भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२९

कौथुमीशाखामें देखे गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! 'रा' शब्दके उच्चारणमात्रसे ही माधव हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं और 'धा' शब्दका उच्चारण होनेपर तो अवश्य ही भक्तके पीछे वेगपूर्वक दौड़ पड़ते हैं। जो पहले पुरुषवाची शब्दका उच्चारण करके पीछे प्रकृतिका उच्चारण करता है, वह वेदकी मर्यादाका उल्लङ्घन करनेके कारण मातृहत्याके पापका भागी होता है। तीनों लोकोंमें पुण्यदायक कर्मक्षेत्र होनेके कारण भारतवर्ष धन्य है। उसमें भी श्रीराधाचरणारविन्दोंकी रेणुसे पवित्र हुआ वृन्दावन अतिशय धन्य है। राधाके चरणकमलोंकी पवित्र धूल प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माजीने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी।

नारदजीने पूछा—पूर्णमासी बीत जानेपर जगदीश्वर श्रीकृष्णने क्या किया? उस समय उनकी कौन-सी रहस्यलीला हुई? यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—रासमण्डलमें रासलीला सम्पन्न करके स्वयं रासेश्वर श्यामसुन्दर रासेश्वरी राधाके साथ यमुनातटपर गये, वहाँ स्नान एवं निर्मल जलका पान करके उन्होंने कालिन्दीके स्वच्छ सलिलमें गोपाङ्गनाओंके साथ जलक्रीड़ा की। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण राधिकाजीके साथ भाण्डीर वनमें चले गये। इधर प्रेमविह्वला गोपियाँ अपने-अपने घरोंको लौट गयीं। उस समय श्यामसुन्दर श्रीराधाके साथ मालतीकानन, वासन्तीकानन, चन्दनकानन तथा चम्पककानन आदि मनोहर वनोंमें क्रीड़ा करते रहे। फिर पद्मवनमें रातको शयन किया। प्रातःकाल उन्होंने देखा, प्रियाजी फूलोंकी शय्यापर सो रही हैं। शरत्कालिक चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले उनके सुन्दर मुखपर पसीनेकी बूँदें दिखायी दे रही हैं। सिन्दूर लुप्त हो गया है, कज्जल मिट गया है, अधरोंकी लाली भी लुप्तप्राय हो गयी है और कपोलोंकी पत्र-रचना मिट गयी है। उनकी वेणी खुल गयी है, नेत्रकमल बंद हैं और रत्नोंके बने हुए दो बहुमूल्य कुण्डलोंसे उनके मुखमण्डलकी अपूर्व शोभा हो रही है। दन्तपंक्तिसे सुशोभित मुख मानो गजमुक्तासे अलंकृत एवं उद्दीप्त है। प्रियाजीको इस अवस्थामें देख भक्तवत्सल माधवने अग्निशुद्ध महीन वस्त्रसे उनके मुखको बड़े प्रेम और भक्तिभावसे पोंछा। फिर केशोंको सँवारकर उनकी चोटी बाँध दी। उस चोटीमें माधवी और मालतीके फूलोंकी माला लगा दी, जिससे उसकी शोभा बहुत बढ़ गयी। वह चोटी रत्नयुक्त रेशमी डोरोंसे बँधी थी। उसकी आकृति सुन्दर, वक्र, मनोहर और अत्यन्त गोल थी। कुन्दके फूलोंसे भी उसका शृङ्गार किया गया था। वेणी बाँधनेके पश्चात् श्यामसुन्दरने प्रियाजीके भाल-देशमें सिन्दूरका तिलक लगाया। उसके नीचे उज्ज्वल चन्दनका शृङ्गार किया। फिर कस्तूरीकी बेंदीसे उनके ललाटकी शोभा बढ़ायी। तत्पश्चात् दोनों कपोलोंपर चित्र-विचित्र पत्र-रचना की। नेत्रकमलोंमें भक्तिभावसे काजल लगाया, जिससे उनका सौन्दर्य खिल उठा। फिर बड़े अनुरागसे राधाके अधरोंमें लाली लगायी। कानमें दो अत्यन्त निर्मल आभूषण पहनाये। गलेमें बहुमूल्य रत्नोंका हार पहनाया, जो उनके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था। वह हार मणियोंकी लड़ियोंसे प्रकाशित हो रहा था। तदनन्तर बहुमूल्य, दिव्य, अग्निशुद्ध तथा सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत वस्त्र पहनाया, जो कस्तूरी और कुंकुमसे अभिषिक्त था। दोनों चरणोंमें रत्ननिर्मित मञ्जीर पहनाये और पैरोंकी अँगुलियों एवं नखोंमें भक्तिभावसे महावर लगाया।