भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1021, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1021

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००७

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
मननाभावात्, तं परमानन्दं विवक्षन्नाह—संख्याका व्यवहार नहीं रहता, उस परमानन्दका वर्णन करनेकी इच्छासे यहाँ श्रुति कहती है—
अथ ये मनुष्याणामेवम्प्रकाराः शतमानन्दभेदाः स एकः पितॄणाम्। तेषां विशेषणं जितलोकानामिति, श्राद्धादिकर्मभिः पितॄं-स्तोषयित्वा तेन कर्मणा जितो लोको येषां ये जितलोकाः पितरः; तेषां पितॄणां जितलोकानां मनुष्यानन्दशतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो भवति ।मनुष्योंके आनन्दके जो इस प्रकारके सौ भेद हैं, वह पितृगणका एक आनन्द है। 'जितलोक' यह उन पितृगणका विशेषण है, जिन्होंने श्राद्धादि कर्मोंसे पितरोंको संतुष्ट कर उस कर्मसे पितृलोकको जीता है; वे जितलोक पितृगण होते हैं; मनुष्यानन्दका सौ गुना किया हुआ परिमाण उन जितलोक पितृगणका एक आनन्द होता है।
सोऽपि शतगुणीकृतो गन्धर्वलोके एक आनन्दो भवति । स च शतगुणीकृतः कर्मदेवानामेक आनन्दः। अग्निहोत्रादिश्रौतकर्मणा ये देवत्वं प्राप्नुवन्ति ते कर्मदेवाः। तथैव आजानदेवानामेक आनन्दः— आजानत एव उत्पत्तित एव ये देवास्ते आजानदेवाः। यश्च श्रोत्रियोऽधीतवेदः, अवृजिनो वृजिनं पापं तद्रहितो यथोक्तकारीत्यर्थः; अकामहतो वीततृष्ण आजानदेवेभ्योऽर्वाग्द्या-वह भी सौ गुना किये जानेपर गन्धर्वलोकमें एक आनन्द होता है और वह सौ गुना करनेपर कर्मदेवोंका एक आनन्द है। अग्निहोत्रादि श्रौतकर्मके द्वारा जो देवत्व प्राप्त करते हैं, वे कर्मदेव कहलाते हैं। इसी प्रकार आजानदेवोंका एक आनन्द [ कर्मदेवोंके आनन्दसे सौगुना ] होता है। आजान अर्थात् उत्पत्तिसे ही जो देवता होते हैं, वे आजानदेव कहलाते हैं और जो श्रोत्रिय–वेद पढ़ा हुआ, अवृजिन–वृजिन पापको कहते हैं उससे रहित, अर्थात् शास्त्रोक्त कर्म करनेवाला है तथा अकामहत–आजानदेवोंसे नीचे जितने विषय हैं