भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 605, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 605

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५९५

करके वे विष्णुलोकको चले जायँगे। फिर तो अनायास ही उन्हें नारायणका सारूप्य प्राप्त हो जायगा। वे भगवान्‌के पार्षदभावको पाकर हरिदास हो जायँगे।' यह सब सोचकर देवताओंने आपसमें सलाह की और वे गुरु बृहस्पतिको हिमालयके घर भेजनेके लिये गये। उन सबने गुरुको प्रणाम करके निवेदन किया—'गुरुदेव! आप हिमालयके यहाँ जाकर उनके समक्ष भगवान् शिवकी निन्दा कीजिये। यह तो निश्चय है कि दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें हिमवान् अनिच्छासे ही अपनी पुत्री शिवको देंगे। ऐसा करनेसे कन्यादानका फल कम हो जायगा। कालान्तरमें गिरिराज भले ही मुक्त हो जायँ; परंतु इस समय तो इन्हें पृथ्वीपर रहना ही चाहिये। भगवन्! आप ही अनन्त रत्नोंके आधारभूत हिमालयको भारतवर्षमें रखिये। (इन्हें यहाँसे जाने न दीजिये।)

देवताओंका वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिजीने दोनों हाथ कानोंमें लगा लिये और 'नारायण!' 'नारायण!' का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वेद-वेदान्तके विद्वान् बृहस्पति हरि और हरके महान् भक्त थे। उन्होंने देवताओंको बारंबार फटकारकर कहा।

बृहस्पति बोले—स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहनेवाले देवताओ! मेरी सच्ची बात सुनो। मेरा यह वचन नीतिका सारतत्त्व, वेदोंद्वारा प्रतिपादित तथा परिणाममें सुख देनेवाला है। जो पापी शिव और विष्णुके भक्तकी, भूदेवता ब्राह्मणोंकी, गुरु और पतिव्रताकी, पति, भिक्षु, ब्रह्मचारी तथा सृष्टिके बीजभूत देवताओंकी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके रहनेतक कालसूत्र नामक नरकमें पकाये जाते हैं। उन्हें कफ तथा मल-मूत्रमें दिन-रात सोना पड़ता है। उन्हें कीड़े खाते हैं और वे कातर वाणीमें आर्तनाद करते हैं। जो सृष्टिकर्ता जगद्गुरु ब्रह्माकी निन्दा करते हैं; जो सुरश्रेष्ठ शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गीता, तुलसी, गङ्गा, वेद, वेदमाता सावित्री, व्रत, तपस्या, पूजा, मन्त्र तथा मन्त्रदाता गुरुमें दोष बताते हैं; वे अन्धकूप नामक नरकमें यातना भोगते हैं और वहाँ उन्हें ब्रह्माकी आधी आयुतक रहना पड़ता है तथा वे सर्प-समूहोंसे भक्षित हो सदा चीखते-चिल्लाते रहते हैं। जो दूसरे देवताओंके साथ तुलना करके भगवान् हृषीकेशकी निन्दा करते हैं; विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाले पुराणमें, जो श्रुतिसे भी उत्कृष्ट है, दोष निकालते हैं; राधा तथा उनकी कायव्यूहरूपा गोपियोंकी और सदा पूजित होनेवाले ब्राह्मणोंकी भी निन्दा करते हैं; वे देवता ही क्यों न हों, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त नरकके गड्ढेमें पकाये जाते हैं। उनके मुँह नीचे लटकाये जाते हैं और उनकी जाँघें ऊपरकी ओर होती हैं। विकृताकार सर्पसमूह तथा सर्पकी-सी आकृतिवाले कीट उनके सारे अङ्गोंमें लिपटकर काटते रहते हैं और वे अत्यन्त कातर तथा भयभीत हो सदा आर्तनाद किया करते हैं। निश्चय ही वहाँ उन्हें क्षोभपूर्वक कफ एवं मल-मूत्र खाने पड़ते हैं। रोषसे भरे हुए यमराजके किङ्कर उनके मुँहमें जलती हुई लुआठी डाल देते हैं। तीनों संध्याओंके समय उन्हें डाँट बताते हुए डंडोंसे पीटते हैं। डंडोंके प्रहारसे जब उन्हें प्यास लगती है, तब वे उन यमदूतोंके भयसे मूत्र-पान करते हैं। जब दूसरा कल्प आरम्भ होता है और पहले-पहल सृष्टिका आयोजन किया जाता है, उस समय उन पापियोंके पापोंका निवारण होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। निश्चय ही शिवकी निन्दा करनेवाले देवता नरकमें पड़ेंगे। मेरे बच्चो! क्या तुमलोग मेरा यही उपकार करना चाहते हो? ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिने शूलपाणि शंकरको अपनी पुत्री दी। उसीके पुण्यसे शिवकी निन्दा करनेपर भी उन्हें पाप नहीं लगा; अपितु परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। उन्होंने अनिच्छासे ही