बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1004, कुल 1402 में से
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| ९९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| गन्तेति, तथा द्रष्टेत्यत्रापीति चेत् ? | समान द्रष्टा पदमें भी समझना चाहिये—ऐसा कहें तो ? |
|---|---|
| न, प्रकाशयितेति दृष्टत्वात् । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ नित्यप्रकाशस्वरूप आदित्यादिके विषयमें ] 'प्रकाशयिता' ऐसा प्रयोग देखा जाता है। |
| भवतु प्रकाशकेष्वन्यथासम्भवात्, न स्वात्मनीति चेत् ? | शङ्का—प्रकाशकोंमें कोई अन्य प्रकार न हो सकनेके कारण वहाँ भले ही ऐसा प्रयोग हो जाय, परंतु आत्माके विषयमें तो ऐसा नहीं हो सकता। |
| न, दृष्ट्यविपरिलोपश्रुतेः । | समाधान--नहीं, क्योंकि यहां भी आत्मदृष्टिके लोप न होनेका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है। |
| पश्यामि न पश्यामीत्यनुभवदर्शनान्नेति चेत् ? | शङ्का—मैं देखता हूँ, मैं नहीं देखता—ऐसा विपरीत अनुभव देखा जानेके कारण आत्माकी दृष्टि नित्य नहीं हो सकती—ऐसा कहें तो ? |
| न, करणव्यापारविशेषापेक्षत्वात्; उद्धृतचक्षुषां च स्वप्ने आत्मदृष्टेरविपरिलोपदर्शनात् । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह अनुभव तो [ चक्षु ] इन्द्रियके विशेष व्यापारकी अपेक्षासे है; इसके सिवा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, उनकी भी स्वप्नमें आत्म-दृष्टिका अविपरिलोप ( सद्भाव ) देखा जाता है। अतः आत्माकी दृष्टि |
| तस्मादविपरिलुप्तस्वभावैवात्मनो दृष्टिः, अतस्तयाविपरिलुप्तया | तो अविपरिलुप्तस्वभावा ही है, इसलिये यह पुरुष उस अविनाशिनी |
१. कभी नष्ट न होनेवाली ।