बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1017, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1017
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | १००३ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| लोकास्तेऽस्मदपरमाः । अयं तु न केनचन कर्मणा मीयते, स्वाभाविकत्वात्; एषोऽस्य परमो लोकः । | लोक हैं, वे इससे निकृष्ट हैं। किंतु यह स्वाभाविक होनेके कारण किसी भी कर्मद्वारा प्राप्त नहीं होता; अतः यह इसका परम लोक है। |
| तथैषोऽस्य परम आनन्दः । यान्यन्यानि विषयेन्द्रियसम्बन्धजनितान्यानन्दजातानि तान्यपेक्ष्य एषोऽस्य परम आनन्दो नित्यत्वात् । "यो वै भूमा तत् सुखम्" (छा० उ० ७।२३।१) इति श्रुत्यन्तरात् । यत्रान्यत् पश्यत्यन्यद् विजानाति तदल्पं मर्त्यममुख्यं सुखम्, इदं तु तद्विपरीतम्, अत एवैषोऽस्य परम आनन्दः । | तथा यह इसका परम आनन्द है। दूसरे जो विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले आनन्द हैं, उनकी अपेक्षा यह उत्कृष्ट आनन्द है, क्योंकि यह नित्य है, जैसा कि "जो भूमा है, निश्चय वही सुख है" इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको जानता है, वह अल्प, मर्त्य और अमुख्य सुख है, किंतु यह उससे विपरीत है, इसीसे यह इसका परम आनन्द है। |
| एतस्यैवानन्दस्य मात्रां कलामविद्याप्रत्युपस्थापितां विषयेन्द्रियसम्बन्धकालविभाव्यामन्यानि भूतान्युपजीवन्ति । कानि तानि ? तत एवानन्दादविद्यया प्रविभज्यमानस्वरूपाण्यन्यत्वेन तानि ब्रह्मणः परिकल्प्यमानान्यन्यानि सन्त्युपजीवन्ति भूतानि विषयेन्द्रियसम्पर्कद्वारेण विभाव्यमानाम् ॥ ३२ ॥ | इसी आनन्दकी अविद्याद्वारा प्रस्तुत तथा विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धके समय होनेवाली मात्रा कलाके आश्रित दूसरे जीव जीवन धारण करते हैं। वे जीव कौन हैं? जो उस आनन्दसे ही अविद्यावश विभक्त स्वरूप तथा ब्रह्मसे पृथक्-रूपसे परिकल्पित अन्य जीव हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्पर्क-द्वारा उस आनन्दकी कल्पित मात्रा-के उपजीवी होते हैं ॥ ३२ ॥ |