ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४७
आ पहुँचे। उन सब लोगोंने उस परम मनोहर नगरका अवलोकन किया। बारातियोंने उस नगरके बाहरी दरवाजेको देखा; चार महारथी सैनिकोंके साथ उसकी रक्षा कर रहे थे। उनके नाम थे—रुक्मी, शिशुपाल, महाबली दन्तवक्र और मायावियोंमें श्रेष्ठ एवं युद्ध-शास्त्रमें निपुण शाल्व। उस समय राजकुमार रुक्मि, जो युद्धके लिये उद्यत हो नाना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित रथपर सवार था, श्रीकृष्णकी सेनाका अवलोकन करके कुपित हो उठा और
ऐसे निष्ठुर वचन कहने लगा जो कर्णकटु, अत्यन्त दुष्कर तथा मुनीन्द्रों, देवगणों और मुनिवरोंके लिये उपहासास्पद थे।
रुक्मिने कहा—अहो! कालकृत कर्म और दैवको कौन हटा सकता है? भला, मैं देवेन्द्रोंकी सभामें क्या कहूँगा; क्योंकि जो नन्दके पशुओंका रखवाला, गोपियोंका साक्षात् लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है तथा जिसकी जाति, खान-पान और उत्पत्तिका कोई निर्णय ही नहीं है; यह भी पता नहीं कि क्या वह राजकुमार है अथवा किसी मुनिका पुत्र है; जिसके पिता वसुदेव क्षत्रिय हैं, परंतु जिसका भरण-पोषण वैश्यके घर हुआ है; जिस दुष्टने अभी हालमें ही मथुरामें धर्मात्मा राजा कंसको मार डाला है, अतः उस राजेन्द्रके वधसे जिसे निश्चय ही ब्रह्महत्या लगी है; वह कृष्ण देवताओं और मुनियोंके साथ देवयोग्य मनोहारिणी कन्या रुक्मिणीको ग्रहण करनेके लिये आ रहा है। फिर शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रने भी कुवाक्य कहे। इन सबके दुर्वचनोंको सुनकर बारातमें आये हुए देवता, मुनि, राजागण और बलदेवजीसहित यादवोंको क्रोध आ गया। (अध्याय १०६)
रुक्मी आदिका यादवोंके साथ युद्ध, शाल्वका वध, रुक्मीकी सेनाका पलायन, बारातका पुरीमें प्रवेश और स्वागत-सत्कार, शुभलग्नमें श्रीकृष्णका बारातियों तथा देवोंके साथ राजाके आँगनमें जाना, भीष्मकद्वारा सबका सत्कार करके श्रीकृष्णका पूजन
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर बलदेवजीने हलके द्वारा रुक्मिका रथ भङ्ग कर दिया। फिर तो घोर युद्ध आरम्भ हो गया। शाल्व मारा गया। बलदेवजी शिशुपालको मार रहे थे; परंतु उसे श्रीकृष्णके द्वारा मारे जानेवाला समझकर शिवजीने बलदेवजीको रोक दिया। बलदेवजीके विक्रमको देखकर सब इधर-उधर भाग गये।
तब महामुनि शतानन्दजीने आकर अभ्यर्थना की। बारातने पुरीमें प्रवेश किया। बड़ा भारी स्वागत-सत्कार किया गया। उस समयकी वर-रूपमें सुसज्जित श्रीकृष्णकी शोभा अवर्णनीय थी। उनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके समान