भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 747, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 747

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३७


परमेश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति की।

मुने ! इस प्रकार जब देवताओं और मुनियोंने मन-ही-मन श्रीकृष्णकी स्तुति करके विराम लिया, तब आँगनमें पीले वस्त्रसे सुशोभित श्रीकृष्णको देखा। उस समय उनकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसी मालतीकी मालासे सुशोभित बकपङ्क्ति तथा बिजलीसे युक्त नूतन मेघकी होती है। उनके ललाटपर कस्तूरीयुक्त चन्दनका मण्डलाकार तिलक बादलमें छिपे हुए कलङ्कयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था। उनके दो भुजाएँ थीं। उन राधाकान्तका शरीर श्याम, कमनीय और मनोहर था। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा थी। वे भक्तानुग्रह-मूर्ति तथा रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और करधनीसे सुशोभित थे और बलरामसहित पिताकी गोदमें विराज रहे थे। तदनन्तर मनोरम शुभलग्नके आनेपर जब कि लग्नेश उच्च स्थानमें स्थित था, उसपर सौम्य ग्रहोंकी दृष्टि पड़ रही थी, केवल सद्ग्रह ही उसे देख रहे थे तथा वह असद्ग्रहोंकी दृष्टिसे परे था। ऐसे मङ्गल-कालमें देवताओं और ब्राह्मणोंकी आज्ञासे वसुदेवजीने स्वस्तिवाचनपूर्वक शुभकर्म आरम्भ किया। उस समय उन्होंने ब्राह्मणको आदरसहित सौ मोहरें दान देकर देवगण, मुनिगण, पुरोहित गर्गजी, गणेश, सूर्य, अग्नि, शंकर और पार्वतीको नमस्कार किया। फिर उस देवसमाजमें छः प्रधान देवताओंकी भक्तिपूर्वक अक्षतसहित षोडशोपचारद्वारा पूजा करके वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक पुत्रका अधिवासन (सुगन्धित पदार्थका अनुलेप अर्थात् हरिद्राकर्म) किया। फिर अनेकानेक देवताओं, दिक्पालों और नवग्रहोंका भलीभाँति पूजन करके षोडश मातृकाओंको भक्तिपूर्वक पञ्चोपचार समर्पित किया। घीसे सात बार वसुधारा दिया। पुनः चेदिराज वसुका पूजन-नमस्कार करके वे आगे बढ़े और वृद्धिश्राद्धको समाप्त करके जो कुछ अन्य देवसम्बन्धी कार्य था; उसे सम्पन्न किया। इसके बाद वेदोक्त यज्ञ करके हर्षपूर्वक अग्रज बलदेव और परमात्मा श्रीकृष्णको यज्ञसूत्र (जनेऊ) पहनाया। मुनिवर सांदीपनिने उन दोनोंको गायत्री-मन्त्र प्रदान किया। पहले-पहल पार्वतीने बड़े आदरके साथ बहुमूल्य रत्नद्वारा निर्मित पात्रमें रखे हुए मोती, माणिक्य और हीरोंको भिक्षारूपमें समर्पित किया। पिता वसुदेवजीने हीरेका बना हुआ हार देकर श्वेत पुष्प और दूर्वाङ्कुरद्वारा शुभाशीर्वाद प्रदान किया। तत्पश्चात् अदिति, दिति, मुनिपत्नियों, देवकी, यशोदा, रोहिणी, सावित्री और सरस्वती—इन सभीने हर्षपूर्वक अलग-अलग मणि और सुवर्णसे भूषित भिक्षा प्रदान की। इसके बाद जिनके नेत्र स्निग्ध थे और मुखपर मुस्कानकी छटा छा रही थी; वे देवकन्याएँ, नागकन्याएँ, राजकन्याएँ, पतिव्रताएँ, भाई-बन्धुओंकी स्त्रियाँ, इन्द्राणी, वरुणाणी, पवन-पत्नी, रोहिणी, कुबेर-पत्नी, स्वाहा और कामदेवकी प्रियतमा रति—इन लोगोंने पृथक्-पृथक् रत्नाभरणोंसे विभूषित भिक्षा दी। तब बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्णने भक्तिपूर्वक भिक्षा ग्रहण करके उसका कुछ भाग पुरोहित गर्गजीको तथा कुछ भाग अपने गुरु सांदीपनि मुनिको दे दिया। फिर वैदिक कर्म समाप्त करके गर्गजीको दक्षिणा दी गयी। आदरपूर्वक देवताओं और ब्राह्मणोंको भी भोजन कराया गया। तदनन्तर उस यज्ञमें जो-जो लोग आये थे, वे सभी बलदेव और श्रीकृष्णको शुभाशीर्वाद देकर प्रसन्नमनसे अपने-अपने गृहको लौट गये। तब पत्नीसहित नन्द पुत्रके उस शुभकर्मको समाप्त करके बलराम और श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन दोनोंका मुख चूमने लगे। उस समय नन्द और पतिव्रता यशोदा उच्चस्वरसे रो पड़ीं, तब श्रीकृष्णने बड़े यत्नसे उन्हें आश्वासन देकर समझाते हुए कहा।

श्रीकृष्ण बोले— तात! तुम मेरे परमार्थतः पिता हो और हे माता यशोदा! तुम्हीं मेरी पालन-