ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५१
लिया, जैसे भगवान् शंकरने भवानीको ग्रहण
किया था। इसके बाद राजाने परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णको पाँच लाख अशर्फियाँ दक्षिणामें दीं। इस प्रकार मुनियों और देवेन्द्रोंकी सभामें उस शुभ कर्मके समाप्त होनेपर राजा मोहवश कन्याको हृदयसे चिपटाकर रोने लगे और अपने दोनों नेत्रोंके जलसे उन्होंने उस श्रेष्ठ कन्याको भिगो दिया। फिर वचनद्वारा उसका परिहार करके उन्होंने उसे श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया।
इसी समय रुक्मिणीकी माता महारानी सुन्दरी सुभद्रा आनन्दमग्न हो पति-पुत्रवती साध्वी महिलाओंके साथ वहाँ आयीं और निर्मन्थन आदि मङ्गल-कार्य करके दम्पतिको एक ऐसे रत्ननिर्मित महलमें लिवा ले गयीं, जो नाना प्रकारकी विचित्र चित्रकारीसे सुशोभित, हीरेके हारसे विभूषित तथा मोती, माणिक्य, रत्न और दर्पणसे उद्दीप्त था। वहीं श्रीकृष्णने दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, सरस्वती, सावित्री, रति, सती, रोहिणी, पतिव्रता देवपत्नी, राजपत्नी और मुनिपत्नियोंको देखा, जो रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर आसीन थीं। वे सभी जगदीश्वर श्रीकृष्णको निकट आया देखकर अपने-अपने आसनोंसे उठ पड़ीं और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर समागत देवाङ्गनाओं तथा मुनिपत्नियोंने अञ्जलि बाँधकर क्रमशः पृथक्-पृथक् उन माधवकी स्तुति की। महारानी सुभद्राने वरसहित कन्याको भोजन कराया और सुवासित जल तथा कर्पूरयुक्त उत्तम पान प्रदान किया। तदनन्तर वहाँ दुर्गादेवीने सभी महिलाओंकी आज्ञासे श्रीकृष्णके हाथमें मङ्गल-पत्रिका दी और उनसे उसे पढ़नेके लिये कहा। तब देवियोंके उस समाजमें श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उस पत्रिकाको पढ़ने लगे। (उसमें लिखा था—) लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, सती, राधिका, तुलसी, पृथ्वी, गङ्गा, अरुन्धती, यमुना, अदिति, शतरूपा, सीता, देवहूति, मेनका—ये सभी देवियाँ दम्पतिका परम मङ्गल करें।* जब श्रीकृष्णने इस प्रकार पढ़ा, तब वे उसे सुनकर विनोद करने लगीं।
तदनन्तर राजा भीष्मकने भी देवगणों, मुनिवरों तथा भूपालोंका विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें आदरसहित भोजन कराया। उस समय कुण्डिननगरमें माङ्गलिक वाद्य और संगीतके साथ-साथ 'लोगो! खाओ-खाओ, देते जाओ-देते जाओ' ऐसे शब्द गूँज रहे थे। प्रातःकाल होनेपर ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा भूपालगण उतावलीपूर्वक अपने-अपने वाहनोंपर सवार हुए। इधर महाराज उग्रसेन और वसुदेवजीने भी शीघ्रतापूर्वक श्रीकृष्ण और सती रुक्मिणीकी यात्रा करायी। उस समय रुक्मिणीकी
* लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा सावित्री राधिका सती॥
तुलसी पृथिवी गङ्गारुन्धती यमुनादितिः। शतरूपा च सीता च देवहूतिश्च मेनका॥
देव्यश्चैता दम्पतीनां कुर्वन्तु मङ्गलं परम्।
(१०९। ९–११)