भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०४७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथो अप्यन्ये बन्धमोक्षकुशलाः खल्वाहुः—सत्यं कामादिपूर्वकं पुण्यापुण्ये शरीरग्रहणकारणम्, तथापि कामप्रयुक्तो हि पुरुषः पुण्यापुण्ये कर्मणी उपचिनोति । कामप्रहाणे तु कर्म विद्यमानमपि पुण्यापुण्योपचयकरं न भवति । उपचिते अपि पुण्यापुण्ये कर्मणी कामशून्ये फलारम्भके न भवतः । तस्मात् काम एव संसारस्य मूलम् । तथा चोक्तमाथर्वणे—“कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र” (मु० उ० ३ । २ । २ ) इति । तस्मात् काममय एवायं पुरुषो यदन्यमयत्वं तदकारणं विद्यमानमपीत्यतोऽवधारयति काममय एवेति ।यहाँ दूसरे बन्धमोक्षकुशल पुरुष कहते हैं—यह ठीक है कि कामादिपूर्वक पुण्य और पाप ही शरीर-ग्रहणके कारण हैं तो भी कामनासे प्रेरित हुआ पुरुष ही पुण्य-पापरूप कर्मोंका संग्रह करता है। कामनाका नाश होनेपर तो विद्यमान कर्म भी पुण्य-पापकी वृद्धि करनेवाला नहीं होता तथा कामनारहित होनेपर संग्रह किये हुए पुण्य-पाप कर्म भी फलके आरम्भक नहीं होते। अतः कामना ही संसारका मूल है। ऐसा ही आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"जो पुत्र-पशु आदि कामनाओंको ही सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ उनकी इच्छा करता है, वह उन कामनाओंके कारण उन-उन स्थानोंमें जन्म लेता है।" अतः यह पुरुष काममय ही है; इसका जो अन्यमयत्व है, वह विद्यमान रहते हुए भी [इसके सर्वमयत्वका] कारण नहीं है, इसीसे श्रुति निश्चय करती है कि यह काममय ही है।
यस्मात् स च काममयः सन् यादृशेन कामेन यथाकामो भवति, तत्क्रतुर्भवति । स काम ईषदभिलाषमात्रेणाभिव्यक्तो यस्मिन् विषये भवति, सोऽविहन्यमानः स्फुटी-क्योंकि वह काममय होकर जैसी कामनासे युक्त अर्थात् 'यथाकाम' होता है 'तत्क्रतु' होता है। थोड़ी-सी अभिलाषामात्रसे अभिव्यक्त हुई वह कामना जिस विषयमें होती है, वह उससे आहत न होकर स्फुट

१०४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| भवन् क्रतुत्वमापद्यते। क्रतुर्नामाध्यवसायो निश्चयो यदनन्तरा क्रिया प्रवर्तते। <br><br> यत्क्रतुर्भवति यादृक्कामकार्येण क्रतुना यथारूपः क्रतुरस्य सोऽयं यत्क्रतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते, यद्विषयः क्रतुस्तत्फलनिर्वृत्तये यद् योग्यं कर्म, तत् कुरुते निर्वर्तयति, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते, तदीयं फलमभिसम्पद्यते। तस्मात् सर्वमयत्वेऽस्य संसारित्वे च काम एव हेतुरिति ॥ ५ ॥ | होनेपर क्रतुरूप हो जाती है। 'क्रतु' अध्यवसाय अर्थात् निश्चयको कहते हैं, जिसके पीछे क्रियाकी प्रवृत्ति होती है। <br><br> यह 'यत्क्रतु' होता है अर्थात् कामनाके कार्यरूप जिस प्रकारके क्रतुसे यह युक्त होता है, इस प्रकार यह जैसे क्रतुवाला होता है, वही कर्म करता है। इसका जिस विषयको लेकर क्रतु होता है, उसका फल सिद्ध करनेके लिये जो योग्य कर्म होता है, उसीको करता है और जैसा कर्म करता है, वही अभिसम्पन्न होता अर्थात् उसीका फल प्राप्त करता है। अतः इसके सर्वमयत्व और सांसारित्वमें कामना ही कारण है ॥ ५ ॥ |

कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण

तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात् पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६॥

उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९

करता है। इस लोकमें यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करनेवाला पुरुष ही ऐसा करता है। अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं] जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
तत्तस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति । तदेवैति तदेव गच्छति, सक्त आसक्तस्तत्रोद्भूताभिलाषः सन्नित्यर्थः, कथमिति ? सह कर्मणा यत् कर्म फलासक्तः सन्नकरोत्तेन कर्मणा सहैव तदेति तत् फलमेति । किं तत् ? लिङ्गं मनः—मनःप्रधानत्वाल्लिङ्गस्य मनो लिङ्गमित्युच्यते । <br><br> अथ वा लिङ्ग्यतेऽवगम्यतेऽवगच्छति येन तल्लिङ्गं तन्मनो यत्र यस्मिन्निषक्तं निश्चयेन सक्तमुद्भूताभिलाषमस्य संसारिणः, तदभिलाषो हि तत् कर्म कृतवान्, तस्मात्तन्मनोऽभिषङ्गवशा-तत्—उस विषयमें यह श्लोक अर्थात् मन्त्र भी है। तदेवैति–उसीको जाता है, सक्त-आसक्त होकर अर्थात् उसमें अपनी अभिलाषा प्रकट कर, किस प्रकार जाता है ? कर्मके सहित अर्थात् जिस कर्मको उसने फलासक्त होकर किया था, उस कर्मके सहित ही वह उसके फलके प्रति जाता है। वह (जानेवाला) कौन है ? लिङ्ग–मन, लिङ्गदेह मनःप्रधान है, इसलिये मनको 'लिङ्ग' ऐसा कहा जाता है। <br><br> अथवा जिसके द्वारा लिङ्गन — अवगम होता है अर्थात् जिससे साक्षी जानता है, उसे लिङ्ग कहते हैं, इस संसारीका वह मन जिसमें निष्क्त-निश्चयपूर्वक सक्त अर्थात् उद्भूताभिलाष होता है यानी अपनी अभिलाषा प्रकट करता है; उस अभिलाषासे युक्त होकर ही उसने वह कर्म किया था, इससे अर्थात् उस चित्तकी आसक्तिके कारण ही

१०५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| देवांस्य तेन कर्मणा तत्फल-प्राप्तिः। तेनैतत् सिद्धं भवति, कामो मूलं संसारस्येति। अत उच्छिन्नकामस्य विद्यमानान्यपि कर्माणि ब्रह्मविदो वन्ध्याप्रसवानि भवन्ति; "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" (मु० उ० ३। २। २) इति श्रुतेः। | इसे उस कर्मसे उस फलकी प्राप्ति हो जाती है। इससे यह सिद्ध होता है कि काम ही संसारका मूल है। अतः जिसकी कामना निवृत्त हो गयी है, उस ब्रह्मवेत्ताके विद्यमान कर्म भी वन्ध्याकी संतति हो जाते हैं; जैसा कि "आप्तकाम और शुद्धचित्त पुरुषकी सारी कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | किञ्च प्राप्यान्तं कर्मणः—प्राप्य भुक्त्वा अन्तमवसानं यावत् कर्मणः फलपरिसमाप्तिं कृत्वेत्यर्थः; कस्य कर्मणोऽन्तं प्राप्येत्युच्यते—तस्य यत्किञ्च कर्मेहास्मिँल्लोके करोति निर्वर्तयत्ययम्, तस्य कर्मणः फलं भुक्त्वा अन्त प्राप्य तस्माल्लोकात् पुन-रत्यागच्छत्यस्मै लोकाय कर्मणे। अयं हि लोकः कर्मप्रधानः, तेनाह—'कर्मणे' इति, पुनः कर्म-करणाय। पुनः कर्म कृत्वा फलासङ्गवशात् पुनरमुं लोकं यातीत्येवम्। इति नु एवं नु कामय- | तथा कर्मके अन्तको प्राप्तकर अर्थात् जहाँतक कर्मका अन्त यानी अवसान हो वहाँतक उसे पाकर—भोगकर यानी कर्मफलकी परिसमाप्ति करके; किस कर्मका अन्त पाकर ? सो बतलाया जाता है—इस लोकमें यह जो कुछ कर्म करता है उसका अर्थात् उस कर्मका फल भोगकर—उसका अन्त पाकर उस लोकसे, कर्म करनेके लिये, पुनः इस लोकमें आ जाता हैं। यह लोक ही कर्मप्रधान है, इसीसे श्रुति कहती है—'कर्मणे' अर्थात् पुनः कर्म करनेके लिये। इसी प्रकार पुनः कर्म करके फलासक्तिके कारण पुनः परलोकमें जाता है। इस प्रकार जो कामना |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०५१

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
मानः संसरति। यस्मात् काम-करनेवाला है वह संसार-बन्धनको
यमान एवैवं संसरत्यथ तस्मा-प्राप्त होता है। चूँकि कामना करने-
दकामयमानो न क्वचित् संसरति।वाला ही इस प्रकार संसरित होता
है, इसलिये जो कामना करनेवाला
नहीं है, वह कभी संसार-बन्धनमें
नहीं पड़ता।
फलासक्तस्य हि गतिरुक्ता।फलासक्तकी गति तो बतला दी
अकामस्य हि क्रियानुपपत्तेरका-गयी; किंतु जो निष्काम है, उसकी
मयमानो मुच्यत एव। कथंक्रिया सम्भव न होनेके कारण
पुनरकामयमानो भवति ? यो-कामना न करनेवाला पुरुष तो मुक्त
ऽकामो भवत्यसावकामयमानः।ही हो जाता है, किंतु जीव कामना
कथमकामतत्युच्यते-यो निष्का-न करनेवाला कैसे होता है ? जो
मो यस्मान्निर्गताः कामाः सो-अकाम होता है, वही कामना न
ऽयं निष्कामः। कथं कामा निग-करनेवाला है। अकामता कैसे होती
च्छन्ति ? य आप्तकामो भव-है? सो बतलाया जाता है—जो
त्याप्ताः कामा येन स आप्तकामः।निष्काम है अर्थात् जिससे कामनाएँ
निकल गयी हैं, वह पुरुष निष्काम
कहलाता है। कामनाएँ किस प्रकार
निकल जाती हैं ? जो आप्तकाम होता
है अर्थात् जिसने सब कामनाओंको
प्राप्त कर लिया है, वह आप्तकाम है
[उसकी कामनाएँ नहीं रहतीं]।
कथमाप्यन्ते कामाः ? आत्म-कामनाओंकी प्राप्ति कैसे होती
कामत्वेन। यस्यात्मैव नान्यःहै? आत्मकाम होनेसे। जिसकी
कामयितव्यो वस्त्वन्तरभूतःकामनाका विषय आत्मा ही होता
पदार्थो भवति। आत्मैवानन्तरो-है, कोई अन्य वस्तुरूप पदार्थ नहीं
ऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक-होता। आत्मा ही अन्तर-बाह्यरहित,
पूर्ण प्रज्ञानघन और एकरस है;

१०५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| रसः, नोर्ध्वं न तिर्यङ् नाध आत्मनोऽन्यत्कामयितव्यं वस्त्वन्तरम् । यस्य सर्वात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येच्छृणुयान्मन्वीत विजानीयाद्वा, एवं विजानन् कं कामयेत । ज्ञायमानो ह्यन्यत्वेन पदार्थः कामयितव्यो भवति, न चासावन्यो ब्रह्मविद आप्तकामस्यास्ति । य एवात्मकामतया आप्तकामः स निष्कामोऽकामोऽकामयमानश्चेति मुच्यते । न हि यस्य आत्मैव सर्वं भवति, तस्यानात्मा कामयितव्योऽस्ति । अनात्मा चान्यः कामयितव्यः सर्वं चात्मैवाभूदिति विप्रतिषिद्धम् । सर्वात्मदर्शिनः कामयितव्याभावात् कर्मानुपपत्तिः । <br><br> ये तु प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्म कल्पयन्ति ब्रह्मविदोऽपि, तेषां नात्मैव सर्वं भवति; प्रत्यवायस्य जिहासितव्यस्य आत्मनोऽन्यस्य | आत्मासे भिन्न कामनाके योग्य कोई अन्य वस्तु न ऊपर है, न इधर-उधर है और न नीचे है । जिसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वह किसके द्वारा किसे देखे, सुने, मनन करे अथवा जाने ? इस प्रकार जाननेवाला किसकी कामना करे । जो पदार्थ अन्यरूपसे जाना जाता है, वही कामनाके योग्य होता है और यह अन्य पदार्थ आप्तकाम ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें है नहीं । अतः जो भी आत्मकाम होनेके कारण आप्तकाम होता है, वही निष्काम, अकाम और कामना न करनेवाला भी है; इसलिये मुक्त हो जाता है । जिसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कामनाके योग्य कोई अनात्मा नहीं रहता । कोई दूसरा कामनाके योग्य अनात्मा भी रहे और सब कुछ आत्मा भी हो गया—ऐसा कथन तो विपरीत ही है । अतः सर्वात्मदर्शीके लिये कामनाके योग्य वस्तुका अभाव हो जानेके कारण कर्म सम्भव नहीं है । <br><br> जो लोग प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मवेत्ताके भी कर्मकी कल्पना करते हैं, उनके लिये सब आत्मा ही नहीं होता, क्योंकि प्रत्यवाय तो आत्मासे भिन्न कोई अन्य त्यागने |

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०५३

संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
अभिप्रेतत्वात्। येन चाशनायाद्यतीतो नित्यं प्रत्यवायासम्वद्धो विदित आत्मा, तं वयं ब्रह्मविदं ब्रूमः। नित्यमेव अशनायाद्यतीतमात्मानं पश्यति। यस्माच्च जिहासितव्यमन्यदुपादेयं वा यो न पश्यति, तस्य कर्म न शक्यत एव सम्बन्धुम्, यस्त्वब्रह्मवित्तस्य भवत्येव प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्मेति न विरोधः। अतः कामाभावादकामयमानो न जायते, मुच्यत एव।<br><br>तस्यैवमकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयः, नोत्क्रामन्ति नोर्ध्वं क्रामन्ति देहात्। स च विद्वानाप्तकाम आत्मकामतयैहैव ब्रह्मभूतः। सर्वात्मनो हि ब्रह्मणो दृष्टान्तत्वेन प्रदर्शितमेतद्रूपम्—"तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपम्" (बृ० उ० ४।३।२१) इति।योग्य पदार्थ ही माना गया है। ब्रह्मवेत्ता तो हम उसे कहते हैं, जिसने आत्माको क्षुधादिसे अतीत और प्रत्यवायसे असम्बद्ध जाना है। वह सर्वदा क्षुधादिसे अतीत आत्माको ही देखता है; क्योंकि जो आत्मासे भिन्न किसी हेय या उपादेय वस्तुको नहीं देखता उससे कर्मका सम्बन्ध होना सम्भव ही नहीं है; जो ब्रह्मवेत्ता नहीं है, उसीको प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये कर्मकी आवश्यकता है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। अतः कामनाका अभाव होनेके कारण कामना न करनेवाला पुरुष जन्म नहीं लेता, वह मुक्त ही हो जाता है।<br><br>इस प्रकार कामना न करनेवाले उस पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते—देहसे ऊपरकी ओर नहीं जाते। और आत्मकामताके कारण आप्तकाम हुआ वह विद्वान् यहीं ब्रह्मभूत हो जाता है। "वह यह निश्चय ही इसका आप्तकाम, आत्मकाम और अकामरूप है" इस प्रकार यह दृष्टान्तरूपसे उस ब्रह्मका ही रूप दिखाया गया है। 'अथा-

१०५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तस्य हि दार्ष्टान्तिकभूतोऽयमर्थ उपसंह्रियतेऽथाकामयमान इत्यादिना ।कामयमानः' इत्यादि वाक्यसे यह उसीके दार्ष्टान्तिकभूत अर्थका उपसंहार किया गया है ।
स कथमेवम्भूतो मुच्यत इत्युच्यते—यो हि सुषुप्तावस्थमिव निर्विशेषमद्वैतमलुप्तचिद्रूपज्योतिःस्वभावमात्मानं पश्यति, तस्यैवाकामयमानस्य कर्माभावे गमनकारणाभावात् प्राणा वागादयो नोत्क्रामन्ति । किंतु विद्वान् स इहैव ब्रह्म, यद्यपि देहवानिव लक्ष्यते, स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । यस्मान्न हि तस्याब्रह्मत्वपरिच्छेदहेतवः कामाः सन्ति, तस्मादिहैव ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति न शरीरपातोत्तरकालम् ।वह इस प्रकारका साधक किस प्रकार मुक्त होता है ? सो कहा जाता है—जो सुषुप्ति-अवस्था में स्थितकी भाँति निर्विशेष, अद्वैत, अलुप्तचिद्रूप ज्योतिःस्वरूप आत्माको देखता है, उस कामना न करनेवाले पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते; किंतु वह विद्वान् यहीं ब्रह्मरूप हो जाता है, यद्यपि वह देहवान्-सा दिखायी देता है, किंतु वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है; क्योंकि उसके अब्रह्मत्वके परिच्छेदकी हेतुभूता कामनाएँ नहीं रहतीं, इसलिये वह यहीं ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, शरीरपातके पश्चात् नहीं ।
(मोक्षस्य भावान्तरत्वप्रतिषेधः)<br>न हि विदुषो मृतस्य भावान्तरापत्तिर्जीवतोऽन्यो भावो देहान्तरप्रतिसन्धानाभावमात्रेणैव तु ब्रह्माप्येतीत्युच्यते । भावान्तरापत्तौ हि मोक्षस्य सर्वोपनिषद्विवक्षितोऽर्थ आत्मैकत्वाख्यः समरे हुए विद्वान्‌को भावान्तरकी प्राप्ति नहीं होती अर्थात् उसका जीवितावस्थासे भिन्न भाव नहीं होता, देहान्तरका संयोग न होनेसे ही ‘वह ब्रह्मको प्राप्त होता है' ऐसा कहा जाता है। यदि मोक्ष कोई भावान्तरप्राप्ति मानी जाय तो सम्पूर्ण उपनिषद्‌का विवक्षित जो आत्मैक्यरूप

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५५ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०५५
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी अनुवाद
बाधितो भवेत्, कर्महेतुकश्च मोक्षः प्राप्नोति, न ज्ञाननिमित्त इति । स चानिष्टः, अनित्यत्वं च मोक्षस्य प्राप्नोति, न हि क्रियानिर्वृत्तोऽर्थो नित्यो दृष्टः । नित्यश्च मोक्षोऽभ्युपगम्यते, "एष नित्यो महिमा" (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इति मन्त्रवर्णात् ।सिद्धान्त है, वह बाधित हो जायगा तथा मोक्ष कर्मनिमित्तक हो जायगा, ज्ञाननिमित्तक नहीं रहेगा और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे मोक्षकी अनित्यता भी प्राप्त होती है, कर्मसे निष्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं देखा गया और मोक्ष तो नित्य ही माना गया है, जैसा कि यह "ब्राह्मणकी नित्य महिमा है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है ।
न च स्वाभाविकात् स्वभावाद- न्यन्नित्यं कल्पयितुं शक्यम् । स्वाभाविकश्चेदग्न्युष्णवदात्मनः स्वभावः, स न शक्यते पुरुषव्या- पारानुभावीति वक्तुम् । न ह्यग्नेरौष्ण्यं प्रकाशो वाग्निव्या- पारानन्तरानुभावी । अग्निव्या- पारानुभावी स्वाभाविकश्चेति विप्रतिषिद्धम् ।इसके सिवा स्वाभाविक (अकृ- त्रिम) स्वरूपसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नित्य है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । यदि अग्निके उष्णत्वके समान मोक्ष आत्माका स्वाभाविक स्वरूप है तो उसके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि वह पुरुषके व्यापारद्वारा पीछे- से होनेवाला है । अग्निका उष्णत्व या प्रकाश भी अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला नहीं है । वह अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला है और स्वाभाविक भी है—ऐसा कहना तो विरुद्ध है ।
ज्वलनव्यापारानुभावित्वम् उष्णप्रकाशयोरिति चेन्न, अन्यो- पलब्धिव्यवधानापगमाभिव्य- क्त्यपेक्षत्वात् । ज्वलनादिपूर्वक-यदि कहो कि अग्निके उष्णत्व और प्रकाशका ज्वलन व्यापारके पीछे होना तो सिद्ध होता ही है—तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह तो दूसरेकी उपलब्धिके व्यवधानकी निवृत्तिकी अभिव्यक्तिकी अपेक्षासे है ।* ज्वलनादि व्यापारपूर्वक जो

* आगे इसी वाक्यकी व्याख्या की जाती है ।

१०५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| मग्निः उष्णप्रकाशगुणास्यामभिव्यज्यते तन्नाऽन्यपेक्षया, किं तर्ह्यन्यदृष्टेरग्नेरौष्ण्यप्रकाशौ धर्मौ व्यवहितौ, कस्यचिद् दृष्ट्या त्वसम्बध्यमानौ, ज्वलनापेक्षया व्यवधानापगमे दृष्टेरभिव्यज्येते । तदपेक्षया भ्रान्तिरूपजायते—ज्वलनपूर्वकावेतौ उष्णप्रकाशौ धर्मौ जाताविति ।<br><br>यद्युष्णप्रकाशयोरपि स्वाभाविकत्वं न स्यात् । यः स्वाभाविकोंऽग्नेर्धर्मः, तमुदाहरिष्यामः । न च स्वाभाविको धर्म एव नास्ति पदार्थानामिति शक्यं वक्तुम्, न च निगडभङ्ग इवाभावभूतो मोक्षो बन्धननिवृत्तिरुपपद्यते, परमात्मैकत्वाभ्युपगमात् “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) इति श्रुतेः । न चान्यो बद्धोऽस्ति, | अग्नि अपने उष्ण और प्रकाशगुणोंके सहित अभिव्यक्त होता है, वह अग्निकी अपेक्षासे नहीं है, तो फिर क्या बात है ?—अग्निके उष्णत्व और प्रकाशरूप धर्म दूसरेकी दृष्टिसे व्यवहित (ओझल) हैं अर्थात् किसीकी दृष्टिसे असम्बद्ध हैं, अतः ज्वलनकी अपेक्षासे दृष्टिके उस व्यवधानकी निवृत्ति होनेपर वे अभिव्यक्त हो जाते हैं । इसीसे यह भ्रान्ति हो जाती है कि ये उष्णत्व और प्रकाश-धर्म ज्वलनपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ।<br><br>यदि उष्णत्व और प्रकाश भी अग्निके स्वाभाविक धर्म नहीं हैं तो जो भी अग्निका स्वाभाविक धर्म हो हम उसीको इसमें उदाहरण देंगे । पदार्थोंका स्वाभाविक धर्म है ही नहीं—ऐसा तो कहा ही नहीं जा सकता । बेड़ियोंके टूटनेके समान मोक्ष भी बन्धननिवृत्तिरूप अभावमय धर्म है—ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है”, इस श्रुतिके अनुसार परमात्माकी एकता स्वीकार की गयी है । परमात्मासे भिन्न कोई दूसरा |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०५७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०५७


संस्कृत-भाष्यम्भाषानुवाद
यस्य निगडनिवृत्तिवद् बन्धननिवृत्तिर्मोक्षः स्यात् । परमात्मव्यतिरेकेणान्यस्याभावं विस्तरेणावादिष्म । तस्मादविद्यानिवृत्तिमात्रे मोक्षव्यवहार इति चावोचाम । यथा रज्ज्वादौ सर्पाद्यज्ञाननिवृत्तौ सर्पादिनिवृत्तिः ।बद्ध है नहीं, जिसकी बेड़ियोंके टूटनेके समान बन्धननिवृत्तिरूप मुक्ति हो । परमात्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुका अभाव हम पहले विस्तारसे बतला चुके हैं। अतः अविद्याकी निवृत्तिमात्रसे ही मोक्ष-व्यवहार होता है—ऐसा हमारा कथन है, जिस प्रकार कि रज्जु आदिमें सर्पादिके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर सर्पादिकी भी निवृत्ति हो जाती है ।
येऽप्याचक्षते मोक्षे विज्ञानान्तरमानन्दान्तरं चाभिव्यज्यत इति तैर्वक्तव्योऽभिव्यक्तिशब्दार्थः । यदि तावल्लौकिक्येव उपलब्धिविषयव्याप्तिरभिव्यक्तिशब्दार्थः, ततो वक्तव्यं किं विद्यमानमभिव्यज्यतेऽविद्यमानमिति वा ?जो लोग ऐसा कहते हैं कि मोक्षमें किसी विज्ञानान्तर या आनन्दान्तरकी अभिव्यक्ति होती है, उन्हें 'अभिव्यक्ति' शब्दका अर्थ बतलाना चाहिये । यदि लौकिकी उपलब्धि अर्थात् विषयव्याप्ति ही 'अभिव्यक्ति' शब्दका अर्थ है तो यह बतलाना चाहिये कि विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है या अविद्यमानकी ?
विद्यमानं चेद् यस्य मुक्तस्य तदभिव्यज्यते तस्यात्मभूतमेव तदिति, उपलब्धिव्यवधानानुपपत्तेर्नित्याभिव्यक्तत्वान्मुक्तस्याभिव्यज्यत इति विशेषवचनमनर्थकम् ।यदि कहें विद्यमान सुखकी अभिव्यक्तिहोती है तो जिस मुक्तके प्रति उस विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है, उसका तो वह आत्मस्वरूप ही है, अतः नित्याभिव्यक्त होनेसे उसकी उपलब्धिमें कोई व्यवधान न हो सकनेके कारण वह मुक्तको अभिव्यक्त होता है—ऐसा विशेष वचन कहना व्यर्थ ही है ।

बृ० उ० ६७—

१०५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
अथ कदाचिदेवाभिव्यज्यते, उपलब्धिव्यवधानादनात्मभूतं तदिति, अन्यतोऽभिव्यक्तिप्रसङ्गः। तथा चाभिव्यक्तिसाधनापेक्षता। उपलब्धिसमानाश्रयत्वे तु व्यवधानकल्पनानुपपत्तेः सर्वदाभिव्यक्तिरनभिव्यक्तिर्वा। न त्वन्तरालकल्पनायां प्रमाणमस्ति। न च समानाश्रयाणामेकस्यात्मभूतानां धर्माणामितरेतरविषयविषयित्वं सम्भवति।और यदि वह कभी-कभी ही अभिव्यक्त होता है तो उसकी उपलब्धिमें व्यवधान रहनेके कारण वह अनात्मभूत है; तब तो उसकी दूसरे (साधन) से अभिव्यक्ति होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होता है और इस प्रकार अभिव्यक्तिके साधनकी भी अपेक्षा हो जाती है। यदि उपलब्धिसमानाश्रयत्व माना जाय^१ तो व्यवधानकी कल्पना न हो सकनेके कारण या तो उसकी सर्वदा अभिव्यक्ति ही होगी या अनभिव्यक्ति ही। इन दोनोंके बीचकी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं हैं। एक ही आश्रयवाले अर्थात् एकहीके आत्मभूत धर्मोंका परस्पर विषय-विषयीभाव होना सम्भव नहीं।
आत्मनो बन्धमोक्ष-विचारः<br>विज्ञानसुखयोश्च प्रागभिव्यक्तेः संसारित्वम्, अभिव्यक्त्युत्तरकालं च मुक्तत्वं यस्य-सोऽन्यः परमान्नित्याभिव्यक्तज्ञानस्वरूपादत्यन्तवैलक्षण्यात्, शैत्यमिवौष्ण्यात्;पूर्व०—विज्ञान और आनन्दकी अभिव्यक्तिसे पूर्व जिसका संसारित्व और अभिव्यक्तिके पश्चात् मुक्तत्व बतलाया जाता है, वह अत्यन्त विलक्षण होनेके कारण नित्याभिव्यक्तज्ञानस्वरूप परमात्मासे भिन्न है, जैसे उष्णतासे शीतलता।

१. अर्थात् उपलब्धि और उपलब्धिके विषय विज्ञान एवं आनन्द—इन दोनोंका एक आत्मा ही आश्रय है—ऐसा माना जाय।

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५९ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०५९

| परमात्मभेदकल्पनायां च वैदिकः कृतान्तः परित्यक्तः स्यात् । | सिद्धान्ती—इस प्रकार परमात्मासे भेदकी कल्पना करनेमें तो वैदिक सिद्धान्तका परित्याग हो जाता है। | | मोक्षस्य इदानीमिव निर्विशेषत्वे तदर्थाधिकयत्नानुपपत्तिः शास्त्रवैयर्थ्यं च प्राप्नोतीति चेत् ! | पूर्व०—यदि इस समयके समान मोक्षकी कोई विशेषता न मानी जायगी तो उसके लिये अधिक प्रयत्न करना सम्भव नहीं होगा तथा शास्त्रकी व्यर्थता भी प्राप्त होगी—यदि ऐसा कहें तो ? | | न, अविद्याभ्रमापोहार्थत्वात्; न हि वस्तुतो मुक्तामुक्तत्वविशेषोऽस्ति, आत्मनो नित्यैकरूपत्वात्; किंतु तद्विषया अविद्या अपोह्यते शास्त्रोपदेशजनितविज्ञानेन; प्राक्तदुपदेशप्राप्तेस्तदर्थश्च प्रयत्न उपपद्यत एव । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि अविद्यारूप भ्रमकी निवृत्तिके लिये होनेके कारण उनकी सार्थकता है। परमार्थतः मुक्तत्व और अमुक्तत्वमें कोई भेद नहीं है, क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप ही है। किंतु शास्त्रजनित विज्ञानसे तद्विषयक अज्ञानका नाश होता है और उस शास्त्रोपदेशके प्राप्त होनेसे पहले उसके लिये प्रयत्न करना भी उचित ही है। | | अविद्यावतोऽविद्यानिवृत्त्यनिवृत्तिकृतो विशेष आत्मनः स्यादिति चेत् ! | पूर्व०—अविद्यावान् आत्माका अविद्याकी निवृत्ति एवं अनिवृत्तिके कारण रहनेवाला भेद तो रहेगा ही ! | | न, अविद्याकल्पनाविषयत्वाभ्युपगमात्, रज्जूपषरशुक्तिका- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि आत्माको अविद्याजनित कल्पनाका विषय माना गया है; इसलिये रज्जु, ऊसर, |

१०६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| गगनानां सर्पोदकरजतमलिनत्वा-<br><br>दिवददोष इत्यवोचाम । | शुक्ति और आकाशमें भासनेवाले सर्पं, जल, रजत और मालिन्यसे जैसे उनमें कोई दोष नहीं आता, उसी प्रकार आत्मामें भी अविद्या-जनित कल्पनासे कोई दोष नहीं आ सकता—ऐसा हम कह चुके हैं। | | तिमिरातिमिरदृष्टिवदविद्या-कर्तृत्वाकर्तृत्वकृत आत्मनो वि-शेषः स्यादिति चेत् ! | पूर्व०—तिमिर-रोगयुक्त और तिमिर-रोगमुक्त दृष्टिसे जैसे चन्द्रमा-का भेद प्रतीत होता है, वैसे ही अविद्याके कर्ता और अकर्ता होनेसे आत्मामें भी भेद हो जायगा ! | | न, "ध्यायतीव लेलायतीव" इति स्वतोऽविद्याकर्तृत्वस्य प्रति-षिद्धत्वात्; अनेकव्यापारसंनि-पातजनितत्वाच्च अविद्याभ्रमस्य; विषयत्वोपपत्तेश्च; यस्य च अ-विद्याभ्रमो घटादिवद् विविक्तो गृह्यते, स न अविद्याभ्रमवान् । | सिद्धान्ती--नहीं, क्योंकि "ध्यान-सा करता है, चञ्चल-सा होता है" इस श्रुतिद्वारा स्वयं आत्माके अवि-द्याकर्ता होनेका निषेध किया गया है। इसके सिवा अविद्यारूप भ्रम तो अनेक व्यापारोंके मेलसे उत्पन्न होता है तथा वह आत्माका विषय भी हे। अतः जिसके द्वारा अविद्या-रूप भ्रम घटादिके समान प्रत्यक्ष-तया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्यारूप भ्रमवाला नहीं हो सकता ! | | 'अहं न जाने मुग्धोऽस्मि' इति प्रत्ययदर्शनादविद्याभ्रमवत्त्वमेवे-ति चेत् ! | पूर्व०—'मैं नहीं जानता, मूढ हूँ' ऐसा अनुभव देखा जानेके कारण तो आत्मा अविद्यारूप भ्रम-वाला ही सिद्ध होता है ! |

| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्याथ | १०६१ |

ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्याथ१०६१
शाङ्करभाष्यम्अनुवाद
न, तस्यापि विवेकग्रहणात्; न हि यो यस्य विवेकेन ग्रहीता; स तस्मिन् भ्रान्त इत्युच्यते; तस्य च विवेकग्रहणम्, तस्मिन्नेव च भ्रमः—इति विप्रतिषिद्धम्; न जाने मुग्धोऽस्मीति दृश्यते इति ब्रवीषि—तद्दर्शिनश्च अज्ञानं मुग्धरूपता दृश्यत इति च—तद्दर्शनस्य विषयो भवति, कर्मतामापद्यत इति । तत् कथं कर्मभूतं सत् कर्तृस्वरूपदृशिविशेषणम् अज्ञानमुग्धते स्याताम् ? अथ दृशिविशेषणत्वं तयोः, कथं कर्म स्याताम्—दृशिना व्याप्येते ? कर्म हि कर्तृक्रियया व्याप्यमानं भवति; अन्यच्च व्याप्यम्, अन्यद् व्यापकम्; न तेनैव तद् व्याप्यते; वद कथमेवं सति, अज्ञानमुग्धते दृशिविशेषणे स्याताम् ? न चाज्ञानविवेकदर्शी अज्ञान-**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उस अनुभवका भी पृथक् करके ग्रहण होता है और जो जिसका पृथक् करके ग्रहण करनेवाला है; वह उसमें भ्रान्त है—ऐसा कहा नहीं जा सकता । उसीका तो पृथक् करके ग्रहण होता है और उसीमें भ्रान्ति है—ऐसा कहना तो विरुद्ध है । ‘मैं नहीं जानता, मुग्ध हूँ’ यह अनुभव दिखायी देता है—ऐसा तुम कहते हो और ऐसा भी कहते हो कि उसे देखनेवालेकी अज्ञान एवं मुग्धरूपता देखी जाती है—इस प्रकार तो वे अज्ञानादि दर्शनके विषय अर्थात् कर्मरूपताको प्राप्त हो जाते हैं । तब कर्मभूत होकर वे अज्ञान और मुग्धता कर्तृस्वरूप साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? और यदि वे साक्षीके विशेषण हैं तो वे उसके कर्म कैसे हो सकते हैं अर्थात् साक्षीसे व्याप्त कैसे होंगे ? कर्म तो कर्ताकी क्रियासे व्याप्त होनेवाला होता है तथा व्याप्य दूसरा होता है और व्यापक दूसरा; वह उसीसे व्याप्त नहीं होता । ऐसी स्थितिमें बतलाओ, अज्ञान और मुग्धता साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? तथा अज्ञानको अपनेसे पृथक् देखनेवाला—अज्ञान-

१०६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| मात्मनः कर्मभूतमुपलभमान उपलब्धृधर्मत्वेन गृह्णाति—शरीरे कार्श्यरूपादिवत्, तथा। | को अपना कर्मभूत अनुभव करनेवाला उसे शरीरान्तर्गत कृशता और रूपादिके समान साक्षीके धर्मरूपसे नहीं ग्रहण करता। | | सुखदुःखेच्छाप्रयत्नादीन् सर्वो लोको गृह्णातीति चेत् ! | पूर्व०—सुख-दुःख, इच्छा और प्रयत्नादि [आत्माके धर्मों] को तो सभी लोग ग्रहण करते हैं ! | | तथापि ग्रहीतुलौंकस्य विविक्ततैवाभ्युपगता स्यात्। 'न जानेऽहं त्वदुक्तं मुग्ध एव,' इति चेद् भवत्वज्ञो मुग्धः, यस्तु एवंदर्शी, तं ज्ञम् अमुग्धं प्रतिजानीमहे वयम्। तथा व्यासेनोक्तम्—'इच्छादि कृत्स्नं क्षेत्रं क्षेत्री प्रकाशयति' इति, "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तम्—" (गीता १३। २७) इत्यादि शतश उक्तम्। तस्मान्नात्मनः स्वतो बद्धमुक्तज्ञानाज्ञानकृतो विशेषोऽस्ति, सर्वदा समैकरसस्वाभाव्याभ्युपगमात्। | सिद्धान्ती—इस प्रकार भी ग्रहण करनेवाले पुरुषकी पृथक्ता ही स्वीकार की जाती है। और तुमने जो कहा कि 'मैं नहीं जानता, मुग्ध ही हूँ', सो तुम भले ही अज्ञ या मुग्ध रहो, किंतु जो इस प्रकार देखनेवाला है वह तो ज्ञाता और अमुग्ध ही है—ऐसी हमारी प्रतिज्ञा है। व्यासजीने भी ऐसा ही कहा है कि 'क्षेत्री (आत्मा) इच्छादि सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है।' "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित और उनके नष्ट होनेपर भी नष्ट न होनेवाले परमेश्वरको" इत्यादि सैकड़ों प्रकारसे उसका वर्णन किया गया है। अतः स्वयं आत्माकी बद्धमुक्त एवं ज्ञान-अज्ञानके कारण कोई विशेषता नहीं होती; क्योंकि उसे सर्वदा समान और एकरसस्वरूप माना गया है। |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०६३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०६३


ये तु-अतोऽन्यथा आत्मवस्तु परिकल्प्य बन्धमोक्षादिशास्त्रं च अर्थवादमापादयन्ति, ते उत्सहन्ते खेऽपि शाकुनं पदं द्रष्टुम्, खं वा मुष्टिना आक्रष्टुम्, चर्मवद् वेष्टितुम्; वयं तु तत् कर्तुमशक्ताः; सर्वदा समैकरसम् अद्वैतम् अविक्रियम् अजम् अजरम् अमरम् अमृतम् अभयम् आत्मतत्त्वं ब्रह्मैव स्मः—इत्येष सर्ववेदान्तनिश्चितोऽर्थ इत्येवं प्रतिपद्यामहे। तस्माद् ब्रह्माप्येतीति उपचारमात्रमेतत्—विपरीतग्रहवद्देहसंततेर्विच्छेदमात्रं विज्ञानफलमपेक्ष्य ॥ ६ ॥किंतु जो लोग आत्मतत्त्वको अन्य प्रकारसे कल्पना कर बन्धमोक्षादि-शास्त्रको केवल अर्थवाद बतलाते हैं, वे तो आकाशमें भी पक्षीके चरणचिह्न देखना चाहते हैं अथवा आकाशको मुट्ठोसे खींचना और उसे चमड़ेके समान लपेटनेकी इच्छा करते हैं; हम तो ऐसा करनेमें समर्थ हैं नहीं; हम सर्वदा सम, एकरस, अद्वैत, अविकारी, अजन्मा, अजर, अमर, अमृत, अभयरूप आत्मतत्त्व ब्रह्म ही है—यही सम्पूर्ण वेदान्तोंका निश्चित अर्थ है—ऐसा समझते हैं। अतः विपरीतग्रहणसे होनेवाली देहसंततिका विच्छेदमात्र जो विज्ञानका फल है, उसकी अपेक्षासे 'ब्रह्मको प्राप्त होता है' यह कथन उपचारमात्र है ॥ ६ ॥
स्वप्नबुद्धान्तगमनदृष्टान्तस्य दार्ष्टान्तिकः संसारो वर्णितः। संसारहेतुश्च विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञा वर्णिता। यैश्चोपाधिभूतैः कार्यकारणलक्षणभूतैः परिवेष्टितः; संसारित्वमनुभवति, तानि चोक्तानि। तेषां साक्षात्प्रयोजकौस्वप्न और जागरित अवस्थाओंमें जानेका जो दृष्टान्त दिया गया था उसके दार्ष्टान्तिक संसारका वर्णन कर दिया गया। संसारके हेतुभूत विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञाका भी निरूपण किया गया; और जिन उपाधिभूत देह एवं इन्द्रियलक्षणभूतोंसे परिवेष्टित हुआ जीव संसारित्वका अनुभव करता है उनका भी उल्लेख कर दिया गया। उनके

| १०६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

१०६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
धर्माधर्माविति पूर्वपक्षं कृत्वा काम एवेत्यवधारितम्। यथा च ब्राह्मणेन अयमर्थोऽवधारितः, एवं मन्त्रेणापीति बन्धं बन्धकारणं चोक्त्वोपसंहृतं प्रकरणम् 'इति नु कामयमानः' इति।साक्षात् प्रेरक धर्म और अधर्म हैं--ऐसा पूर्वपक्ष करके यह निश्चय किया गया कि काम ही उनका प्रेरक है। जिस प्रकार ब्राह्मणभागके द्वारा इस अर्थका निश्चय किया था, वैसे ही मन्त्रके द्वारा भी बन्ध और बन्धके कारणका वर्णन कर 'इति नु कामयमानः' इत्यादि पदोंसे इस प्रकरणका उपसंहार कर दिया गया।
'अथाकामयमानः' इत्यारभ्य सुषुप्तदृष्टान्तस्य दार्ष्टान्तिकभूतः सर्वात्मभावो मोक्ष उक्तः। मोक्षकारणं च आत्मकामतया यद् आप्तकामत्वमुक्तम्, तच्च सामर्थ्यान्नात्मज्ञानमन्तरेण आत्मकामतयाऽऽप्तकामत्वमिति—सामर्थ्याद् ब्रह्मविद्यैव मोक्षकारणमित्युक्तम्। अतो यद्यपि कामो मूलमित्युक्तम्, तथापि मोक्षकारणविपर्ययेण बन्धकारणमविद्या-इत्येतदप्युक्तमेव भवति।फिर 'अथाकामयमानः' इस प्रकार आरम्भ कर सुषुप्तावस्थारूप दृष्टान्तके दार्ष्टान्तिकभूत सर्वात्मभावरूप मोक्षका वर्णन किया गया। यहाँ मोक्षका कारण जो आत्मकामतत्वके द्वारा आप्तकामत्व बतलाया गया है, वह आत्मकामतद्वारा आप्तकामत्व प्रकरणकी सामर्थ्यसे आत्मज्ञानके बिना हो नहीं सकता, अतः सामर्थ्यसे ब्रह्मविद्या ही मोक्षका कारण बतलायी गयी है। इसलिये यद्यपि संसारका मूल काम है--यह बतलाया गया है, तथापि यह बात भी कही हुई हो ही जाती है कि मोक्षके कारण ज्ञानसे विपरीत अज्ञान ही बन्धनका कारण है।
अत्रापि मोक्षो मोक्षसाधनं च ब्राह्मणेनोक्तम्; तस्यैव दृढीकर-यहाँ भी मोक्ष और मोक्षका साधन--ये ब्राह्मणभागद्वारा बतलाये गये हैं।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५


णाय मन्त्र उदाह्रियते श्लोक-शब्दवाच्यः—उसीको दृढ करनेके लिये श्लोक-शब्दवाच्य मन्त्रका उल्लेख किया जाता है—

विद्वान्‌का अनुत्क्रमण

तदेष श्लोको भवति। यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति। तद्यथाहिनिर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥

उसी अर्थमें यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है तो फिर यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इस शरीरमें ही) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी कांचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है। तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥

तत् तस्मिन्नेवार्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति। यदा यस्मिन् काले सर्वे समस्ताः कामाः तृष्णाप्रभेदाः प्रमुच्यन्ते, आत्मकामस्य ब्रह्मविदः समूलतो विशीर्यन्ते, ये प्रसिद्धा लोके इहामुत्रार्थाः पुत्रवित्तलोकैषणालक्षणा अस्य प्रसिद्धस्य पुरुषस्य हृदि बुद्धौ श्रिता'तत्'—उसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र है—जब—जिस समय सर्व अर्थात् समस्त काम—तृष्णाओं के भेद सर्वथा छूट जाते हैं, आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताकी वे समस्त कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं; जो लोकमें प्रसिद्ध पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणारूप ऐहिक और पारलौकिक कामनाएं इस पुरुषके हृदय—बुद्धिमें आश्रित हैं [ वे जब

१०६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
आश्रिताः—अथ तदा मर्त्यो मरणधर्मा सन्, कामवियोगात् समूलतः, अमृतो भवति ।समूल नष्ट हो जाती हैं ] तब यह मर्त्य—मरणधर्मा होनेपर भी कामनाओंका समूल नाश हो जानेके कारण अमृत हो जाता है ।
अर्थादनात्मविषयाः कामा अविद्यालक्षणा मृत्यव इत्येतदुक्तं भवति; अतो मृत्युवियोगे विद्वान् जीवन्नेव अमृतो भवति । अत्र अस्मिन्नेव शरीरे वर्तमानो ब्रह्म समश्नुते, ब्रह्मभावं मोक्षं प्रतिपद्यत इत्यर्थः । अतो मोक्षो न देशान्तरगमनाद्यपेक्षते । तस्माद् विदुषो नोत्क्रामन्ति प्राणाः, यथावस्थिता एव स्वकारणे पुरुषे समवनीयन्ते; नाममात्रं हि अवशिष्यते—इत्युक्तम् ।यहाँ अर्थतः यह बात कह दी गयी कि अनात्मविषयक कामनाएँ ही अविद्यारूप मृत्यु हैं, अतः मृत्युका वियोग हो जानेपर विद्वान् जीवित रहते हुए ही अमृत हो जाता है । वह यहाँ—इस शरीरमें ही रहता हुआ ब्रह्मको अर्थात् ब्रह्मभावरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है । अतः मोक्षको देशान्तरमें जाने आदिकी अपेक्षा नहीं है; इसलिये विद्वान्के प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता । वे जैसेके तैसे ही अपने कारण पुरुषमें पूर्णतया लीन हो जाते हैं, केवल नाममात्र ही बच रहता है--ऐसा ऊपर कहा गया है ।
कथं पुनः समवनीतेषु प्राणेषु देहे च स्वकारणे प्रलीने विद्वान् मुक्तोऽत्रैव सर्वात्मा सन् वर्तमानः पुनः पूर्ववद् देहित्वं संसारित्वलक्षणं न प्रतिपद्यते ? इत्यत्रोच्यते—तत्तत्रायं दृष्टान्तः—<br><br>यथा लोके 'अहिः सर्पः, तस्यकिंतु प्राणोंके लीन हो जानेपर तथा देहके अपने कारणमें मिल जानेपर विद्वान् किस प्रकार मुक्त होकर अर्थात् यहीं सर्वात्मा होकर विद्यमान रहते हुए पूर्ववत् पुनः संसारित्वरूप देहिभावको प्राप्त नहीं होता ? इस विषयमें अब कहा जाता है—उसमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार लोकमें अहि—सर्प, उसकी