ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( उत्तरार्द्ध )
श्रीकृष्णकी महत्ता एवं प्रभावका वर्णन
**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद ! वे ही भगवान् श्रीकृष्ण सर्वात्मा परम पुरुष हैं। वे दुराराध्य होते हुए भी अत्यन्त साध्य हैं अर्थात् आराधनाके बलसे उन्हें रिझा पाना अत्यन्त कठिन है तो भी वे भक्तपर कृपा करके स्वयं ही उसके अधीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण सबके आराध्य और सुखदायक हैं। अपने भक्तोंके लिये तो वे अत्यन्त सुलभ हैं। भक्त ही उन्हें आराधनाद्वारा वशमें कर सकता है। वे अपने भक्तको सदा ही दर्शन देते हैं और दे सकते हैं; किंतु अभक्तके लिये उनका दर्शन पाना सर्वथा असम्भव है। उनके लीलाचरित्रोंका रहस्य समझ पाना अत्यन्त कठिन है। केवल उन चरित्रोंका अपने हृदयमें चिन्तन करना चाहिये। संसारके सब लोग श्रीकृष्णकी दुरन्त मायासे बद्ध एवं मोहित हैं। उन्हींके भयसे यह वायु निरन्तर बहती रहती है, कच्छप बिना आधारके ही स्थिर रहता है और यही कच्छप उन्हींके भयसे सदा अनन्त (शेषनाग)-को अपनी पीठपर धारण किये रहता है तथा शेषनाग अपने मस्तकपर अखिल विश्वका भार उठाये रहते हैं। शेषनागके सहस्र सिर हैं। उनके सिरके एक देशमें सात समुद्रों, सात द्वीपों, पर्वतों और काननोंसे युक्त पृथ्वी विद्यमान है। सात पाताल, भूर्भुवः स्वः आदि विभिन्न सात स्वर्ग, जिनमें ब्रह्मलोक भी शामिल है, विश्व कहे गये हैं। इस विश्वको ‘त्रिभुवन’ कहते हैं। इसीको कृत्रिम* जगत् कहा गया है। विधाता प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्णके भयसे ही इस कृत्रिम जगत्की सृष्टि करते हैं। इस तरहके असंख्य विश्व हैं, जिन्हें महाविराट् (महाविष्णु) अपने रोम-कूपोंमें धारण करते हैं। ये श्रीकृष्णके ही अंश हैं। उन्हींके भयसे समस्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं और उन्हींका निरन्तर ध्यान किया करते हैं। कृपानिधान विष्णु (लघु विराट्) भी श्रीकृष्णके ही भयसे संसारका पालन करते हैं। उन्हींका भय मानकर कालाग्नि रुद्रस्वरूप काल प्रजाका संहार करता है तथा छहों गुणों और ऐश्वर्योंसे युक्त विरागी एवं विरक्त मृत्युञ्जय महादेव उन्हींके भयसे अनुरागपूर्वक उनका निरन्तर ध्यान करते रहते हैं। उन्हींके भयसे आग जलती और सूर्य तपते हैं। उनका ही भय मानकर इन्द्र वर्षा करते और मृत्यु समस्त प्राणियोंपर धावा बोलती है। उन्हींके भयसे यम एवं धर्म पापियोंको दण्ड देते हैं। उनका ही भय मानकर पृथ्वी चराचर लोकोंको धारण करती और प्रकृति सृष्टिकालमें महत्तत्त्व आदिको जन्म देती है। बेटा ! उन भगवान् श्रीकृष्णका अभिप्राय क्या है ? इसे जानना बहुत कठिन है। कौन ऐसा पुरुष है, जो उसे जाननेका दावा कर सके। वत्स ! ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिनके प्रभावको नहीं जानते हैं; उन्हीं भगवान्की लीलाका रहस्य मुझ-जैसा मन्दबुद्धि कैसे जान सकता है ?
वे नन्दनन्दन वृन्दावनको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये ? उन्होंने गोपियों तथा प्राणाधिका प्रिया राधाको क्यों त्याग दिया ? माता यशोदा और नन्दको तथा अन्यान्य बान्धव आदिको क्यों छोड़ा ? इस बातको उनके सिवा दूसरा कौन जान सकता है ? वे ही दर्प देते हैं और वे ही उस दर्पका दलन करते हैं। सबको सदा सब कुछ
* अनित्य।