ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४२-४३ ] अध्याय २ १८९ परमेश्वर उसको कर्मोंमें नियुक्त करनेवाला है, इससे जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। श्रुतियोंमें भी जगह-जगह भेदका प्रतिपादन किया गया है (श्वेता० उ० ४।६-७) परन्तु कहीं-कहीं अभेदका भी प्रतिपादन है (बृह० उ० ४।४।५) तथा समस्त जगत्का कारण एक परब्रह्म परमेश्वर ही बताया गया है, इससे भी अभेद सिद्ध होता है। अतः उक्त विरोधका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्व- मधीयत एके ॥ २ । ३ । ४३ ॥ नानाव्यपदेशात् = श्रुतिमें जीवोंको बहुत और अलग-अलग बताया गया है, इसलिये; च=तथा; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अपि=भी; (यही सिद्ध होता है कि) अंशः =जीव ईश्वरका अंश है; एके=क्योंकि एक शाखावाले; दाशकित- वादित्वम्=ब्रह्मको दाशकितव आदिरूप कहकर; अधीयते=अध्ययन करते हैं। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।१२-१३) में कहा है कि— एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ‘बहुत-से निष्क्रिय जीवोंपर शासन करनेवाला जो एक परमेश्वर एक बीज (अपनी प्रकृति)को अनेक प्रकारसे विस्तृत करता है, उस अपने हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानीजन निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं। जो एक नित्य चेतन परब्रह्म परमेश्वर बहुत-से नित्य चेतन जीवोंके कर्मफलभोगोंका विधान करता है, वही सबका कारण है, उस ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य परमदेव परमेश्वरको जानकर जीवात्मा समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।’ इस प्रकार श्रुतिमें जीवोंके नानात्वका प्रतिपादन किया गया है; साथ ही उसको नित्य और चेतन भी कहा गया है और ईश्वरको जगत्का कारण बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। केवल इतनेसे ही नहीं, प्रकारान्तरसे भी जीवगण ईश्वरके अंश