भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३५

वही उनके लिये उत्तम तप है। पर-पुरुष पतिव्रताओंके लिये पुत्रतुल्य है; यही नारियोंका धर्म है। राजालोग जैसे प्रजाका औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते हैं, उसी प्रकार वे प्रजावर्गकी स्त्रियोंको भी माताके समान देखते हैं। विष्णुकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ करते और देवताओं एवं ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते हैं। दुष्टोंका निवारण और सत्पुरुषोंका पालन करते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका यही धर्म बताया था। वाणिज्य और धर्मसंग्रह यह वैश्योंका अपना धर्म है। ब्राह्मणोंकी सेवा शूद्रोंका परम धर्म निश्चित किया गया है। राजन्! सब कुछ भगवान् श्रीहरिको समर्पण कर देना संन्यासियोंका धर्म है। संन्यासी एकमात्र गेरुआ वस्त्र, दण्ड और मिट्टीका कमण्डलु धारण करता है। सर्वत्र समान दृष्टि रखता और सदा श्रीनारायणका स्मरण करता है। नित्य भ्रमण करता है। किसीके घरमें नहीं टिकता और लोभवश किसीको विद्या और मन्त्रका उपदेश नहीं देता। संन्यासी अपने लिये आश्रम नहीं बनाता। दूसरी किसी वासनाको मनमें स्थान नहीं देता; दूसरे किसीका साथ नहीं करता और आसक्ति एवं मोहसे दूर रहता है। वह लोभवश स्वादिष्ट भोजन नहीं करता, स्त्रीका मुख नहीं देखता तथा व्रतमें अटल रहकर किसी गृहस्थ पुरुषसे मनचाही भोज्य वस्तुके लिये याचना भी नहीं करता। ब्रह्माजीने यही संन्यासियोंका धर्म बताया है। बेटा! यह तुम्हें धर्मकी बात बतायी है। अब तुम सुखपूर्वक अपने स्थानको जाओ। ऐसा कहकर मार्गमें मिली हुई इन्द्राणी चुप हो रहीं और राजा नहुष गर्दन टेढ़ी करके उनसे बोला।

नहुषने कहा—देवि! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब उलटी बात है। यथार्थ वैदिक धर्म क्या है? यह मैं बताता हूँ, सुनो। सुरसुन्दरि! इसमें संदेह नहीं कि सबको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है; परंतु स्वर्ग, पाताल तथा दूसरे किसी द्वीपमें जो कर्म किये जाते हैं, उनका फल नहीं भोगना पड़ता। पुण्य क्षेत्र भारतमें शुभाशुभ कर्म करके कर्मी मनुष्य उस कर्मके बन्धनमें बँधकर परलोकमें उसके फलको भोगता है। हिमालयसे लेकर दक्षिण समुद्रतकका पवित्र देश 'भारत' कहा गया है। वह सब स्थानोंमें श्रेष्ठ तथा मुनियोंकी तपोभूमि है। वहाँ जन्म लेकर जीव भगवान् विष्णुकी मायासे वञ्चित हो सदा विषय-सेवन करता है और श्रीहरिकी सेवाको भुला देता है। जो भारतवर्षमें महान् पुण्य करता है, वह पुण्यात्मा पुरुष स्वर्गको जाता है। वहाँ स्वर्गीय कन्याओंको अपनाकर चिरकालतक उनके साथ आनन्द भोगता है। मनुष्य मानव-शरीरका त्याग करके स्वर्गमें आता है; किंतु सुन्दरि! मैं अपने शरीरके साथ यहाँ आया हूँ। देखो, मेरा कैसा पुण्य है? अनेक जन्मोंके पुण्यसे मैं अभीष्ट स्वर्गमें आया हूँ। तदनन्तर न जाने किस पुण्यसे तुमसे मेरा साक्षात्कार हुआ है। यह कर्मका स्थान नहीं, अपने कर्मोंके भोगका स्थान है। यों कहकर कामासक्त नहुषने फिर बहुत-सी युक्तियोंके द्वारा पुनः अपने उसी पापपूर्ण प्रस्तावको दुहराया।

तब शची बोलीं—हाय! इस विवेकशून्य, कर्तव्याकर्तव्यको न जाननेवाले, मूढ़, कामातुर पुरुषकी कितनी बातें आज मुझे सुननी पड़ेंगी! कामने जिनके चित्तको चुरा लिया है, वे विवेकशून्य काममत्त कामी तथा मधुमत्त एवं सुरामत्त मनुष्य अपनी मौतको भी नहीं गिनते। ओ मतवाले नरेश! आज मुझे छोड़ दे। मैं तेरे लिये माताके समान और रजस्वला हूँ। आज मेरी ऋतुका प्रथम दिन है। पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डालीके समान मानी जाती है। दूसरे दिन म्लेच्छा और तीसरे दिन धोबिनके समान होती है। चौथे दिन वह अपने पतिके लिये शुद्ध होती है; परंतु देवकार्य और पितृकार्यके लिये