ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 762, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें७५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण माता सुभद्रा कन्याको अपनी छातीसे लगाकर उसकी सखियों तथा बान्धवोंके साथ उच्च स्वरसे रोने लगीं और इस प्रकार बोलीं। सुभद्राने कहा—वत्से ! तू मुझ अपनी माताका परित्याग करके कहाँ जा रही है ? भला, मैं तुझे छोड़कर कैसे जी सकूँगी ? और तू भी मेरे बिना कैसे जीवन धारण करेगी ? रानी बेटी ! तू महालक्ष्मी है, तूने मायासे ही कन्याका रूप धारण कर रखा है। अब तू वसुदेव-नन्दनकी प्रिया होकर मेरे घरसे वसुदेवजीके भवनको जा रही है। यों कहकर रानीने शोकवश नेत्रोंके जलसे अपनी कन्याको भिगो दिया। भीष्मकने भी आँखोंमें आँसू भरकर अपनी कन्या श्रीकृष्णको समर्पित कर दी। इस प्रकार उसका परिहार करके वे फूट-फूटकर रोने लगे। तब रुक्मिणीदेवी तथा श्रीकृष्ण भी लीलासे आँसू टपकाने लगे। तत्पश्चात् वसुदेवजीने पुत्र और पुत्रवधूको रथपर चढ़ाया। इस अवसरपर राजा भीष्मक अपने जामाताको दहेज देने लगे। उन्होंने हर्षपूर्ण हृदयसे एक हजार गजराज, छः हजार घोड़े, एक सहस्र दासियाँ, सैकड़ों नौकर, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण, एक हजार रत्न, पाँच लाख शुद्ध सुवर्णकी मोहरें, विश्वकर्माद्वारा निर्मित सोनेके सुन्दर-सुन्दर जलपात्र तथा भोजनपात्र, बहुत-सी गायें, एक हजार दूधवाली सवत्सा धेनुएँ और बहुत-से बहुमूल्य रमणीय अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान किये। तब वसुदेव और उग्रसेन देवताओं और मुनियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र ही द्वारकाकी ओर चले। वहाँ अपनी रमणीय पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने मङ्गल- कृत्य कराये, सुन्दर एवं अत्यन्त मनोहर बाजे बजवाये। तदनन्तर देवकी, सुन्दरी रोहिणी, नन्दपत्नी यशोदा, अदिति, दिति तथा अन्यान्य सौभाग्यवती नारियाँ श्रीकृष्ण और सुन्दरी रुक्मिणीकी ओर बारंबार निहारकर उन्हें घरके भीतर लिवा ले गयीं और उन्होंने उनसे मङ्गल-कृत्य करवाये। फिर देवताओं, मुनिवरों, नरेशों और भाई- बन्धुओंको चतुर्विध (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) भोजन कराकर उन्हें बिदा किया। पुनः हर्षमग्न हो भृष्ट ब्राह्मणोंको इतने रत्न आदि दान किये, जिससे वे प्रसन्न और संतुष्ट हो गये। उन्हें भोजन भी कराया। इस प्रकार भोजन करके और धन लेकर वे सभी खुशी-खुशी अपने घरोंको गये। यों वसुदेव-पत्नीने सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न कराया। (अध्याय १०८-१०९) श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके संदेशद्वारा चैतन्य करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! इस प्रकार उस साङ्गोपाङ्ग मङ्गल-कार्यके अवसरपर पधारे हुए लोगोंके चले जानेपर नन्दजी यशोदाके साथ अपने प्रिय पुत्र (श्रीकृष्ण)-के निकट गये। वहाँ जाकर यशोदाने कहा—माधव ! तुमने अपने पिता नन्दजीको तो ज्ञान प्रदान कर ही दिया, परंतु बेटा ! मैं तुम्हारी माता हूँ; अतः कृपानिधे ! मुझपर भी कृपा करो। महाभाग ! तुम पृथ्वीका उद्धार करनेवाले और भक्तोंको उबारनेवाले हो। मैं भयभीत हो इस भयंकर भवसागरमें पड़ी हुई हूँ। मायामयी प्रकृति ही इस भवसागरसे तरनेके लिये नौका है और तुम्हीं उसके कर्णधार हो; अतः कृपामय ! मेरा उद्धार करो। यशोदाकी बात सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जो ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु हैं, हँस पड़े और भक्तिपूर्वक मातासे बोले।