ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
५९३
ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिया। पर्वतराजने ब्राह्मणों और बन्दीजनोंको धन दिया। उनसे वेद-पाठ और मङ्गल-पाठ करवाये। इस प्रकार वे दोनों अपनी पुत्रीके साथ सुखसे घरमें रहने लगे। शिवाके आ जानेसे उनके मनमें बड़ा हर्ष था।
एक दिन हिमवान् तप करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गये। मेना अपनी पुत्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक घरके आँगनमें बैठी थीं। इसी समय एक नाचने-गानेवाला भिक्षुक सहसा मेनाके पास आया। उसके बायें हाथमें सींगका बाजा और दायें हाथमें डमरू था। बहुत ही वृद्ध और जरासे अत्यन्त जर्जर हो चुका था। उसने सारे शरीरमें विभूति लगा रखी थी। पीठपर गुदड़ी लिये और लाल वस्त्र पहने वह भिक्षुक बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वह मनोहर नृत्य करते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगा। कभी शृङ्ग बजाता और कभी डमरू। उसके बाजेकी आवाज सुनकर बहुत-से नागरिक हर्षविह्वल हो वहाँ आ गये। दर्शकोंमें बालक, बालिका, वृद्ध, युवक, युवतियाँ तथा वृद्धाएँ भी थीं। मधुर तान और स्वरसे युक्त उस सुन्दर गीतको सुनकर सहसा सब लोग मोहित एवं मूर्च्छित हो गये। दुर्गाको भी मूर्च्छा आ गयी। उसने अपने हृदयमें भगवान् शंकरको देखा। वे त्रिशूल, पट्टिश और व्याघ्रचर्म धारण किये सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूतिसे विभूषित थे। बड़ा ही रम्य रूप था। गलेमें अत्यन्त निर्मल अस्थियोंकी माला शोभा देती थी। प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। उनकी आकृतिसे आन्तरिक उल्लास सूचित होता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। हाथमें माला, कंधेपर नागोंका यज्ञोपवीत और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट—बड़ी सुन्दर झाँकी थी। वे पार्वतीसे कह रहे थे कि वर माँगो। हृदयस्थित हरको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा, ‘आप हमारे पति हो जाइये।’ ‘एवमस्तु’ कहकर शिव अन्तर्धान हो गये। हृदयमें शिवको न देखकर दुर्गाकी मूर्च्छा भङ्ग हुई। उसने आँख खोलकर देखा, सामने वही भिक्षुक गा रहा है।
भिक्षुके नृत्य और संगीतसे संतुष्ट हो मेना सोनेके पात्रमें बहुत-से रत्न ले उसे देनेके लिये गयीं; परंतु भिक्षुने भिक्षामें दुर्गाको ही माँगा; दूसरी कोई वस्तु नहीं ली। वह कौतुकवश पुनः नृत्य करनेको उद्यत हुआ; परंतु मेना उसकी बात सुनकर कुपित हो उठी थीं। उन्हें आश्चर्य भी हुआ था। उन्होंने भिक्षुकको बहुत डाँटा तथा उसे घरसे बाहर निकाल देनेकी आज्ञा दी। इसी बीचमें अपना तप पूरा करके हिमवान् घरपर आये। वहाँ उन्हें आँगनमें खड़ा हुआ एक भिक्षु दिखायी दिया, जो बड़ा मनोहर था। उसके विषयमें मेनाके मुखसे सब बातें सुनकर हिमवान् हँसे और रुष्ट भी हुए। उन्होंने अपने सेवकको आज्ञा दी—‘इस भिक्षुकको बाहर निकाल दो।’ परंतु वह कोई साधारण भिक्षुक नहीं था। आकाशकी भाँति उसका स्पर्श करना भी कठिन था। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उसे कोई बाहर न कर सका। उसके निकट जानेकी भी किसीमें क्षमता नहीं थी। हिमवान्ने एक ही क्षणमें देखा—उस भिक्षुकके सुन्दर चार भुजाएँ हैं; मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है; श्याम-सुन्दर रुचिर वेष मनको मोहे लेता है; मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे श्रीहरि (रूपधारी शिव) भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते हैं।
हिमवान् श्रीहरिके उपासक थे। उन्होंने पूजाकालमें भगवान् गदाधरको जो-जो फूल चढ़ाये थे, वे सब भिक्षुकके अङ्गमें और