भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 693, कुल 810 में से

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पृष्ठ 693

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८३

मैं समस्त शरीरोंमें व्याप्त हूँ; तथापि उनके द्वारा सम्पादित होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। मेरा भक्त जीवन्मुक्त होता है तथा वह जन्म, मृत्यु और जराका निवारण करनेवाला है। भक्त सम्पूर्ण सिद्धोंका स्वामी, श्रीमान्, कीर्तिमान्, विद्वान्, कवि, बाईस प्रकारका सिद्ध और समस्त कर्मोंका निराकरण करनेवाला है। उस सिद्ध भक्तको मैं स्वयं प्राप्त होता हूँ; क्योंकि वह मेरे सिवा दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा ही नहीं करता।

तात! सिद्धियोंका साधन करनेवाला सिद्ध उन सिद्धियोंके ही भेदसे बाईस प्रकारका होता है। मेरे मुखसे उसका परिचय सुनो और सिद्धमन्त्र ग्रहण करो। अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, मनोयायित्व, सर्वज्ञत्व, अभीष्टसिद्धि, अग्निस्तम्भ, जलस्तम्भ, चिरजीवित्व, वायुस्तम्भ, क्षुत्पिपासानिद्रास्तम्भन (भूख-प्यास तथा नींदका स्तम्भन), वाक्सिद्धि, इच्छानुसार मृत प्राणीको बुला लेना, सृष्टिकरण और प्राणोंका आकर्षण—ये बाईस प्रकारकी सिद्धियाँ हैं। सिद्धमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सर्वेश्वरेश्वराय सर्वविघ्नविनाशिने मधुसूदनाय स्वाहा'। यह मन्त्र अत्यन्त गूढ़ है और सबकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान है। सामवेदमें इसका वर्णन है। यह सिद्धोंकी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके जपसे योगी, मुनीन्द्र और देवता सिद्ध होते हैं। सत्पुरुषोंको एक लाख जप करनेसे ही यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यदि नारायणक्षेत्रमें हविष्यान्नभोजी होकर इसका जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। तात! तुम काशीके मणिकर्णिकातीर्थमें जाकर इसका जप करो। मैं तुम्हें नारायणक्षेत्र बतलाता हूँ, सुनो। गङ्गाके जलप्रवाहसे चार हाथतककी भूमिको 'नारायणक्षेत्र' कहा है। उसके नारायण ही स्वामी हैं; दूसरा कोई कदापि नहीं है। वहाँ मनुष्यकी मृत्यु होनेपर उसे ज्ञान एवं मुक्तिकी प्राप्ति होती है। वहाँ व्रतके बिना भी मन्त्र-जप करनेसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। व्रजनाथ! व्रजको जाओ और उसे पवित्र करो।

तात! जिनके दर्शनसे पाप होता है; उन्हें बताता हूँ, सुनो। दुःस्वप्न केवल पापका बीज और विघ्नका कारण होता है। गौ और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले कृतघ्न, कुटिल, देवमूर्तिनाशक, माता-पिताके हत्यारे, पापी, विश्वासघाती, झूठी गवाही देनेवाले, अतिथिके साथ छल करनेवाले, ग्राम-पुरोहित, देवता तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, पीपलका पेड़ काटनेवाले, दुष्ट, शिव और विष्णुकी निन्दा करनेवाले, दीक्षारहित, आचारहीन, संध्यारहित द्विज, देवताके चढ़ावेपर गुजारा करनेवाले और बैल जोतनेवाले ब्राह्मणको देखनेसे पाप लगता है। पति-पुत्रसे रहित, कटी नाकवाली, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाली, पतिभक्तिहीना, विष्णुभक्तिशून्या तथा व्यभिचारिणी स्त्रीके दर्शनसे भी पाप होता है। सदा क्रोधी, जारज, चोर, मिथ्यावादी, शरणागतको यातना देनेवाले, मांस चुरानेवाले, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, ब्राह्मणीगामी शूद्र, सूदखोर द्विज और अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले दुष्ट नराधमको भी देखनेसे पाप लगता है। माता, सौतेली माँ, सास, बहिन, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भाईकी स्त्री, मौसी, बूआ, भांजेकी स्त्री, मामी, परायी नवोढा, चाची, रजस्वला, पितामही और नानी—ये सामवेदमें अगम्या बतायी गयी हैं। सत्पुरुषोंको इन सबकी रक्षा करनी चाहिये। कामभावसे इनका दर्शन और स्पर्श करनेपर मनुष्य ब्रह्महत्याका भागी होता है; अतः दैववश यदि इनकी ओर दृष्टि चली जाय तो सूर्यदेवका दर्शन करके श्रीहरिका स्मरण करे। जो कामनापूर्वक इनपर कुदृष्टि डालते हैं, वे निन्दनीय होते हैं। ब्रजेश्वर! इसलिये शापसे डरे हुए साधु पुरुष

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