ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हाथमें दण्ड और छत्र सुशोभित थे। वे शुक्ल यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। उनके दाँत और वस्त्र श्वेत थे तथा वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। उन्हें आया देख वसुदेव और देवकीने सहसा उठकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और बैठनेके लिये रत्नसिंहासन दिया। फिर मधुपर्क, कामधेनु और अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान करके चन्दन और पुष्पमालाद्वारा उनकी भक्तिभावसहित पूजा की। इसके बाद यत्नपूर्वक उन्हें मिष्टान्न, उत्तम अन्न और मधुर पिष्टकका भोजन कराया और सुवासित पानका बीड़ा दिया। तदनन्तर गर्गजीने बलदेवसहित श्रीकृष्णको देखकर उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया और पतिव्रता देवकी तथा वसुदेवजीसे कहा।
गर्गजी बोले— वसुदेव! जरा, बलरामसहित अपने शुद्धाचारी एवं श्रेष्ठ पुत्र श्रीकृष्णकी ओर तो देखो। अब इनकी अवस्था उपनयन-संस्कारके योग्य हो गयी है; अतः मेरी इस बातपर ध्यान दो।
वसुदेवजीने कहा— गुरो! आप यदुवंशियोंके पूज्य देव हैं, अतः उपनयनके योग्य ऐसा शुद्ध एवं शुभ मुहूर्त नियत कीजिये, जो सत्पुरुषोंके लिये भी प्रशंसनीय हो।
गर्गजी बोले— वसु-तुल्य वसुदेव! परसों वह शुभ मुहूर्त है; उस दिन चन्द्रमा और तारा अनुकूल हैं। वह दिन सत्पुरुषोंको भी मान्य है; अतः उसी मुहूर्तमें तुम उपनयन-संस्कार कर सकते हो। इसके लिये यत्नपूर्वक सभी सामग्री एकत्रित करो और सभी भाई-बन्धुओंको निमन्त्रण-पत्र भी भेज दो।
गर्गजीके वचन सुनकर वसूपम वसुदेवजीने सभी जाति-बन्धुओंके पास मङ्गल-पत्रिका भेज दी। फिर दूध, दही, घी, मधु और गुड़ की छोटी-छोटी मनोहर नदियाँ तैयार करायीं और नाना प्रकारके उपहारोंकी राशि तथा मणि, रत्न, सुवर्ण, मुक्ता, माणिक्य, हीरे, अनेक तरहके आभूषण और वस्त्रोंकी ढेरियां लगवा दीं। इधर भक्तवत्सल श्रीकृष्णने भी भक्तिपूर्वक देवगणों, मुनीन्द्रों, श्रेष्ठ सिद्धों और भक्तोंका मन-ही-मन स्मरण किया। तदनन्तर उस शुभ दिनके प्राप्त होनेपर वे सभी उपस्थित हुए। मुनिश्रेष्ठ, बान्धव, बहुत-से नरेश, देवकन्याएँ, नागकन्याएँ, राजकुमारियाँ, विद्याधरियाँ और बाजा बजानेवाले गन्धर्व भी आये। ब्राह्मण, भिक्षुक, भट्ट, यति, ब्रह्मचारी, संन्यासी, अवधूत और योगीलोग भी पधारे। उस शुभ कर्ममें स्त्रियोंके भाई-बन्धु, अपने बन्धुओंका समुदाय, नानाका तथा उनके बन्धुओंका कुटुम्ब—ये सभी सम्मिलित हुए। फिर भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा, द्विजवर कृपाचार्य, पत्नी और पुत्रोंसहित धृतराष्ट्र, हर्ष और शोकमें भरी हुई पुत्रोंसहित विधवा कुन्ती तथा विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए योग्य राजा और राजकुमार भी आये। नारद! अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, महातपस्वी भरद्वाज, याज्ञवल्क्य, भीम, गार्ग्य, महातपस्वी गर्ग, वत्स, पुत्रसहित धर्म, जैगीषव्य, पराशर, पुलह, पुलस्त्य, अगस्त्य, सौभरि, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, भगवान् सनत्कुमार, वोढु, पञ्चशिख, दुर्वासा, अङ्गिरा, व्यास, व्यासनन्दन शुकदेव, कुशिक, कौशिक, परशुराम, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, शृङ्गी, वामदेव, गुणके सागर गौतम, क्रतु, यति, आरुणि, शुक्राचार्य, बृहस्पति, अष्टावक्र, वामन, पारिभद्र, वाल्मीकि, पैल, वैशम्पायन, प्रचेता, पुरुजित्, भृगु, मरीचि, मधुजित्, प्रजापति कश्यप, देवमाता अदिति, दैत्यजननी दिति, सुमन्तु, सुभानु, एक, कात्यायन, मार्कण्डेय, लोमश, कपिल, पराशर, पाणिनि, पारियात्र, मुनिवर पारिजात, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), विश्वामित्र, शतानन्द, जाबालि, तैतिर, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु ब्रह्मांशभूत सान्दीपनि, उपमन्यु, गौरमुख, मैत्रेय, श्रुतश्रवा, कठ, कच, करथ, धर्मज्ञ भरद्वाज—ये सभी मुनि शिष्योंसहित वसुदेवजीके आश्रमपर