बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1043, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२९
सूँघता' ऐसा कहते हैं, [रसनेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [वागिन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [श्रोत्रेन्द्रिय] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [मन] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [त्वगिन्द्रिय] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं और यदि [बुद्धि लिङ्गात्मासे] एक रूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। उस इस हृदयका अग्र (बाहर जानेका मार्ग) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं; उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है; उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं॥ २॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकीभवति करणजातं स्वेन लिङ्गात्मना, तदेनं पार्श्वस्था आहुर्न पश्यतीति । तथा घ्राणदेवतानिवृत्तौ घ्राणमेकीभवति लिङ्गात्मना, तदा न जिघ्रतीत्याहुः । समानमन्यत् । जिह्वायां सोमो वरुणो वा देवता, तन्निवृत्त्यपेक्षया न रसयत इत्याहुः । तथा न वदति न शृणोति न मनुते न स्पृशति न विजानातीत्याहुः । | जब इन्द्रियवर्ग अपने लिङ्गदेहके साथ एकरूप हो जाते हैं, तब आसपास बैठे हुए लोग कहते हैं—'यह नहीं देखता'। इसी प्रकार जब घ्राणदेवताके निवृत्त होनेपर घ्राणेन्द्रिय लिङ्गात्माके साथ एकरूप हो जाती है, तब 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं। शेष अर्थ इसीके समान है । जिह्वामें सोम या वरुण देवता है, उसकी निवृत्तिकी अपेक्षासे 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं। इसी तरह 'नहीं बोलता, नहीं सुनता, मनन नहीं करता, स्पर्श नहीं करता, नहीं जानता' ऐसा कहते हैं। |