बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1027, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०१३
| विस्तरेण सनिमित्तं संचरणं वर्णयितव्यमिति तदर्थोऽयमारम्भः। <br><br> तत्र च बुद्धान्तात् स्वप्नान्तम् अयमात्मानुप्रवेशितः। तस्मात् सम्प्रसादस्थानं मोक्षदृष्टान्तभूतम्। ततः प्रच्याव्य बुद्धान्ते संसारव्यवहारः प्रदर्शयितव्यः, इति तेनास्य सम्बन्धः। | उसके कारणसहित विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। <br><br> वहां (सतरहवें मन्त्रमें) इस आत्माका जागरितसे स्वप्नान्तमें अनुप्रवेश कराया गया है। अतः सम्प्रसाद (सुषुप्त)-स्थान मोक्षका दृष्टान्तभूत है। वहांसे च्युत करके जागरितमें संसारका व्यवहार प्रदर्शित करना है, अतः उसीसे इस (आगेके वाक्य) का सम्बन्ध है— |
आत्माकी संसाररूप जागरित-स्थानमें पुनरावृत्ति ·
स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥
वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे ही यथास्थान जागरित-अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥
| स वै बुद्धान्तात् स्वप्नान्तक्रमेण सम्प्रसन्न एष एतस्मिन् सम्प्रसादे स्थित्वा, ततः पुनरीषत् प्रच्युतः स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वेत्यादि पूर्ववद् बुद्धान्तायैव आद्रवति ॥ ३४ ॥ | जागरितसे स्वप्नान्तक्रमद्वारा सम्प्रसादको प्राप्त हुआ वह यह पुरुष इस सम्प्रसादमें स्थित रहकर फिर वहांसे थोड़ा च्युत हो स्वप्नान्तमें रमण और विहारकर—इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये—फिर जागरितस्थानको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥ |