बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1015, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००१
सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया। यह इस (पुरुष) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम लोक है, यह इसका परमानन्द है। इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३२ ॥
| स्वेनैव हि प्राज्ञेनात्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन सम्परिष्वक्तः समस्तः सम्प्रसन्न आप्तकाम आत्मकामः सलिलवत्स्वच्छीभूतः सलिल इव सलिल एको द्वितीयस्याभावात्। अविद्यया हि द्वितीयः प्रविभज्यते; सा च शान्तात्र अत एकः। द्रष्टा दृष्टेरविपरिलुप्तत्वादात्मज्योतिःस्वभावायाः, अद्वैतो द्रष्टव्यस्य द्वितीयस्याभावात्। | अपने ही स्वयंज्योतिःस्वभाव प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलिङ्गित, अपरिच्छिन्न, सम्यक् प्रसादयुक्त, आप्तकाम, आत्मकाम, जलके समान स्वच्छ, मानो जलमें [अर्थात् जैसे जलमें प्रतिबिम्बित उसका साक्षी शुद्ध जलरूप ही है वैसा ही] एक द्रष्टा है, क्योंकि उससे भिन्न दूसरेकी सत्ता नहीं है। दूसरेका विभाग तो अविद्याद्वारा ही होता है और वह यहाँ शान्त हो गयी है; इसलिये एक द्रष्टा है। आत्मज्योतिःस्वभावा दृष्टिका लोप न होनेके कारण वह द्रष्टा है तथा अन्य द्रष्टव्यका अभाव होनेके कारण वह अद्वैत है। |