भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८३ प्रेम-विह्वल हो महाभक्त शिव रोने लगे। उन्होंने सोचा, सहस्रमुख शेषनाग तथा चतुर्मुख ब्रह्मा बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने बहुसंख्यक नेत्रोंसे भगवान्‌के मनोहर रूपका दर्शन करके अनेक मुखोंसे उनकी स्तुति की है। मैं ऐसे स्वामीको पाकर दो ही नेत्रोंसे इनके रूपको क्या देखूँ और एक ही मुखसे इनकी क्या स्तुति करूँ? इस बातको उन्होंने चार बार दोहराया। तपस्वी शंकरके मन-ही-मन इस प्रकार संकल्प करनेपर उनके चार मुख और प्रकट हो गये तथा पहलेके मुखको लेकर पञ्चम संख्याकी ही पूर्ति हो गयी। उनका एक-एक मुख तीन-तीन नेत्रोंसे सुशोभित होने लगा; इसलिये वे पञ्चमुख और त्रिलोचन नामसे प्रसिद्ध हुए। शिवकी स्तुतिकी अपेक्षा मेरे रूपके दर्शनमें ही अधिक प्रेम है; इसलिये उनके नेत्र ही अधिक प्रकट हुए। उन ब्रह्मस्वरूप शिवके वे तीन नेत्र सत्त्व, रज तथा तम नामक तीन गुणरूप हैं; इसका कारण सुनो। भगवान् शिव सात्त्विक अंशवाली दृष्टिसे देखते हुए सात्त्विक जनोंकी, राजस दृष्टिसे राजसिक लोगोंकी तथा तामस दृष्टिसे तमोगुणी लोगोंकी रक्षा करते हैं। संहारकर्ता हरके ललाटवर्ती तामस नेत्रसे पीछे चलकर संहारकालमें क्रोधपूर्वक संवर्तक अग्निका आविर्भाव होता है। वे अग्निदेव करोड़ों ताड़ोंके बराबर ऊँचे, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा विशाल लपटोंसे युक्त हो अपनी जीभ लपलपाते हुए तीनों लोकोंको दग्ध कर देनेमें समर्थ हैं। भगवान् शंकर सतीके दाह-संस्कारजनित भस्मको लेकर अपने अङ्गोंमें मलते हैं। इसलिये 'विभूतिधारी' कहे जाते हैं। सतीके प्रति प्रेमभावके कारण ही वे उनकी हड्डियोंकी माला और भस्म धारण करते हैं। यद्यपि शिव स्वात्माराम हैं, तथापि उन्होंने पूरे एक सालतक सतीके शवको लेकर चारों ओर घूमते हुए रोदन किया था। सतीका एक-एक अङ्ग जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ- वहाँ सिद्धपीठ हो गया, जो मन्त्रोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। राधिके! तदनन्तर अवशिष्ट शवको छातीसे लगाकर वे मूर्च्छित हो सिद्धक्षेत्रमें गिर पड़े। तब मैंने महेश्वरके पास जा उन्हें गोदमें ले सचेत किया और शोकको हर लेनेवाले परम उत्तम दिव्य तत्त्वका उपदेश दिया। उस समय शिव संतुष्ट हो अपने लोकको पधारे और अपनी ही दूसरी मूर्ति कालके द्वारा उन्होंने अपनी प्रिया सतीको प्राप्त कर लिया। वे योगस्थ होनेके कारण दिगम्बर हैं। उन नित्य परमेश्वरमें इच्छाका सर्वथा अभाव है। उनके सिरपर जो जटाएँ हैं, वे तपस्या-कालकी हैं, जिन्हें वे आज भी विवेकपूर्वक धारण करते हैं। योगीको केशोंका संस्कार करने (बालोंको सँवारने) तथा शरीरको वेश-भूषासे विभूषित करनेकी इच्छा नहीं होती। उसका चन्दन और कीचड़में तथा मिट्टीके ढेले और श्रेष्ठ मणिरत्नमें भी समभाव होता है। गरुड़से द्वेष रखनेवाले सर्प भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्हीं शरणागतोंको वे कृपापूर्वक अपने शरीरमें धारण करते हैं। उनका वृषभरूप वाहन तो मैं स्वयं हूँ। दूसरा कोई भी उनका भार वहन करनेमें समर्थ नहीं है। पूर्वकालमें त्रिपुरके वधके समय मेरे कलांशसे उस वृषभकी उत्पत्ति हुई। पारिजात आदि पुष्प तथा चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ वे शिव मुझको अर्पित कर चुके हैं; इसलिये उनमें उनकी कभी प्रीति नहीं होती। धतूर, बिल्वपत्र, बिल्व-काष्ठका अनुलेपन, गन्धहीन पुष्प तथा व्याघ्रचर्म योगियोंको अभीष्ट हैं। इसलिये उनमें उनकी सदा प्रीति रहती है। दिव्य लोकमें, दिव्य शय्यामें और जनसमुदायमें उनका मन नहीं लगता है; इसलिये वे अत्यन्त एकान्त श्मशानमें रहकर दिन-रात मेरा ध्यान किया करते हैं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त प्रत्येक प्राणीको भगवान् शिव समान समझते हैं। केवल मेरे इस अनिर्वचनीय रूपमें ही उनका मन निरन्तर लगा