछ धैर्य मिला। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वे भयसे विह्वल हो 'हे हरे! रक्षा करो, रक्षा करो'— इसका जप कर रहे थे। तब मैंने उस दैत्यको अपने पास बिठाकर समझाया और सब समाचार पूछा। पूछनेपर उसने सब बातें क्रमशः बतायीं। उस समय मेरी आज्ञासे वह असुर तुरंत मायाद्वारा ठगा गया। (मैंने उसको यह कहकर मोहमें डाल दिया कि तुम अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा तो करो कि यह बात सत्य है या नहीं।) उसने अपने मस्तकपर हाथ रखा और तत्काल जलकर भस्म हो गया। तब सिद्ध, सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और मनु प्रसन्नतापूर्वक उत्तम भक्तिभावसे मेरी स्तुति करने लगे और शिवजी लज्जित हो गये। उनका गर्व चूर्ण हो गया। फिर मैंने उन्हें समझाया और वे अपने स्थानको गये।

इसी तरह गर्वमें भरे हुए रुद्र भयानक असुर त्रिपुरका वध करनेके लिये गये। वे मन-ही-मन यह समझकर कि 'मैं तो समस्त लोकोंका संहारक हूँ, फिर मेरे सामने इस पतिंगेके समान दैत्यकी क्या बिसात है?' युद्धक्षेत्रमें गये। उस समय उन्होंने मेरे दिये हुए त्रिशूल तथा श्रेष्ठ कवचको साथ नहीं लिया था। उनका त्रिपुरके साथ एक वर्षतक दिन-रात युद्ध होता रहा; किंतु कोई भी किसीपर विजय नहीं पा सका। समराङ्गणमें दोनों समान सिद्ध हुए। प्रिये! पृथ्वीपर युद्ध करके दैत्यराज मायासे बहुत ऊँचाईपर पचास करोड़ योजन ऊपर उठ गया। साथ ही विश्वनाथ शंकर भी उस दैत्यका वध करनेके लिये तत्काल ऊपरको उठे। वहाँ निराधार स्थानपर एक मासतक युद्ध चलता रहा। भयानक संग्राम हुआ। अन्तमें शिवको उठाकर उस दैत्यने भूतलपर दे मारा। रथसहित रुद्रके धराशायी हो जानेपर देवर्षिगण भयभीत हो मेरी स्तुति करने लगे और बार-बार बोले—'श्रीकृष्ण! रक्षा करो, रक्षा करो।' भयका कारण उपस्थित हुआ जान शिवने निर्भयतापूर्वक मेरा ही स्मरण किया। उन्होंने संकटकालमें मेरे ही दिये हुए स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया। उस समय अपनी कलाद्वारा शीघ्र ही वृषभरूप धारण करके मैंने सोते शंकरको सींगोंसे उठाया और उन्हें अपना कवच तथा शत्रुर्मदन शूल दिया। उसे पाकर उन्होंने दानवोंके उस अत्यन्त ऊँचे स्थान त्रिपुरको, जो आकाशमें निराधार टिका हुआ था, मेरे दिये हुए शूलसे नष्ट कर दिया। इसके बाद शिवने मुझ दर्पहन्ताका ही बारंबार लज्जापूर्वक स्तवन किया। दैत्यराज त्रिपुर उसी क्षण चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देख सब देवता और मुनि प्रसन्नतापूर्वक शिवजीकी स्तुति करने लगे। तबसे भगवान् शंकरने विघ्नके बीजस्वरूप दर्पको त्याग दिया। वे ज्ञानानन्दस्वरूपसे स्थित हो सब कर्मोंमें निर्लिप्तभावसे संलग्न रहने लगे। तदनन्तर मैं अपने प्रिय भक्त शंकरको वृषरूपसे पीठपर वहन करने लगा; क्योंकि तीनों लोकोंमें शिवसे बढ़कर प्रियतम मेरे लिये दूसरा