भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1057, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1057

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०४३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
पृथिव्यादिभूतमयो भवति । तत्र पार्थिवशरीरारम्भे पृथिवीमयो भवति । तथा वरुणादिलोकेषु आप्यशरीरारम्भे आपोमयो भवति । तथा वायव्यशरीरारम्भे वायुमयो भवति । तथा आकाशशरीरारम्भे आकाशमयो भवति ।रम्भक पृथिवी आदि भूतमय हो जाता है। उस समय वह पार्थिव शरीरका आरम्भ होनेपर पृथिवीमय हो जाता है तथा वरुणादि लोकोंमें जलीय शरीरका आरम्भ होनेपर जलमय होता है एवं वायव्य शरीरका आरम्भ होनेपर वायुमय होता है और आकाशशरीरका आरम्भ होनेपर आकाशमय हो जाता है।
एवमेतानि तैजसानि देवशरीराणि तेष्वारभ्यमाणेषु तन्मयस्तेजोमयो भवति । अतो व्यतिरिक्तानि पश्चादिशरीराणि नरकप्रेतादिशरीराणि चातेजोमयानि । तान्यपेक्ष्याह—अतेजोमय इति ।इसी प्रकार ये देवशरीर तैजस हैं, इनका आरम्भ होनेपर वह तद्रूप अर्थात् तेजोमय हो जाता है। इनसे भिन्न पशु आदिके शरीर और नारकीय जीवोंके तथा प्रेतादिके शरीर अतेजोमय हैं। उनकी अपेक्षासे श्रुति कहती है—‘अतेजोमय’।
एवं कार्यकारणसङ्घातमयः सन्नात्मा प्राप्तव्यं वस्त्वन्तरं पश्यन्निदं मया प्राप्तमदो मया प्राप्तव्यमित्येवं विपरीतप्रत्ययस्तदभिलाषः काममयो भवति । तस्मिन् कामे दोषं पश्यतस्तद्विषयाभिलाषप्रशमे चित्तं प्रसन्नमकलुषं शान्तं भवति, तन्मयोऽकाममयः ।इस प्रकार यह आत्मा देहेन्द्रियसङ्घातमय होकर, अन्य प्राप्तव्य वस्तुको देखता हुआ, ‘यह मैंने प्राप्त कर ली है और वह मुझे प्राप्त करनी है’ इस प्रकार विपरीत ज्ञानयुक्त होकर उसकी अभिलाषावाला अर्थात् काममय होता है और उस कामनामें दोष देखनेपर जब तत्सम्बन्धी अभिलाषा निवृत्त हो जाती है, तब चित्त प्रसन्न—निष्कलुष अर्थात् शान्त हो जाता है, इसलिये तन्मय अर्थात् अकाममय होता है।