बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1016, कुल 1402 में से
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| १००२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| एतदमृतमभयम् । एष ब्रह्मलोको ब्रह्मव लोको ब्रह्मलोकः। पर एवायमस्मिन् काले व्यावृत्तकार्यकरणोपाधिभेदः स्वे आत्मज्योतिषि शान्तसर्वसम्बन्धो वर्तते हे सम्राट् ! इति हैवं हैन॑ जनकमनुशशास अनुशिष्टवान् याज्ञवल्क्य इति श्रुतिवचनमेतत् । | यह अमृत और अभय है। यह ब्रह्मलोक है—जहाँ ब्रह्म ही लोक है ऐसा यह ब्रह्मलोक है। हे सम्राट् ! इस समय अपनी देहेन्द्रियरूप उपाधिसे छूटकर सब सम्बन्धोंसे मुक्त हो परमात्मा ही अपनी आत्मज्योतिमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार याज्ञवल्क्यने इस जनकको अनुशासन—उपदेश किया—यह श्रुतिका वाक्य है। |
| कथं वानुशशास ? एषास्य विज्ञानमयस्य परमा गतिः। यास्त्वन्या देहग्रहणलक्षणा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता अविद्याकल्पितास्ता गतयोऽतोऽपरमा अविद्याविषयत्वात् । इयं तु देवत्वादिगतीनां कर्मविद्यासाध्यानां परमोत्तमा यः समस्तात्मभावः, यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानातीति । | किस प्रकार उपदेश किया ?—इस विज्ञानमयकी यह परम गति है। इससे भिन्न जो ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त शरीरग्रहणरूपा गतियां हैं वे अविद्याकल्पित हैं, अतः अविद्याकी विषय होनेके कारण वे अपरमा (निकृष्ट) हैं। किंतु यह जो सर्वात्मभाव है, वह कर्म और उपासनाद्वारा साध्य देवत्वादि गतियोंसे परम—उत्तम है, जहाँ कि पुरुष किसी अन्यको नहीं देखता, किसी अन्यको नहीं सुनता और न किसी अन्यको जानता है। |
| एषैव चपरमा सम्पत् सर्वासां सम्पदां विभूतीनामियं परमा स्वाभाविकत्वादस्याः; कृतका ह्यन्याः सम्पदः। तथैषोऽस्यपरमो लोकः, येऽन्ये कर्मफलाश्रया | यही परम सम्पत् है, सम्पूर्ण सम्पदाओं अर्थात् विभूतियोंमें यह श्रेष्ठ है; क्योंकि यह स्वाभाविक है और दूसरे प्रकारकी सम्पत्तियाँ कृत्रिम हैं तथा यह इसका परम लोक है, दूसरे जो कर्मफलके आश्रित |