भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 684

६७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सामग्री क्रमशः अर्पित करे और भक्तिभावसे मूलमन्त्रद्वारा पूजा करे। मेरे साथ ही प्रथम आवरणमें श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, वीरभानु और शूरभानु—इन पाँच गोपोंका पूजन करे। तत्पश्चात् सुनन्द, नन्द, कुमुद और सुदर्शन—इन पार्षदोंका; लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, गङ्गा और पृथ्वी—इन देवियोंका; गुरु, तुलसी, शिव, कार्तिकेय और विनायकका तथा नवग्रहों और दस दिक्पालोंका सब दिशाओंमें विद्वान् पुरुष पूजन करे। सबसे पहले विघ्न-निवारणके लिये गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवताओंका पूजन करना चाहिये। ये वेदोक्त देवता कर्मबन्धनको काटनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। विघ्नोंके नाशके लिये गणेशका, रोगनिवारणके लिये सूर्यका, अभीष्टकी प्राप्ति तथा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अग्निका, मोक्षके निमित्त विष्णुका, ज्ञानदानके लिये शिवका तथा बुद्धि और मुक्तिके लिये विद्वान् पुरुष पार्वतीका पूजन करे। तीन बार पुष्पाञ्जलि देकर उन-उन देवताओंके स्तोत्र और कवचका पाठ करे। गुरुका वन्दन और पूजन करनेके पश्चात् देवताको प्रणाम करे। नित्यकर्म करके देवपूजनके पश्चात् सुखपूर्वक यथाप्राप्त कार्य करनेका विधान है। यह नित्यकर्म वेदवर्णित है। इसका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषकी आत्मशुद्धि होती है।

बुद्धिमान् पुरुष मल-मूत्र, गुह्याङ्ग, स्त्रियोंके अङ्ग, कटाक्ष और हास्य आदि न देखे; क्योंकि ये सब विनाशके बीज हैं। उनका रूप सदा ही विपत्तिका कारण है। दिनमें अपनी स्त्रीके साथ भी समागम न करे; क्योंकि दिनमें स्त्री-सहवास करनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है; नेत्रों और कानोंमें पीड़ा होती है। जब आकाशमें एक ही तारा उगा हो, उस समय उधर नहीं देखना चाहिये; अन्यथा रोगोंका भय प्राप्त होता है। यदि उस एक तारेको देख ले तो देवताओंका दर्शन और भगवान्‌का स्मरण करके सात बार नारदजीका नाम जपे। अस्तके समय सूर्य और चन्द्रमाको न देखे; क्योंकि उस समय उन्हें देखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है। कृष्णपक्षमें खण्डित चन्द्रमाके उदयकालमें उसे न देखे; अन्यथा रोग होता है। जलमें सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखनेसे मनुष्यको शोककी प्राप्ति होती है। पराया मैथुन देखनेसे भाईका वियोग होता है; इसलिये उसे न देखे। पापीके साथ एक जगह सोना, बैठना, भोजन करना और घूमना-फिरना निषिद्ध है; क्योंकि वह सब नाशका लक्षण है। किसीके साथ बात करने, शरीरको छूने, सोने, बैठने और भोजन करनेसे उन दोनोंके पाप एक-दूसरेमें अवश्य संचरित होते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे तेलका बिन्दु पानीमें पड़नेसे फैल जाता है। हिंसक जन्तुके समीप न जाय; क्योंकि उसके पास जाना दुःखका कारण होता है। दुष्टके साथ मेल-जोल न बढ़ाये; क्योंकि वह शोकप्रद होता है। ब्राह्मणों, गौओं तथा विशेषतः वैष्णवोंकी हिंसा न करे; उनकी हिंसा सर्वनाशका कारण बन जाती है। देवता, देवपूजक, ब्राह्मण और वैष्णवोंके धनका अपहरण न करे; क्योंकि वह धन सर्वनाशका कारण होता है। जो अपने या दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है; वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। ब्राह्मणको देनेके लिये जो दक्षिणा संकल्प की जाती है, वह यदि तत्काल न दे दी जाय तो एक रात बीतनेपर दूनी, एक मास बीतनेपर सौगुनी और दो मास बीतनेपर वह सहस्रगुनी हो जाती है। एक वर्ष बीत जाय तो दाता नरकमें पड़ता है। यदि दाता न दे और मूर्ख गृहीता न माँगे तो दोनों नरकमें पड़ते हैं। दाता रोगी होता है। ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेसे अवश्य ही वंशकी हानि होती है। हिंसक मनुष्य धन और लक्ष्मीको खोकर भिखमंगा हो जाता है। देवता और ब्राह्मणको देखकर जो