ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण रहता है। ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भी शूलपाणि शंकरका क्षय नहीं होता। उनकी आयुका प्रमाण मैं भी नहीं जानता, फिर श्रुति क्या जानेगी ? मृत्युञ्जय शिव ज्ञानस्वरूप हैं। वे मेरे तेजके समान शूल धारण करते हैं। मेरे बिना कोई भी शंकरको जीत नहीं सकता। शंकर मेरे परम आत्मा हैं। शिव मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हैं। उन त्रिलोचनमें मेरा मन सदा लगा रहता है। भगवान् भवसे बढ़कर मेरा प्रिय और कोई नहीं है। राधे ! मैं गोलोक और वैकुण्ठमें नहीं रहता। तुम्हारे वक्षमें भी वास नहीं करता। मैं तो सदाशिवके प्रेमपाशमें बँधकर उन्हींके हृदयमें निरन्तर निवास करता हूँ*। शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा मीठी तानके साथ सदा मेरी गाथाका स्वरसिद्ध गान किया करते हैं। इसलिये मैं उनके समीप रहता हूँ। वे योगद्वारा भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्माण्ड-समुदायकी सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई योगी नहीं है। जो अपने दिव्य ज्ञानसे भ्रूभङ्ग-लीलाद्वारा नष्ट हुए मृत्यु और काल आदिकी पुनः सृष्टि करनेमें समर्थ हैं; उन शंकरसे बढ़कर कोई ज्ञानी नहीं है। वे मेरी भक्ति, दास्यभाव, मुक्ति, समस्त सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण सिद्धिको भी देनेमें समर्थ हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई दाता नहीं है। वे पाँच मुखोंसे दिन- रात मेरे नाम और यशका गान करते हैं और निरन्तर मेरे स्वरूपका ध्यान करते रहते हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई भक्त नहीं है। मैं, सुदर्शनचक्र तथा शिव-ये तीनों समान तेजस्वी हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी योग और तेजमें हम लोगोंकी समानता नहीं करते हैं। प्रिये ! इस प्रकार मैंने शंकरके निर्मल यशका पूर्णतः वर्णन किया, तथापि उनका भी दर्प दलित हुआ। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३५-३६) देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा तदनन्तर शिव-निर्माल्यका प्रसङ्ग सुनाकर श्रीकृष्णने कहा-देवि ! जगद्गुरु शंकरके दर्प- भङ्गका वृत्तान्त तो तुमने सुन लिया। अब मुझसे दुर्गाके दर्पविमोचनकी कथा सुनो। सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे प्रकट हो जगदम्बाने कामिनीका कमनीय एवं मनोहर रूप धारण किया तथा दानवेन्द्रोंका वध करके देवकुलकी रक्षा की। इसके बाद देवीने दक्षपत्नीके उदरसे जन्म लिया। दक्षकन्या सतीदेवीने पिनाकपाणि शिवको पतिरूपमें ग्रहण किया और बड़ी भक्तिके साथ वे निरन्तर स्वामीकी सेवामें लगी रहीं। दैवयोगसे देवताओंकी सभामें दक्षके साथ शिवकी अकारण शत्रुता हो गयी। दक्षने घर आकर एक यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने समस्त देवताओंको आमन्त्रित किया; किंतु क्रोधके कारण शंकरको नहीं बुलाया। सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ दक्षके घर आये; परंतु स्वाभिमानवश शंकर अपने गणोंके साथ वहाँ नहीं गये। उनके मनमें भी
- शंकरः परमात्मा मे प्राणेभ्योऽपि परः शिवः। त्र्यम्बके मन्मनः शश्वन्न प्रियो मे भवात्परः ॥ न संवसामि गोलोके वैकुण्ठे तव वक्षसि । सदाशिवस्य हृदये निबद्धः प्रेमपाशतः ॥ (३६।१०८, ११०)