बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1014, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १००० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
|---|
अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है ॥ ३१ ॥
| यत्र यस्मिञ्जागरिते स्वप्ने वा अन्यदिव आत्मनो वस्त्वन्तरमिवाविद्यया प्रत्युपस्थापितं भवति, तत्र तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितादन्यः अन्यमिव आत्मानं मन्यमानः, असत्यात्मनः प्रविभक्ते वस्त्वन्तरे, असति चात्मनि ततः प्रविभक्ते, अन्योऽन्यत् पश्येदुपलभेत। तच्च दर्शितं स्वप्ने प्रत्यक्षतो 'घ्नन्तीव जिनन्तीव' इति। तथान्योऽन्यञ्जिघ्रेद् रसयेद् वदेच्छृणुयान्मन्वीत स्पृशेद्विजानीयादिति ॥ ३१ ॥ | जहाँ-जिस जागरित या स्वप्नमें अन्यके समान अर्थात् अविद्याद्वारा उपस्थित की हुई आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु होती है, वहाँ आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुके न होनेपर तथा आत्माके उससे भिन्न न होनेपर भी उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत की हुई वस्तुसे अपनेको अन्यवत् मानता हुआ अन्य अन्यको देखता अर्थात् उपलब्ध करता है। यह बात स्वप्नावस्थामें 'मानो मारते हैं, मानो वशमें करते हैं' इस अनुभवद्वारा प्रत्यक्ष दिखायी गयी है। इसी प्रकार अन्य अन्यको सूँघ सकता है, चख सकता है, बोल सकता है, सुन सकता है, मनन कर सकता है, स्पर्श कर सकता है, जान सकता है ॥ ३१ ॥ |
सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति
| यत्र पुनः साविद्या सुषुप्ते वस्त्वन्तरप्रत्युपस्थापिका शान्ता, तेनान्यत्वेन अविद्याप्रविभक्तस्य वस्तुनोऽभावात् तत् केन कं पश्येज्जिघ्रेद् विजानीयाद् वा ? अतः— | किंतु जहाँ सुषुप्तावस्थामें अन्य वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली वह अविद्या शान्त हो जाती है, वहाँ उससे भिन्न रूपसे अविद्याद्वारा विभक्त वस्तुका अभाव हो जानेके कारण वह किस इन्द्रियसे किसे देखे, सूँघे अथवा जाने ? इसलिये— |