ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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राधिका तथा साध्वी स्त्रियोंमें निश्चय ही वेदमाता सावित्री हूँ। दैत्योंमें प्रह्लाद, बलिष्ठोंमें बलि, ज्ञानियोंमें भगवान् नारायण ऋषि, वानरोंमें हनुमान्, पाण्डवोंमें अर्जुन, नागकन्याओंमें मनसा, वसुओंमें द्रोण, बादलोंमें द्रोण, जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंमें भारतवर्ष, कामियोंमें कामदेव, कामुकी स्त्रियोंमें रम्भा और लोकोंमें गोलोक हूँ, जो समस्त लोकोंमें उत्तम और सबसे परे है। मातृकाओंमें शान्ति, सुन्दरियोंमें रति, साक्षियोंमें धर्म, दिनके क्षणोंमें संध्या, देवताओंमें इन्द्र, राक्षसोंमें विभीषण, रुद्रोंमें कालाग्निरुद्र, भैरवोंमें संहारभैरव, शङ्खोंमें पाञ्चजन्य, अङ्गोंमें मस्तक, पुराणोंमें भागवत, इतिहासोंमें महाभारत, पाञ्चरात्रोंमें कपिल, मनुओंमें स्वायम्भुव, मुनियोंमें व्यासदेव, पितृपत्नियोंमें स्वधा, अग्निप्रियाओंमें स्वाहा, यज्ञोंमें राजसूय, यज्ञपत्नियोंमें दक्षिणा, अस्त्र-शस्त्रज्ञोंमें जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम, पौराणिकोंमें सूत, नीतिज्ञोंमें अङ्गिरा, व्रतोंमें विष्णुव्रत, बलोंमें दैवबल, ओषधियोंमें दूर्वा, तृणोंमें कुश, धर्मकर्मोंमें सत्य, स्नेहपात्रोंमें पुत्र, शत्रुओंमें व्याधि, व्याधियोंमें ज्वर, मेरी भक्तियोंमें दास्य-भक्ति, वरोंमें वर, आश्रमोंमें गृहस्थ, विवेकिय़ोंमें संन्यासी, शस्त्रोंमें सुदर्शन और शुभाशीर्वादोंमें कुशल हूँ।
ऐश्वर्योंमें महाज्ञान, सुखोंमें वैराग्य, प्रसन्नता प्रदान करनेवालोंमें मधुर वचन, दानोंमें आत्मदान, संचयोंमें धर्मकर्मका संचय, कर्मोंमें मेरा पूजन, कठोर कर्मोंमें तप, फलोंमें मोक्ष, अष्ट सिद्धियोंमें प्राकाम्य, पुरियोंमें काशी, नगरोंमें काञ्ची, देशोंमें वैष्णवोंका देश और समस्त स्थूल आधारोंमें मैं ही महान् विराट् हूँ। जगत्में जो अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ हैं; उनमें मैं परमाणु हूँ। वैद्योंमें अश्विनीकुमार, भेषजोंमें रसायन, मन्त्रवेत्ताओंमें धन्वन्तरि, विनाशकारी दुर्गुणोंमें विषाद, रागोंमें मेघ-मल्लार, रागिनियोंमें कामोद, मेरे पार्षदोंमें श्रीदामा, मेरे बन्धुओंमें उद्धव, पशुजीवोंमें गौ, वनोंमें चन्दन, पवित्रोंमें तीर्थ और निःशंकोंमें वैष्णव हूँ; वैष्णवसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। विशेषतः वह जो मेरे मन्त्रकी उपासना करता है, सर्वश्रेष्ठ है। मैं वृक्षोंमें अंकुर तथा सम्पूर्ण वस्तुओंमें उनका आकार हूँ। समस्त भूतोंमें मेरा निवास है, मुझमें सारा जगत् फैला हुआ है। जैसे वृक्षमें फल और फलोंमें वृक्षका अंकुर है, उसी प्रकार मैं सबका कारणरूप हूँ; मेरा कारण दूसरा नहीं है। मैं सबका ईश्वर हूँ; मेरा ईश्वर दूसरा कोई नहीं है। मैं कारणका भी कारण हूँ। मनीषी पुरुष मुझे ही सबके समस्त बीजोंका परम कारण बताते हैं। मेरी मायासे मोहित हुए पापीजन मुझे नहीं जान पाते हैं। मैं सब जन्तुओंका आत्मा हूँ; परंतु दुर्बुद्धि और दुर्भाग्यसे वञ्चित पापग्रस्त जीव मुझ अपने आत्माका भी आदर नहीं करते। जहाँ मैं हूँ, उसी शरीरमें सब शक्तियाँ और भूख-प्यास आदि हैं; मेरे निकलते ही सब उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे-पीछे उसके सेवक। व्रजराज नन्दजी! मेरे बाबा! इस ज्ञानको हृदयमें धारण करके व्रजको जाओ और राधा तथा यशोदा मैयाको इसका उपदेश दो।
इस ज्ञानको भलीभाँति समझकर नन्दजी अपने अनुगामी व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनों नारीशिरोमणियोंसे उस ज्ञानकी चर्चा की। नारद! वह महाज्ञान पाकर सब लोगोंने अपना शोक त्याग दिया। श्रीकृष्ण यद्यपि निर्लिप्त हैं, तथापि मायाके स्वामी हैं; इसलिये मायासे अनुरक्त जान पड़ते हैं। यशोदाजीने पुनः नन्दरायजीको माधवके पास भेजा। उनकी प्रेरणासे फिर आकर नन्दजीने ब्रह्माजीके द्वारा किये गये सामवेदोक्त स्तोत्रसे परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दन माधवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वे पुत्रके सामने खड़े हो बार-बार रोदन करने लगे। (अध्याय ७३)