भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1044
१०३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तदोपलक्ष्यते देवतानिर्वृत्तिः करणानां च हृदय एकीभावः । <br><br> तत्र हृदय उपसंहृतेषु करणेषु योऽन्तर्व्यापारः स कथ्यते— तस्य हैतस्य प्रकृतस्य हृदयस्य हृदयच्छिद्रस्येत्येतत्, अग्रं नाडीमुखं निर्गमनद्वारं प्रद्योतते स्वप्नकाल इव स्वेन भासा तेजोमात्रादानकृतेन स्वेनैव ज्योतिषा आत्मनैव च । तेनात्मज्योतिषा प्रद्योतेन हृदयाग्रेणैष आत्मा विज्ञानमयो लिङ्गोपाधिर्निर्गच्छति निष्क्रामति ! तथा आथर्वणे "कस्मिन्नवहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति" (प्र० उ० ६ । ३) "स प्राणमसृजत" (प्र० उ० ६ । ४) इति । <br><br> तत्र चात्मचैतन्यज्योतिः सर्वदाभिव्यक्ततरम् । तदुपाधिद्वारा ह्यात्मनि जन्ममरणगमना- | उस समय इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी निवृत्ति और इन्द्रियोंका हृदयमें एकीभाव उपलक्षित होता है। <br><br> उस समय इन्द्रियोंका हृदयमें उपसंहार हो जानेपर जो अन्तर्व्यापार होता है, उसका वर्णन किया जाता है—उस इस प्रकृत हृदयका अर्थात् हृदयच्छिद्रका अग्र नाडीमुख अर्थात् बाहर निकलनेका द्वार प्रद्योतित—अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, जिस प्रकार स्वप्नकालमें आत्मज्योतिसे स्थित रहता है, उसी प्रकार इस समय भी तेजोमात्राओंके ग्रहणके कारण आत्मज्योतिसे तथा स्वयं अपने-आपसे ही प्रकाशित हो जाता है। उस आत्मज्योतिसे प्रकाशित हृदयद्वारसे यह लिङ्गोपाधिक विज्ञानमय आत्मा निकल जाता है। ऐसा ही आथर्वण (प्रश्न) उपनिषद्में भी कहा है—"[उसने सोचा--] मैं किसके उत्क्रमण करनेपर उत्क्रान्त होऊँगा और किसके प्रतिष्ठित होनेपर प्रतिष्ठित हो जाऊँगा" "उसने प्राणकी रचना की" इत्यादि। <br><br> उस लिङ्गात्मामें आत्मचैतन्यज्योति सर्वदा अत्यन्त अभिव्यक्त रहती है। उस उपाधिके द्वारा ही आत्मामें जन्म, मरण, गमन, |