भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1060, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1060

१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४


अत्यन्ततात्पर्यतैव तन्मयत्वम्, न तु तत्कर्ममात्रेणेत्याशङ्क्याह—'णिनि' इस ताच्छील्य प्रत्ययको ग्रहण किया गया है, इसलिये कर्ममें अत्यन्त परायण होनेका स्वभाव ही तन्मयता है, केवल उस कर्म-मात्रसे तन्मयता नहीं होती—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—
पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् हो जाता है और पापकर्मसे पापी हो जाता है
पुण्यपापकर्ममात्रेणैव तन्मयता स्यान्न तु ताच्छील्यमपेक्षते । ताच्छील्ये तु तन्मयत्वातिशय इत्ययं विशेषः ।अर्थात् पुण्य-पापरूप कर्मसे ही पुरुषको तन्मयता प्राप्त हो जाती है, उसे वैसे स्वभाव होनेकी अपेक्षा नहीं रहती। ताच्छील्य (वैसा स्वभाव) होनेपर तो तन्मयताकी अधिकता होती है—इतना ही अन्तर है।
तत्र कामक्रोधादिपूर्वकपुण्यापुण्यकारिता सर्वमयत्वे हेतुः, संसारस्य कारणम्, देहाद्देहान्तरसंचारस्य च । एतत्प्रयुक्तो ह्यन्यदन्यद् देहान्तरमुपादत्ते । तस्मात् पुण्यापुण्ये संसारस्य कारणम् । एतद्विषयौ हि विधिप्रतिषेधौ । अत्र शास्त्रस्य साफल्यमिति ।ऐसी स्थितिमें कामक्रोधादिपूर्वक पुण्य या अपुण्यका आचरण करना ही जीवके सर्वमयत्वका हेतु, उसके संसारका कारण तथा एक देहसे दूसरे देहमें जानेका हेतु सिद्ध होता है। इससे प्रेरित होकर ही जीव दूसरे-दूसरे देहको ग्रहण करता है। अतः पुण्य और पाप संसारके कारण हैं। इन्हींके विषयमें विधि और प्रतिषेध होते हैं और यहीं शास्त्रकी सफलता है।

१. वह इसका स्वभाव है—इस अर्थमें होनेवाले प्रत्ययको ताच्छील्य-प्रत्यय कहते हैं। यहाँ 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' (३।२।७८) इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार 'णिनि' प्रत्यय हुआ है।