बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1045, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| गमनादिसर्वविक्रियालक्षणः संव्यवहारः; तदात्मकं हि द्वादशविधं करणं बुद्ध्यादि । तत् सूत्रं तज्जीवनं सोऽन्तरात्मा जगतस्तस्थुषश्च । तेन प्रद्योतेन हृदयाग्रप्रकाशेन निष्क्रममाणः केन मार्गेण निष्क्रामति ? इत्युच्यते— | आगमन आदि सम्पूर्ण विकाररूप व्यवहार होते हैं और तद्रूप ही बुद्धि आदि बारह इन्द्रियाँ हैं । वह सूत्र है, वह जीवन है और वही स्थावर-जंगमका अन्तरात्मा है । उस प्रद्योतसे अर्थात् हृदयाग्रके प्रकाशसे निकलनेवाला आत्मा किस मार्गसे निकलता है, सो कहा जाता है- |
| चक्षुषो वा आदित्यलोकप्राप्तिनिमित्तं ज्ञानं कर्म वा यदि स्यात् । मूर्ध्नो वा ब्रह्मलोकप्राप्तिनिमित्तं चेत् । अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः शरीरावयवेभ्यो यथाकर्म यथाश्रुतम् । | यदि उसका ज्ञान या कर्म आदित्यलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो वह चक्षुद्वारसे निकलता है । यदि ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो मूर्धदेशसे निकलता है । इसी प्रकार अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार वह शरीरके अन्यान्य देश या अवयवोंसे निकल जाता है । |
| तं विज्ञानात्मानमुत्क्रामन्तं परलोकाय प्रस्थितं परलोकायोद्भूताकूतमित्यर्थः; प्राणः सर्वाधिकारिस्थानीयो राज्ञ इवानूत्क्रामति; तं च प्राणमनूत्क्रामन्तं वागादयः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति । यथाप्रधानानूवाचिख्यासा इयम्, न तु क्रमेण सार्थवद् गमनमिह विवक्षितम् । | उस विज्ञानात्माके उत्क्रान्त-परलोकके लिये प्रस्थित अर्थात् परलोकगमनके लिये वासनायुक्त होनेपर, राजाके सर्वाधिकारीके समान प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करता है और उस प्राणके उत्क्रान्त होनेपर वागादि सारे ही प्राण उसके साथ-साथ उत्क्रमण करते हैं । यहाँ लोगोंके समूहके समान विज्ञानात्मा, प्राण और इन्द्रियोंका एक साथ मिलकर क्रमसे जाना विवक्षित नहीं है, बल्कि उनके प्राधान्यके अनुसार उसका उल्लेख करना अभीष्ट है । |