भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1061, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1061

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथो अप्यन्ये बन्धमोक्षकुशलाः खल्वाहुः—सत्यं कामादिपूर्वकं पुण्यापुण्ये शरीरग्रहणकारणम्, तथापि कामप्रयुक्तो हि पुरुषः पुण्यापुण्ये कर्मणी उपचिनोति । कामप्रहाणे तु कर्म विद्यमानमपि पुण्यापुण्योपचयकरं न भवति । उपचिते अपि पुण्यापुण्ये कर्मणी कामशून्ये फलारम्भके न भवतः । तस्मात् काम एव संसारस्य मूलम् । तथा चोक्तमाथर्वणे—“कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र” (मु० उ० ३ । २ । २ ) इति । तस्मात् काममय एवायं पुरुषो यदन्यमयत्वं तदकारणं विद्यमानमपीत्यतोऽवधारयति काममय एवेति ।यहाँ दूसरे बन्धमोक्षकुशल पुरुष कहते हैं—यह ठीक है कि कामादिपूर्वक पुण्य और पाप ही शरीर-ग्रहणके कारण हैं तो भी कामनासे प्रेरित हुआ पुरुष ही पुण्य-पापरूप कर्मोंका संग्रह करता है। कामनाका नाश होनेपर तो विद्यमान कर्म भी पुण्य-पापकी वृद्धि करनेवाला नहीं होता तथा कामनारहित होनेपर संग्रह किये हुए पुण्य-पाप कर्म भी फलके आरम्भक नहीं होते। अतः कामना ही संसारका मूल है। ऐसा ही आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"जो पुत्र-पशु आदि कामनाओंको ही सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ उनकी इच्छा करता है, वह उन कामनाओंके कारण उन-उन स्थानोंमें जन्म लेता है।" अतः यह पुरुष काममय ही है; इसका जो अन्यमयत्व है, वह विद्यमान रहते हुए भी [इसके सर्वमयत्वका] कारण नहीं है, इसीसे श्रुति निश्चय करती है कि यह काममय ही है।
यस्मात् स च काममयः सन् यादृशेन कामेन यथाकामो भवति, तत्क्रतुर्भवति । स काम ईषदभिलाषमात्रेणाभिव्यक्तो यस्मिन् विषये भवति, सोऽविहन्यमानः स्फुटी-क्योंकि वह काममय होकर जैसी कामनासे युक्त अर्थात् 'यथाकाम' होता है 'तत्क्रतु' होता है। थोड़ी-सी अभिलाषामात्रसे अभिव्यक्त हुई वह कामना जिस विषयमें होती है, वह उससे आहत न होकर स्फुट