ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७३
श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्दमय परिपूर्णतम प्रभु हैं। भक्तोंपर अनुग्रहके लिये व्याकुल रहनेवाले परम परमात्मा हैं। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए वे भगवान् निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा परात्पर हैं। ब्रह्मा, शिव और शेष भी उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं। नन्दजीकी स्तुति सुनकर वे जगदीश्वर बहुत संतुष्ट हुए। नन्द बाबा विरहज्वरसे कातर हो गोकुलसे उनके पास आये थे।
श्रीभगवान्ने कहा—'बाबा! शोक और भ्रमको छोड़ो तथा व्रजको लौट जाओ। वहाँ जाकर सबको आनन्दित करो। मैं जो परम सत्य ज्ञान बता रहा हूँ, इसे सुनो। यह ज्ञान शोकग्रन्थिका उच्छेद करनेवाला है।'
यों कह पञ्चभूतोंका वर्णन करते हुए श्रीहरिने नन्द बाबाको उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया और अन्तमें कहा—'तात! मेरे भक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। मेरा सुदर्शनचक्र प्रतिदिन उनकी सब ओरसे रक्षा करता है। मेरी यह बात यशोदा मैयासे, गोपियोंसे और गोपगणोंसे कहो। उन सबके साथ शोकको त्याग दो। अच्छा अब घरको जाओ।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण यादवोंकी सभामें चुप हो गये। तब आनन्दमग्न नन्दने पुनः उनसे पूछा।
नन्द बोले—परमानन्दस्वरूप गोविन्द! मैं मूढ़ हूँ और तुम वेदोंके उत्पादक हो। मुझे ऐसा लौकिक ज्ञान बताओ, जिससे तुम्हारे चरणोंको प्राप्त कर सकूँ।
नन्दजीकी यह बात सुनकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें श्रुतिदुर्लभ आह्निक-कृत्यसम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान् बोले—तात! मैं तुम्हें वह परम अद्भुत ज्ञान प्रदान करता हूँ, जो वेदोंमें अत्यन्त गोपनीय और पुराणोंमें अत्यन्त दुर्लभ है, कुलटा स्त्रियाँ मोक्ष-मार्गके द्वारको ढकनेके लिये अर्गलाएँ हैं, भ्रम और मायाकी सुन्दर भूमियाँ हैं; उनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। व्रजराज! असाध्वी स्त्रियाँ हरिभक्तिके विरुद्ध होती हैं। वे नाशकी बीजरूपा हैं। उनपर विश्वास करना कदापि उचित नहीं है। प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर रातमें पहने हुए कपड़ोंको त्याग दे और हृदय-कमलमें इष्टदेवका तथा ब्रह्मरन्ध्रमें परम गुरुका चिन्तन करे। मन-ही-मन उनका चिन्तन करके प्रातःकालिक कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष निश्चय ही निर्मल जलमें स्नान करे। कर्मका उच्छेद करनेवाला भक्त कोई कामना या संकल्प नहीं करता। वह स्नान करके भगवान्का स्मरण करता और संध्या करके घरको लौट जाता है। दरवाजेपर दोनों पैर धोकर वह घरमें प्रवेश करे और धुले हुए दो वस्त्र (धोती-चादर) धारण करके मोक्षके कारणभूत मुझ परमात्माका ही पूजन करे। शालग्राम, मणि, यन्त्र, प्रतिमा, जल, ब्राह्मण, गौ तथा गुरुमें सामान्यरूपसे मेरी स्थिति मानकर इनमें कहीं भी मेरी पूजा करनी चाहिये। कलशमें, अष्टदल कमलमें तथा चन्दननिर्मित पात्रमें भी मेरी पूजा की जा सकती है। सर्वत्र पूजनके समय आवाहन करे; परंतु शालग्राम-शिलामें और जलमें पूजा करनी हो तो आवाहन न करे। मन्त्रके अनुरूप ध्यानका श्लोक पढ़कर मेरा ध्यान करनेके पश्चात् व्रती पुरुष षोडशोपचारकी