भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 604

५९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मस्तकपर देखे। उनके द्वारा जो धूप-दीप दिये गये थे अथवा जो मनोरम नैवेद्य निवेदित हुआ था, वह भी भिक्षुकके सामने प्रस्तुत दिखायी दिया। दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक द्विभुज-रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। अब उसके हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली थी। गोपवेष, किशोर-अवस्था, श्यामसुन्दर वर्ण, मुस्कराता हुआ मुख, मस्तकपर मोरपंखका मुकुट, श्रीअङ्गोंमें रत्नमय आभूषण, चन्दनके अङ्गराग तथा गलेमें वनमाला—मानो साक्षात् श्रीकृष्ण दर्शन दे रहे हों। फिर क्षणभरमें वह उज्ज्वल-कान्ति चन्द्रशेखर शिवके रूपमें दिखायी दिया। उसके हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे। वस्त्रकी जगह सुन्दर बाघम्बर था। सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूति लगी थी। धवल वर्ण था। गलेमें अस्थियोंकी माला थी, जो आभूषणका काम देती थी। कंधेपर सर्पमय यज्ञोपवीत तथा सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली जटा थी। हाथोंमें शृङ्ग और डमरू थे। सुप्रशस्त एवं मनोहर रूप चित्तको आकृष्ट कर लेता था। भगवान् शिव श्वेत कमलोंके बीजकी मालासे हरिनामका जप करते थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्दहासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर दिखायी देते थे। अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। फिर दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक 'जगत्स्रष्टा' चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। ब्रह्माजी स्फटिककी माला लेकर हरिनामका जप कर रहे थे।

हिमवान्‌ने देखा, क्षणभरमें वह त्रिगुणात्मक सूर्यस्वरूप हो गया। अत्यन्त दुःसह प्रकाशसे युक्त सूर्यदेव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। फिर एक क्षणतक वह अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित अग्निके रूपमें विद्यमान रहा। तत्पश्चात् क्षणभर आह्लादजनक चन्द्रमाके रूपमें शोभा पाता रहा। तदनन्तर एक ही क्षणमें तेजःस्वरूप, निराकार, निरञ्जन, निर्लिप्त, निरीह परमात्मस्वरूपमें स्थित हो गया। इस प्रकार स्वेच्छामय नाना रूप धारण करनेवाले परमेश्वरका दर्शनकर शैलराजके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो गया। उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत्-प्रणाम किया और भक्तिभावसे परिक्रमा करके बारंबार मस्तक झुकाया। फिर हर्षसे उछलकर हिमवान्‌ने जब पुनः देखा तो वही भिक्षुक सामने था। वास्तवमें वह भिक्षुक ही है—ऐसा उन्हें दिखायी दिया। भगवान् विष्णुकी मायासे शैलराज उसके नाना रूप-धारण-सम्बन्धी सब बातोंको भूल गये। भिक्षुक उनसे भीख माँगने लगा। उसके पास भिक्षाका पात्र था। उसने रक्त वस्त्र धारण किया था। हाथोंमें शृङ्ग और विचित्र डमरूके बाजे थे। वह भिक्षामें केवल दुर्गाको ग्रहण करनेके लिये उत्सुक था, दूसरी किसी वस्तुको नहीं, परंतु विष्णु-मायासे मोहित हुए शैलराजने उसकी याचना स्वीकार नहीं की। भिक्षुने भी और कुछ नहीं लिया। वह वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रिये! उस समय मेना और गिरिराजको ज्ञान हुआ। वे बोले—'अहो! हमने विश्वनाथको दिनमें स्वप्नकी भाँति देखा है। भगवान् शिव हम दोनोंको वञ्चित करके अपने स्थानको चले गये।'

उन दोनों पति-पत्नीकी भगवान् शिवमें भक्ति बढ़ रही है—यह देख सब देवताओंको चिन्ता हो गयी। इन्द्र आदि देवता भारसे सुमेरुकी रक्षाके लिये युक्ति करने लगे। वे आपसमें कहने लगे—'यदि हिमवान् अनन्य भक्तिसे भारतमें भगवान् शिवको कन्यादान करेंगे तो निश्चय ही निर्वाण-मोक्षको प्राप्त होंगे। अनन्त रत्नोंका आधार हिमालय यदि पृथ्वीको छोड़कर चला जायगा तो इसका 'रत्नगर्भा' नाम अवश्य ही मिथ्या हो जायगा। शूलपाणि शिवको अपनी कन्या दे स्थावरत्वका परित्याग और दिव्य रूप धारण