बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1059, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०४६
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| मदोमयः। अद इति परोक्षं कार्येण गृह्यमाणेन निर्दिश्यते। अनन्ता ह्यन्तःकरणे भावनाविशेषाः, नैव ते विशेषतो निर्देष्टुं शक्यन्ते। तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे कार्यतोऽवगम्यन्ते, इदमस्य हृदि वर्ततेऽदोऽस्येति। तेन गृह्यमाणकार्येणेदंमयतया निर्दिश्यते, परोक्षोऽन्तःस्थो व्यवहारोऽयमिदानीमदोमय इति। | अदोमय भी है। 'अदः' इस पदसे गृह्यमाण कार्यसे भिन्न परोक्ष वस्तुका निर्देश होता है। अन्तःकरणमें अनन्त भावनाविशेष हैं, उसका विशेषरूपसे निर्देश नहीं किया जा सकता। समय-समयपर उनके कार्यसे ही यह पता चलता है कि इसके हृदयमें यह भावना है और उसके हृदयमें यह। उस गृह्यमाण कार्यसे उनका इदंमयरूपसे निर्देश किया जाता है और जो अन्तःकरणमें स्थित परोक्ष व्यवहार है, वह इस समय अदोमय है। |
| संक्षेपतस्तु यथा कर्तुं यथा वा चरितुं शीलमस्य सोऽयं यथाकारी यथाचारी, स तथा भवति। करणं नाम नियता क्रिया विधिप्रतिषेधादिगम्या, चरणं नामानियतमिति विशेषः। | संक्षेपतः तो, जिसका जैसा करने या आचरणमें लानेका स्वभाव है, वह यथाकारी और यथाचारी होता है, जो यथाकारी (जैसा करनेवाला) है वह वैसा ही हो जाता है। विधि और प्रतिषेधसे ज्ञात होनेवाली जो नियत क्रिया है, उसका नाम 'करना' है और अनियत आचरणका नाम 'आचरणमें लाना' है, यह इन दोनोंका भेद है। |
| साधुकारी साधुर्भवतीति यथाकारित्यस्य विशेषणम्, पापकारी पापो भवतीति च यथाचारीत्यस्य। | साधु करनेवाला साधु होता है—यह 'यथाकारी' इस पदका विशेषण है और पाप करनेवाला पापी होता है—यह 'यथाचारी' इस पदका विशेषण है। |
| ताच्छील्यप्रत्ययोपादानाद् | 'यथाकारी और यथाचारी' इन पदोंमें |