भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1058, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1058

१०४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
एवं तस्मिन् विहते कामे केनचित् स कामः क्रोधत्वेन परिणमते, तेन तन्मयो भवन् क्रोधमयः। स क्रोधः केनचिदुपायेन निवर्तितो यदा भवति तदा प्रसन्नमनाकुलं चित्तं सदक्रोध उच्यते, तेन तन्मयः। एवं कामक्रोधाभ्याम् अकामाक्रोधाभ्यां च तन्मयो भूत्वा धर्ममयोऽधर्ममयश्च भवति । न हि कामक्रोधादिभिर्विना धर्मादिप्रवृत्तिरुपपद्यते। "यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत् कामस्य चेष्टितम्" इति स्मरणात् ।<br><br>धर्ममयोऽधर्ममयश्च भूत्वा सर्वमयो भवति। समस्तं धर्माधर्मयोः कार्यं यावत्किञ्चिद् व्याकृतम्, तत् सर्वं धर्माधर्मयोः फलं तत् प्रतिपद्यमानस्तन्मयो भवति। किं बहुना, तदेतत् सिद्धमस्य यदयमिदम्मयो गृह्यमाणविषयादिमयः, तस्मादय-इसी प्रकार किसीके द्वारा उस कामनाका विघात होनेपर वह काम क्रोधरूपमें परिणत हो जाता है, इसलिये तद्रूप होकर वह क्रोधमय हो जाता है। वह क्रोध जब किसी उपायसे निवृत्त हो जाता है, तब चित्त प्रसन्न और अनाकुल होनेपर अक्रोध कहा जाता है, उसके कारण वह अक्रोधमय हो जाता है। इस प्रकार काम-क्रोध और अकाम-अक्रोधके कारण तन्मय होकर वह धर्ममय और अधर्ममय भी हो जाता है, क्योंकि काम-क्रोधादिके बिना धर्मादिकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं है। "जीव जो-जो भी कर्म करता है, वह-वह कामकी ही चेष्टा है" इस स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है।<br><br>धर्ममय और अधर्ममय होकर वह सर्वमय हो जाता है। जितना कुछ व्याकृत है वह सब धर्म और अधर्मका ही कार्य है, वह सब धर्म और अधर्मका ही फल है, उसे प्राप्त करनेवाला भी तन्मय हो जाता है। अधिक क्या ? इसके विषयमें यह बात सिद्ध ही हे कि यह इदंमय—गृह्यमाण विषयादिमय है, इसलिये