भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो वैश्यजातीय नन्दका पुत्र, गौओंका चरवाहा, गोपाङ्गनाओंका लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है, उसे आप कन्या देना स्वीकार करते हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात है! राजेन्द्र! इस बकवादीके वचनसे आपकी बुद्धि मारी गयी है; इसी कारण इस भिक्षुक ब्राह्मणके कहनेसे आप देवयोग्या रुक्मिणीको श्रीकृष्णके हाथों सौंपना चाहते हैं। अरे! वह तो न राजपुत्र है, न शूरवीर है, न कुलीन है, न पवित्र आचरणवाला है, न दाता है, न धनी है, न योग्य है और न जितेन्द्रिय ही है। इसलिये भूपाल! आप शिशुपालको कन्या दीजिये; क्योंकि वह सुपूत एवं राजाधिराजका पुत्र है तथा अपने बलसे रुद्रको भी संतुष्ट कर चुका है। राजन्! अब शीघ्र ही पत्र भेजकर विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए नरेशों, भाई-बन्धुओं तथा मुनिवरोंको निमन्त्रित कीजिये।

तदनन्तर रुक्मीकी बात सुनकर पुरोहितसहित राजेन्द्र भीष्मकने एकान्त स्थानमें मन्त्रीके साथ पूर्णरूपसे सलाह की। तत्पश्चात् जो सबको अभीष्ट था, ऐसा शुभ लग्न निश्चित करके एक योग्य एवं अन्तरङ्ग ब्राह्मणको द्वारका भेजनेकी व्यवस्था की। इधर राजा तुरंत ही हर्षपूर्वक सामग्री जुटानेमें लग गये और पुत्रके कहनेसे उन्होंने चारों ओर निमन्त्रण-पत्र भेज दिये। उधर उस ब्राह्मणने सुधर्मा-सभामें, जो राजाओं तथा देवताओंसे परिवेष्टित थी; पहुँचकर राजा उग्रसेनको वह मङ्गल-पत्रिका दी। उस परम माङ्गलिक पत्रको सुनकर राजा उग्रसेनका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको हजारों स्वर्णमुद्राएँ दान कीं और द्वारकामें चारों ओर दुन्दुभिका शब्द कराकर घोषणा करा दी। श्रीकृष्णकी उस बारातमें बड़े-बड़े देवता, मुनि, राजागण, यादवगण, कौरव, पाण्डव, विद्वान् ब्राह्मण, माली, शिल्पी, गायक, गन्धर्व आदि सम्मिलित हुए। उस समय उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें तुम नारद भी बारातके साथ थे। (अध्याय १०५)


रेवती और बलरामके विवाहका वर्णन तथा रुक्मी, शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रका श्रीकृष्णको कटुवचन कहना

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी समय महाबली राजा ककुद्मी अपनी कन्याके लिये वरकी तलाशमें ब्रह्मलोकसे भूतलपर आये। उनकी कन्याका नाम रेवती था। वह निरन्तर स्थिर यौवनवाली, अमूल्य रत्नोंसे विभूषित और तीनों लोकोंमें दुर्लभ थी। उसकी आयुके सत्ताईस युग बीत चुके थे। राजाने कौतुकवश अपनी उस कन्याको महाबली बलदेवको ब्याह दिया। इस प्रकार मुनियों तथा देवेन्द्रोंकी सभामें विधानपूर्वक कन्यादान करके राजाने लाखों-लाखों हाथी, घोड़े, रथ, रत्नाभूषण, मणि-रत्न, करोड़ों स्वर्णमुद्राएँ जामाताको दहेजमें दीं तथा सुन्दर दिव्य वस्त्रादि दिये। यों बलशाली बलदेवको कन्या देकर राजेन्द्र ककुद्मी अमूल्य रत्नोंके सारसे निर्मित रथद्वारा कुण्डिन-नगरको गये। तदनन्तर उस वैवाहिक मङ्गल-कार्यके समाप्त होनेपर देवकी, रोहिणी, नन्दपत्नी यशोदा, अदिति, दिति और शान्तिने जय-जयकार करके रेवतीको, जो नारियोंमें श्रेष्ठ तथा लक्ष्मीकी कलास्वरूपा थीं, महलमें प्रवेश कराया। तत्पश्चात् वसुदेवजीकी प्रियतमा पत्नी देवकीने हर्षपूर्वक सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न कराया और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें धन दान दिया।

तदनन्तर देवताओं और मुनियोंका समुदाय तथा देश-देशान्तरके नरेश आनन्दमग्न हो अपनी-अपनी सेनाओंके साथ सहसा कुण्डिन-नगरमें