ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२१ राधा-उद्धव-संवाद श्रीनारायण कहते हैं- नारद! उद्धवद्वारा | यमुनाटट वही है, सुगन्धित मलय-पवन भी वही किये गये स्तवनको सुनकर राधिकाकी चेतना | है, उनके केलि-कदम्बोंका मूल भी वही है, लौट आयी। तब वे विषादग्रस्त हो उद्धवको | उनका अभीष्ट पुण्यमय रमणीय वृन्दावन भी श्रीकृष्णके सदृश आकारवाला देखकर बोलीं। | विद्यमान है। वही पुंस्कोकिलोंकी बोली, चन्दनचर्चित श्रीराधिकाने कहा - वत्स ! तुम्हारा क्या | शय्या, चारों प्रकारके भोज्य पदार्थ, सुन्दर मधुपान नाम है ? किसने तुम्हें भेजा है ? तुम कहाँसे आये | तथा दुरन्त एवं दुःखद पापात्मा मन्मथ भी वही हो ? तुम्हारे यहाँ आनेका क्या कारण है ? यह | मौजूद है। रासमण्डलमें वे रत्नप्रदीप अभी भी सब मुझे बतलाओ। तुम्हारा सर्वाङ्ग श्रीकृष्णकी | जलते हैं, उत्तम मणियोंका बना हुआ रतिमन्दिर आकृतिसे मिलता-जुलता है; अतः मैं समझती हूँ | भी है ही, गोपाङ्गनाओंका समूह भी विद्यमान है, कि तुम श्रीकृष्णके पार्षद हो। अब तुम बलदेव | पूर्णिमाका चन्द्रमा भी सुशोभित हो रहा है और और श्रीकृष्णका कुशल-समाचार वर्णन करो। | सुगन्धित पुष्पोंद्वारा रचित चन्दनचर्चित शय्या भी साथ ही यह भी बतलाओ कि नन्दजी किस | है। रति-भोगके योग्य कर्पूर आदिसे सुवासित कारणसे वहीं ठहरे हुए हैं ? क्या श्रीकृष्ण इस | पानका बीड़ा, सुगन्धित मालतीकी मालाएँ, श्वेत रमणीय वृन्दावनमें फिर आयेंगे ? क्या मैं उनके | चँवर, दर्पण, जिसमें मोती और मणि जड़े हुए हैं पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखका पुनः | ऐसे हीरेके मनोहर हार, अनेकों रमणीय उपकानन, दर्शन करूँगी तथा रासमण्डलमें उनके साथ पुनः | सुन्दर क्रीड़ा-सरोवर, सुगन्धित पुष्पोंकी वाटिका, क्रीड़ा करूँगी ? क्या सखियोंके साथ पुनः जल- | कमलोंकी मनोहर पंक्ति आदि सभी वैभव विहार हो सकेगा ? और क्या श्रीनन्दनन्दनके | विद्यमान हैं (यह सब है); परंतु मेरे प्राणनाथ शरीरमें पुनः चन्दन लगा पाऊँगी ? | कहाँ हैं ? हा कृष्ण ! हा रमानाथ ! हा मेरे उद्धव बोले- सुमुखि ! मैं क्षत्रिय हूँ। मेरा | प्राणवल्लभ ! तुम कहाँ हो ? मुझ दासीसे कौन- नाम उद्धव है। तुम्हारा शुभ समाचार जाननेके | सा अपराध हो गया है ? हुआ ही होगा; क्योंकि लिये परमात्मा श्रीकृष्णने मुझे भेजा है; इसीलिये | यह दासी तो पग-पगपर अपराध करनेवाली है। मैं तुम्हारे पास आया हूँ। मैं श्रीहरिका पार्षद भी | इतना कहकर राधिका देवी पुनः मूर्च्छित हूँ। इस समय श्रीकृष्ण, बलदेव और नन्दजी | हो गयीं। तब उद्धवने पुनः उन्हें चैतन्य कराया। कुशलसे हैं। | उनकी उस दशाको देखकर क्षत्रियश्रेष्ठ उद्धवको श्रीराधिकाने कहा - उद्धव ! इस समय भी | परम आश्चर्य हुआ। उस समय सात सखियाँ अग्नौ दाहस्वरूपायै भद्रायै च नमो नमः। शोभायै पूर्णचन्द्रे च शरत्पद्मे नमो नमः ॥ नास्ति भेदो यथा देवि दुग्धधावल्ययोः सदा। यथैव गन्धभूम्योश्च यथैव जलशैत्ययोः ॥ यथैव शब्दनभसोर्ज्योतिः सूर्यकयोर्यथा। लोके वेदे पुराणे च राधामाधवयोस्तथा ॥ चेतनं कुरु कल्याणि देहि मामुत्तरं सति । इत्युक्त्वा चोद्धवस्तत्र प्रणनाम पुनः पुनः ॥ इत्युद्धवकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिपूर्वकम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते हरिमन्दिरम् ॥ न भवेद् बन्धुविच्छेदो रोगः शोकः सुदारुणः । प्रोषिता स्त्री लभेत् कान्तं भार्याभेदी लभेत् प्रियाम् ॥ अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो लभते धनम् । निर्भूमिर्लभते भूमिं प्रजाहीनो लभेत् प्रजाम् ॥ रोगाद् विमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ॥ (१२।६३-९३)