बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| योः समानः पन्थाः—येन भेदाभावे कर्मकाण्डं निरालम्बनमात्मानं न लभते प्रामाण्यं प्रति तथोपनिषदपि। एवं तर्हि यस्य प्रामाण्ये स्वार्थविघातो नास्ति, तस्यैव कर्मकाण्डस्यास्तु प्रामाण्यम्; उपनिषदां तु प्रामाण्यकल्पनायां स्वार्थविघातो भवेदिति मा भूत्प्रामाण्यम्। न हि कर्मकाण्डं प्रमाणं सदप्रमाणं भवितुमर्हति; न हि प्रदीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति, न प्रकाशयति चेति। | है, क्योंकि जिस प्रकार भेद न होनेपर कर्मकाण्ड निरालम्ब (अधिकारि-शून्य) होकर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार उपनिषद् भी स्वयं प्रामाणिक नहीं हो सकती। यदि ऐसी बात है, तब तो जिसकी प्रामाणिकता माननेपर स्वार्थका¹ विघात नहीं होता, उस कर्मकाण्डकी ही प्रामाणिकता माननी चाहिये। उपनिषदोंके प्रामाण्यकी कल्पना करनेमें तो स्वार्थका विघात होता है, इसलिये उनकी प्रामाणिकता भले ही न हो। कर्मकाण्ड प्रामाणिक होकर अप्रामाणिक नहीं हो सकता, क्योंकि दीपक अपने प्रकाश्य पदार्थको प्रकाशित करता है और प्रकाशित नहीं भी करता—ऐसा नहीं होता। |
| प्रत्यक्षादिप्रमाणविप्रतिषेधाच्च—<br>न केवलमुपनिषदो ब्रह्मैकत्वं प्रतिपादयन्त्यः स्वार्थविघातं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातं च कुर्वन्ति; प्रत्यक्षादिनिश्चितभेदप्रतिपत्त्यर्थप्रमाणैश्च विरुध्यन्ते। तस्माद- | इसके सिवा अभेद-श्रुतियोंका प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध भी है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें केवल स्वार्थविघात और कर्मकाण्डके प्रामाण्यका विघात ही नहीं करतीं अपितु निश्चित भेदका ज्ञान करनेवाले प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उनका विरोध भी है। |
१. शब्दकी शक्तिवृत्तिसे प्रतीत होनेवाले सृष्ट्यादि भेदका।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
| प्रामाण्यमेवोपनिषदाम्; अन्यार्थता वाऽस्तु; न त्वेव ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थता। | अतः उपनिषदें अप्रामाणिक ही हैं, अथवा उनका कोई अन्य प्रयोजन हो सकता है, वे ब्रह्मका एकत्व प्रतिपादन करनेके लिये ही नहीं हो सकतीं। |
| न; उक्तोत्तरत्वात्। प्रमाणस्य हि प्रमाणत्वमप्रमाणत्वं वा प्रमोत्पादनानुत्पादननिमित्तम्, अन्यथा चेत्स्तम्भादीनां प्रामाण्यप्रसङ्गाच्छब्दादौ प्रमेये। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। प्रमाणकी प्रमाणता अथवा अप्रमाणता प्रमाकी उत्पत्ति करने या न करनेके कारण ही होती है, यदि ऐसा न माना जायगा तो शब्दादि प्रमेयमें स्तम्भादिकी भी प्रमाणताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा¹। |
| किञ्चातः ? | पूर्व०-सो, इससे क्या हुआ ? |
| यदि तावदुपनिषदो ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिप्रमां कुर्वन्ति, कथमप्रमाणं भवेयुः ? | सिद्धान्ती-यदि उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, तो वे किस प्रकार अप्रामाणिक होंगी ? |
| न कुर्वन्त्येवेति चेद्यथाग्निः शीतमिति ? | पूर्व०-किंतु 'अग्नि शीतल होता है, इस वाक्यके समान यदि वे प्रमा उत्पन्न करती ही न हों तो ? |
| स भवानेवं वदन्वक्तव्यः-उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थं भवतो वाक्यमुपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधं किं | सिद्धान्ती-इस प्रकार बोलनेवाले आपसे हमें यह कहना है कि उपनिषद्के प्रामाण्यका प्रतिषेध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ आपका वाक्य उपनिषद्के प्रामाण्यका निषेध क्या |
१. स्तम्भादिसे शब्दादिकी प्रमा नहीं होती; किंतु यदि प्रमाणके लिये प्रमाको उत्पन्न करना आवश्यक न मानें तो उन्हें भी प्रमाण क्यों न माना जाय ?
४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| न करोत्येवाग्निर्वा रूपप्रकाशम् ? | नहीं करता है तथा अग्नि रूपको क्या प्रकाशित नहीं करता है ? | | अथ करोति । | पूर्व०— करता तो है । | | यदि करोति भवतु तदा प्रतिषेधार्थं प्रमाणं भवद्वाक्यम्, अग्निश्च रूपप्रकाशको भवेत्; प्रतिषेधवाक्यप्रामाण्ये भवत्येवोपनिषदां प्रामाण्यम् । अत्र भवन्तो ब्रुवन्तु कः परिहार इति ? | सिद्धान्ती— यदि वह उसका प्रतिषेध करता है तो उसका प्रतिषेध करनेमें आपका वाक्य प्रमाण हो सकता है तथा अग्नि भी रूपका प्रकाशक हो सकता है । अतः यदि आपका प्रतिषेधक वाक्य प्रामाणिक है तो उपनिषदोंकी प्रामाणिकता होनी ही चाहिये । अब आप बतलाइये इसका क्या परिहार हो सकता है ? | | नन्वत्र प्रत्यक्षा मद्वाक्य उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थप्रतिपत्तिरग्नौ च रूपप्रकाशनप्रतिपत्तिः प्रमा । | पूर्व०— यहाँ मेरे वाक्यमें उपनिषत्प्रामाण्यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप प्रमा तथा अग्निमें रूपप्रकाशनका ज्ञानरूप प्रमा तो प्रत्यक्ष ही है । | | कस्तर्हि भवतः प्रद्वेषो ब्रह्मैकत्वप्रत्यये प्रमां प्रत्यक्षां कुर्वतीषूपनिषत्सूपलभ्यमानासु ? प्रतिषेधानुपपत्तेः । शोकमोहादिनिवृत्तिश्च प्रत्यक्षं फलं ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिपारम्पर्यजनितमित्यवोचाम। तस्मादुक्तोत्तरत्वादुपनिषदं प्रत्य- | सिद्धान्ती— तो फिर ब्रह्मैकत्वज्ञानमें प्रमाको प्रत्यक्ष करती हुई उपलब्ध होनेवाली उपनिषदोंमें ही आपका क्या द्वेष है ? क्योंकि उनके प्रामाण्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । तथा हम यह कह चुके हैं कि शोकमोहादिकी निवृत्ति—यह ब्रह्मैकत्वज्ञानकी परम्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष फल है । अतः इसका उत्तर ऊपर दे दिया जानेके कारण उपनिषदोंमें |
१. 'उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, यह उत्तर ऊपर दिया गया है ।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७
| प्रामाण्यशङ्का तावन्नास्ति । | अप्रामाण्यकी शङ्का तो हो नहीं सकती । |
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| यच्चोक्तं स्वार्थविघातकरत्वा- <br> दप्रामाण्यमिति, तदपि न, तदर्थ- <br> प्रतिपत्तेर्बाधकाभावात् । न हि <br> उपनिषद्भ्यः—ब्रह्मैकमेवाद्विती- <br> यम्, नैव च—इति प्रतिपत्तिरस्ति; <br> यथाग्निरुष्णः शीतश्चेत्यस्माद्वा- <br> क्याद्विरुद्धार्थद्वयप्रतिपत्तिः । अ- <br> भ्युपगम्य चैतदवोचाम; न तु <br> वाक्यप्रामाण्यसमय एष न्यायः— <br> यदुतैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वम्। <br> सति चानेकार्थत्वे, स्वार्थश्च स्यात्, <br> तद्विघातकृच्च विरुद्धोऽन्योऽर्थः। न <br> त्वेतत्—वाक्यप्रमाणकानां विरु- <br> द्धमविरुद्धं च' एकं वाक्यम्, अने- <br> कमर्थं प्रतिपादयतीत्येष समयः, <br> अर्थैकत्वाद्वह्येकवाक्यता । | और ऐसा जो कहा कि अपने अर्थका विघात करनेवाली होनेसे उनकी अप्रामाणिकता है, सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि उनसे होनेवाले अर्थज्ञानका कोई बाधक नहीं है । उपनिषदोंसे यह ज्ञान नहीं होता कि ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है भी और नहीं भी है, जिस प्रकार कि 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, इस एक ही वाक्यसे दो विरुद्ध अर्थोंका ज्ञान होता है । तथा यह समझकर ही हम ऐसा कह चुके हैं कि वाक्यकी प्रामाणिकताके समय एक वाक्यके अनेक अर्थ मानने उचित नहीं हैं । यदि वाक्यके अनेक अर्थ होंगे तो एक उसका अपना अर्थ होगा और दूसरा उसका विघात करनेवाला अर्थ होगा । 'एक ही वाक्य बहुत-से विरुद्ध और अविरुद्ध अर्थोंका भी प्रतिपादन करता है, यह वाक्यको प्रमाण माननेवालोंका सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि अर्थकी एकता होनेसे ही सबकी एकवाक्यता होती है । |
| न च कानिचिदुपनिषद्वाक्यानि <br> ब्रह्मैकत्वप्रतिषेधं कुर्वन्ति । यत्तु, <br> लौकिकं वाक्यम्—अग्निरुष्णः | कोई-कोई उपनिषद्वाक्य ब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हों—ऐसी भी बात नहीं है । 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, यह जो लौकिक |
४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| शीतश्चेति, न तत्रैकवाक्यता, तदेकदेशस्य प्रमाणान्तरविषयानुवादित्वात्। अग्निः शीत इत्येतदेकं वाक्यम्; अग्निरुष्ण इति तु प्रमाणान्तरानुभवस्मारकम्, न तु स्वयमर्थावबोधकम्। अतो नाग्निः शीत इत्यनेनैकवाक्यता, प्रमाणान्तरानुभवस्मारेणैवोपक्षीणत्वात्। यत्तु विरुद्धार्थप्रतिपादकमिदं वाक्यमिति मन्यते, तच्छीतोष्णपदाभ्याम् अग्निपदसामानाधिकरण्यप्रयोगनिमित्ता भ्रान्तिः; न त्वेवैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वं लौकिकस्य वैदिकस्य वा। | वाक्य है, वहाँ एकवाक्यता नहीं होती; क्योंकि उसका एकदेश प्रमाणान्तरके विषयभूत अर्थका अनुवाद करनेवाला है। 'अग्नि शीतल होता है' यह एक वाक्य है और 'अग्नि उष्ण होता है' यह प्रमाणान्तरसे प्राप्त हुए अनुभवका अनुवादक है, स्वयं किसी विशेष अर्थका द्योतक नहीं है। अतः 'अग्नि शीतल होता है' इस वाक्यसे उसकी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि वह प्रमाणान्तरसे होनेवाले अनुभवकी स्मृति कराकर ही समाप्त हो जाता है। और ऐसा जो माना जाता है कि यह वाक्य विरुद्ध अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाला है, वह शीत और उष्ण पदोंका अग्निपदके समानाधिकरणरूपसे प्रयोग होनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति¹ है। वास्तवमें तो लौकिक हो अथवा वैदिक, एक वाक्यके अनेक अर्थ हो ही नहीं सकते। |
| [कर्मकाण्डप्रामाण्योपपादनम्]<br>यच्चोक्तं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातकृदुपनिषद्व्राक्यमिति, तन्न; अन्यार्थत्वात्। ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनपरा ह्युपनिषदो नेष्टार्थप्राप्तौ | और ऐसा जो कहा कि उपनिषद्वाक्य कर्मकाण्डकी प्रामाणिकताको नष्ट करनेवाले हैं, सो यह बात नहीं है; क्योंकि उनका तात्पर्य तो दूसरा है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी |
१. तात्पर्य यह है कि वस्तुतः यह किसी प्रमाका उत्पादक नहीं है।
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९ |
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| साधनोपदेशं तस्मिन्वा पुरुषनियोगं वारयन्ति, अनेकार्थत्वानुपपत्तेरेव । | प्राप्तिके लिये साधनके उपदेश तथा उसमें पुरुषके नियोगका निवारण नहीं करतीं; क्योंकि उनके अनेक अर्थ होने सम्भव ही नहीं हैं। | | न च कर्मकाण्डवाक्यानां स्वार्थे प्रमा नोत्पद्यते । असाधारणे चेत्स्वार्थे प्रमामुत्पादयति वाक्यम्, कुतोऽन्येन विरोधः स्यात् ? | तथा कर्मकाण्डसम्बन्धी वाक्योंकी स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है ! यदि कोई वाक्य अपने असाधारण अर्थमें प्रमा उत्पन्न करता है तो उसका दूसरे वाक्यसे विरोध क्यों होगा ? | | ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वात्प्रमा नोत्पद्यत एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें ब्रह्मकी एकता माननेपर तो कर्मकाण्डपरक वाक्योंका कोई विषय ही नहीं रहता, इसलिये प्रमा उत्पन्न हो ही नहीं सकती; तो ? | | न, प्रत्यक्षत्वात्प्रमायाः । "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" "ब्राह्मणो न हन्तव्यः" इत्येवमादिवाक्येभ्यः प्रत्यक्षा प्रमा जायमाना; 'सा नैव भविष्यति, यद्युपनिषदो ब्रह्मैकत्वं बोधयिष्यन्ति' इत्यनुमानम्; न चानुमानं प्रत्यक्षविरोधे प्रामाण्यं लभते; तस्मादसदेवैतद्ब्रूयते—प्रमैव नोत्पद्यत इति। अपि च यथाप्राप्तस्यैव | सिद्धान्ती —ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनसे प्रमाका होना तो प्रत्यक्ष है। "स्वर्गकी इच्छावाला दर्श और पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" "ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये" इत्यादि ऐसे ही वाक्योंसे प्रमा प्रत्यक्ष उत्पन्न होती देखी जाती है; 'यदि उपनिषदें ब्रह्मकी एकताका ज्ञान करायेंगी तो वह नहीं होगी' यह तो अनुमान है। और प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं रह सकती। इसलिये यह कहना कि उनसे प्रमा ही उत्पन्न नहीं होती—असत् ही है। अपितु जो पुरुष |
४९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अविद्याप्रत्युपस्थापितस्य क्रियाकारकफलस्याश्रयणेन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायसामान्ये प्रवृत्तस्य तद्विशेषमजानतः तदाचक्षाणा श्रुतिः क्रियाकारकफलभेदस्य लोकप्रसिद्धस्य सत्यतामसत्यतां वा नाचष्टे न च वारयति, इष्टानिष्टफलप्राप्तिपरिहारोपायविधिपरत्वात् । <br><br> यथा काम्येषु प्रवृत्ता श्रुतिः कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वे सत्यपि यथाप्राप्तानेव कामानुपादाय तत्साधनान्येव विधत्ते, न तु कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वादन्अर्थरूपत्वं चेति न विदधाति । तथा नित्याग्निहोत्रादिशास्त्रमपि मिथ्याज्ञानप्रभवं क्रियाकारकभेदं यथाप्राप्तमेवादाय इष्टविशेषप्राप्तिमनिष्टविशेषपरिहारं वा किमपि प्रयोजनं पश्यदग्निहोत्रादीनि कर्माणि विधत्ते । नाविद्यागोच- | अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलका आश्रय करके इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके सामान्य उपायमें प्रवृत्त है तथा उसका विशेष उपाय नहीं जानता, उसे वह (विशेष उपाय) बतलानेवाली श्रुति लोकप्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलभेदकी सत्यता एवं असत्यताका न तो प्रतिपादन ही करती है और न निषेध ही; क्योंकि वह तो इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायका विधान करनेमें ही तत्पर है। <br><br> जिस प्रकार काम्यकर्मोंमें प्रवृत्त हुई श्रुति कामनाओंके मिथ्याज्ञानजनित होनेपर भी यथाप्राप्त कामनाओंको ही लेकर उनके साधनोंका ही विधान करती है, किंतु 'कामनाएँ मिथ्याज्ञानजनित होनेके कारण अनर्थरूप नहीं हैं' ऐसा विधान नहीं करती । इसी प्रकार अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका निरूपण करनेवाला शास्त्र भी मिथ्याज्ञानजनित यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलरूप भेदको ही लेकर इष्टविशेषकी प्राप्ति और अनिष्टविशेषके परिहाररूप किसी प्रयोजनको देखकर अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करता है। इस प्रयोजनका अविद्याविषयक |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९१ |
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| रासद्वस्तुविषयमिति न प्रवर्तते; यथा काम्येषु । | असद्वस्तुसे सम्बन्ध है, इसलिये उनका विधान न करता हो—ऐसी बात नहीं है, जैसा कि काम्य-कर्मों के विषयमें भी देखा गया है। |
| न च पुरुषा न प्रवर्तेरन्नविद्यावन्तः, दृष्टत्वाद्यथा कामिनः । | अविद्यावान् पुरुषोंकी उन कर्मोंमें प्रवृत्ति न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि सकाम पुरुषोंके समान उन्हें भी प्रवृत्त होते देखा ही गया है। |
| विद्यावतामेव कर्माधिकार इति चेत् ? | पूर्व०—कर्मका अधिकार तो विद्वानोंको ही है—ऐसा कहें तो ? |
| न, ब्रह्मैकत्वविद्यायां कर्माधिकारविरोधस्योक्तत्वात् । एतेन ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वादुपदेशेन तद्ग्रहणफलाभावदोषपरिहार उक्तो वेदितव्यः । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि ब्रह्मकी एकताके ज्ञानमें कर्माधिकारका विरोध तो बतलाया जा चुका है। इसीसे यह जान लेना चाहिये कि ब्रह्मकी एकता सिद्ध होनेपर कोई विषय न रहनेके कारण कर्मकाण्डके उपदेशसे उसका ग्रहणरूप फल नहीं हो सकता—इस दोषका परिहार बतला दिया गया है। |
| पुरुषेच्छा रागादिवैचित्र्याच्च—<br><br>अनेका हि पुरुषाणामिच्छाः, रागादयश्च दोषा विचित्राः; ततश्च बाह्यविषयरागाद्यपहृतचेतसो न शास्त्रं निवर्तयितुं शक्तम्; नापि स्वभावतो बाह्यविषयविरक्त- | पुरुषोंकी इच्छा एवं रागादिका भेद रहनेके कारण भी [कर्मकाण्डके उपदेशकी सार्थकता सिद्ध होती है]। पुरुषोंकी अनेकों इच्छाएँ हैं और रागादि तरह-तरहके दोष हैं, अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंके रागसे आकर्षित है, उन्हें उससे निवृत्त करनेमें शास्त्र समर्थ नहीं है। इसी तरह जिनका चित्त स्वभावसे ही बाह्य विषयोंसे विरक्त है, उनको |
| ४९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| ४९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| चेतसो विषयेषु प्रवर्तयितुं शक्तम्;<br><br>किन्तु शास्त्रादेतावदेव भवति—इदमिष्टसाधनमिदमनिष्टसाधनमिति साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाभिव्यक्तिः—प्रदीपादिवत्तमसि रूपादिज्ञानम्। न तु शास्त्रं भृत्यानिव बलान्निवर्तयति नियोजयति वा;<br><br>दृश्यन्ते हि पुरुषा रागादिगौरवाच्छास्त्रमप्यतिक्रामन्तः। तस्मात् पुरुषमतिवैचित्र्यमपेक्ष्य साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाननेकधोपदिशति।<br><br>तत्र पुरुषाः स्वयमेव यथारुचि साधनविशेषेषु प्रवर्तन्ते, शास्त्रं तु सवितृप्रदीपादिवदुदास्त एव। तथा कस्यचित्परोऽपि पुरुषार्थोऽपुरुषार्थवदवभासते; यस्य यथावभासः; स तथारूपं पुरुषार्थं पश्यति; तदनुरूपाणि साधनान्युपादित्सते। तथा चार्थवादोऽपि—<br><br>“त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुः” (बृ०उ० | विषयोंमें प्रवृत्त करनेमें भी शास्त्र समर्थ नहीं है। किंतु शास्त्रसे तो इतना ही होता है कि यह इष्टसाधन है और यह अनिष्टसाधन—इस प्रकार केवल साध्यसाधनके सम्बन्धविशेषकी अभिव्यक्ति ही होती है, जिस प्रकार कि अन्धकारमें दीपकादिसे रूपका ज्ञान होता है। शास्त्र अपने सेवकोंके समान किसीको बलात्कारसे प्रवृत्त या निवृत्त नहीं करता;<br><br>क्योंकि रागादिकी अधिकता होनेपर लोग शास्त्रका उल्लङ्घन करते भी देखे जाते हैं; अतः पुरुषोंकी बुद्धिकी विचित्रताको दृष्टिमें रखकर शास्त्र अनेक प्रकारसे साध्य-साधनरूप सम्बन्धविशेषोंका उपदेश करता है।<br><br>तहाँ अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पुरुष स्वयं ही साधनविशेषोंमें प्रवृत्त होते हैं। शास्त्र तो सूर्य और दीपकादिके समान उदासीन ही रहता है। इस प्रकार किसीको परम पुरुषार्थ भी अपुरुषार्थके समान भासता है; जिसको जैसा भासता है वह तदनुरूप ही पुरुषार्थ देखता है, और उसके अनुसार ही साधन ग्रहण करना चाहता है। इस विषयमें<br><br>“प्रजापतिके तीन पुत्रोंने अपने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्य वास किया’ |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३
| ५।२।१) इत्यादिः। तस्मान्न ब्रह्मैकत्वं ज्ञापयिष्यन्तो वेदान्ता विधिशास्त्रस्य बाधकाः। न च विधिशास्त्रमेतावता निर्विषयं स्यात्। नाप्युक्तकारकादिभेदं विधिशास्त्रमुपनिषदां ब्रह्मैकत्वं प्रति प्रामाण्यं निवर्तयति। स्वविषयशूराणि हि प्रमाणानि, श्रोत्रादिवत्। <br><br> [ब्रह्मैकत्वमाक्षिप्यते] <br> तत्र पण्डितम्मन्याः केचित्स्वचित्तवशात्सर्वं प्रमाणितरेतरविरुद्धं मन्यन्ते, तथा प्रत्यक्षादिविरोधमपि चोदयन्ति ब्रह्मैकत्वे— <br><br> शब्दादयः किल श्रोत्रादिविषया भिन्नाः प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते, ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतां प्रत्यक्षविरोधः स्यात्; तथा श्रोत्रादिभिः शब्दा- | इत्यादि अर्थवाद भी है। अतः ब्रह्मकी एकताको सूचित करनेवाले वेदान्तवाक्य विधि-शास्त्रके बाधक नहीं हैं। इतनेहीसे विधिशास्त्र निर्विषय नहीं हो सकता और न उपर्युक्त कारकादि भेदवाला विधिशास्त्र ब्रह्मकी एकताके प्रति उपनिषदोंके प्रामाण्यको ही निवृत्त कर सकता है; क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियोंके समान सब प्रमाण अपने-अपने विषयमें प्रबल होते हैं। <br><br> यहाँ अपनेको पण्डित माननेवाले कोई-कोई पुरुष [शास्त्रगम्य ऐक्यको स्वीकार करनेपर] अपनी बुद्धिके अनुसार समस्त प्रमाणोंको एक-दूसरेके विरुद्ध समझते हैं तथा ब्रह्मकी एकता माननेमें प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विरोधकी भी शङ्का करते हैं— <br><br> श्रोत्रादि इन्द्रियोंके विषयभूत जो शब्दादि हैं, वे तो प्रत्यक्ष ही भिन्न-भिन्न उपलब्ध होते हैं। अतः ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध सिद्ध होता है। इसी प्रकार श्रोत्रादि- |
१. प्रजापतिके तीन पुत्र देवता, मनुष्य और दानव प्रजापतिसे उपदेश ग्रहण करनेके लिये गये। प्रजापतिने उन तीनोंको 'द', 'द', 'द' ऐसा कहकर एक ही शब्दसे उपदेश किया। उन तीनोंने अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उसके 'दमन करो', 'दान करो' और 'दया करो' ये तीन अर्थ कर लिये। इस प्रकार यह अर्थवाद इस उपनिषदके पञ्चम अध्याय द्वितीय ब्राह्मणमें है।
४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| द्युपलब्धारः कर्तारश्च धर्माधर्मयोः प्रतिशरीरं भिन्ना अनुमीयन्ते संसारिणः; तत्र ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतामनुमानविरोधश्च । तथा च आगमविरोधं वदन्ति—"ग्रामकामो यजेत" "पशुकामो यजेत" "स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादिवाक्येभ्यो ग्रामपशुस्वर्गादिकामास्तत्साधनाद्यनुष्ठातारश्च भिन्ना अवगम्यन्ते । <br><br> (उक्ताक्षेप-निरासः) <br> अत्रोच्यते—ते तु कुतर्कदूषितान्तःकरणा ब्राह्मणादिवर्णापसदा अनुकम्पनीया आगमार्थविच्छिन्नसम्प्रदायबुद्धय इति । कथम् ? श्रोत्रादिद्वारैः शब्दादिभिः प्रत्यक्षत उपलभ्यमानैर्ब्रह्मण एकत्वं विरुध्यत इति वदन्तो वक्तव्याः—किं शब्दादीनां भेदेनाकाशैकत्वं विरुध्यत | से शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले संसारी जीव भी प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा अनुमान होता है। ऐसी स्थितिमें ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका अनुमान प्रमाणसे भी विरोध है। इसी तरह वे उनका शास्त्रप्रमाणसे भी विरोध बतलाते हैं, [ क्योंकि ] "ग्रामकी कामनावाला यज्ञ करे", "पशुकी कामनावाला यज्ञ करे", "स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे", इत्यादि वाक्योंद्वारा ग्राम, पशु और स्वर्गकी कामनावाले तथा उनके साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुष भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। <br><br> अब इसके उत्तरमें कहा जाता है—कुतर्कके कारण जिनके अन्तःकरण दूषित हैं तथा जिनकी बुद्धि वेदार्थविषयक सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे वे ये ब्राह्मणादि वर्णाधम दयाके ही पात्र हैं। सो कैसे ?—श्रोत्रादि द्वारोंसे प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाले शब्दादिसे ब्रह्मकी एकताका विरोध है—इस प्रकार कहनेवाले उन पुरुषोंसे यह कहना चाहिये कि क्या शब्दादिके भेदसे आकाशकी एकताका भी विरोध है ? यदि उसका |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९५ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| इति; अथ न विरुध्यते, न तर्हि प्रत्यक्षविरोधः। | विरोध नहीं है तो प्रत्यक्ष प्रमाणसे [ब्रह्मैकत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंका] विरोध नहीं हो सकता। |
| यच्चोक्तं प्रतिशरीरं शब्दाद्युपलब्धारो धर्माधर्मयोश्च कर्तारो भिन्ना अनुमीयन्ते, तथा च ब्रह्मैकत्वेऽनुमानविरोध इति; भिन्नाः कैरनुमीयन्त इति प्रष्टव्याः; अथ यदि ब्रूयुः—सर्वैरस्माभिरनुमानकुशलैरिति—के यूयमनुमानकुशला इत्येवं पृष्टानां किमुत्तरम्। | और ऐसा जो कहा कि प्रत्येक शरीरमें शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले भी भिन्न-भिन्न ही अनुमान किये जाते हैं, इसलिये ब्रह्मकी एकता माननेपर अनुमानप्रमाणसे विरोध होगा, सो यह पूछना चाहिये कि वे भिन्न-भिन्न हैं—इसका अनुमान कौन करता है ? इसपर यदि वे कहें कि अनुमान करनेमें कुशल हम सब लोग ही इसका अनुमान करते हैं, तो 'अनुमान करनेमें कुशल तुम कौन हो ?' इस प्रकार पूछे जानेपर तुम्हारा क्या उत्तर होगा ? |
| शरीरेन्द्रियमनआत्मसु च प्रत्येकमनुमानकौशलप्रत्याख्याने, शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानो वयमनुमानकुशलाः, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणामिति चेत् ? | पूर्व०-शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मामेंसे क्रमशः एक-एकमें अनुमानकौशलका निषेध किये जानेपर जो शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनोंवाले हम आत्मा हैं, वे ही अनुमान करनेमें कुशल हैं, क्योंकि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, ऐसा कहें तो ? |
| एवं तर्ह्यनुमानकौशलेभवतामनेकत्वप्रसङ्गः; अनेककारकसाध्या | सिद्धान्ती-यदि ऐसी बात है, तब तो अनुमानकी कुशलतामें तो तब आपकी अनेकता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है। क्रिया अनेक कारकों- |
४९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| हि क्रियेति भवद्भिरेवाभ्युपगतम् । तत्रानुमानं च क्रिया; सा शरीरेन्द्रियमनआत्मसाधनैः कारकैरात्मकर्तृका निर्वर्त्येत इत्येतत्प्रतिज्ञातम् । तत्र वयमनुमानकुशला इत्येवं वदद्भिः—शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानः प्रत्येकं वयमनेक इत्यभ्युपगतं स्यात् । अहो अनुमानकौशलं दर्शितमपुच्छशृङ्गैस्तार्किकबलीवर्दैः। यो ह्यात्मानमेव न जानाति स कथं मूढस्तद्गतं भेदमभेदं वा जानीयात् ? | द्वारा साध्य होती है—ऐसा तो आपने ही स्वीकार किया है। तथा अनुमान भी क्रिया ही है। उसके विषयमें आपकी यह प्रतिज्ञा है कि आत्मा जिसका कर्ता है, ऐसी वह क्रिया शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मारूप कारकोंद्वारा निष्पन्न होती है। ऐसी स्थितिमें 'हम अनुमानकुशल हैं' ऐसा कहकर आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम प्रत्येक शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनवाले आत्मा अनेक हैं। अहो ! जिनके सींग और पूँछ नहीं हैं, ऐसे आप तार्किक-वृषभोंने यह अच्छा अनुमानकौशल दिखलाया। जो आत्माको ही नहीं जानता वह मूढ़ पुरुष किस प्रकार उसके भेद या अभेदको जान सकता है ? | | तत्र किमनुमिनोति ? केन वा लिङ्गेन ? न ह्यात्मनः स्वतो भेदप्रतिपादकं किञ्चिन्लिङ्गमस्ति,येन लिङ्गेनात्मभेदं साधयेत्; यानि लिङ्गान्यात्मभेदसाधनाय नाम- | ऐसी स्थितिमें वह क्या अनुमान करता है और किस लिङ्गके द्वारा करता है ? आत्माका अपनेसे भेद प्रतिपादन करनेवाला कोई लिङ्ग तो है नहीं, जिस लिङ्गके द्वारा कि वह आत्माओंका भेद सिद्ध कर सके। जिन नाम-रूपवान् लिङ्गोंका आत्मभेद सिद्ध करनेके लिये उल्लेख |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९७ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९७ |
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| रूपवन्त्युपन्यस्यन्ति, तानि नामरूपगतान्युपाधय एवात्मनो घटकरकापवरकभूच्छिद्राणीवाकाशस्य । यदाकाशस्य भेदलिङ्गं पश्यति, तदात्मनोऽपि भेदलिङ्गं लभेत सः; न ह्यात्मनः परतोऽपि विशेषमभ्युपगच्छद्भिस्तार्किकशतैरपि भेदलिङ्गमात्मनो दर्शयितुं शक्यते; स्वतःस्तु दूरादपनीतमेव, अविषयत्वादात्मनः । यद्यत्पर आत्मधर्मत्वेनाभ्युपगच्छति, तस्य तस्य नामरूपात्मकत्वाभ्युपगमात्, नामरूपाभ्यां चात्मनोऽन्यत्वाभ्युपगमात्, "आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म" ( छा० उ० ८ । १४ । १ ) इति श्रुतेः "नामरूपे व्याकरवाणि" ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) इति च । उत्पत्तिप्रलयात्मके हि नामरूपे, तद्विलक्षणं च ब्रह्म—अतोऽनुमानस्यै- | किया जाता है, वे तो आकाशकी उपाधि घट, कमण्डलु, अपवरक ( झरोखा ) और भूच्छिद्रके समान आत्माकी नाम-रूपगत उपाधियाँ ही हैं। यदि वह आकाशके भेदका अनुमापक लिङ्ग देखता है तो आत्माके भेदका लिङ्ग भी पा सकता है । किंतु अन्य ( उपाधियों ) से भी आत्माका भेद माननेवाले सैकड़ों तार्किकोंद्वारा भी आत्माके भेदका वास्तविक लिङ्ग नहीं दिखलाया जा सकता है, स्वतः तो आत्मामें भेद होना दूरकी ही बात है; क्योंकि वह किसीका विषय नहीं है,^१ पूर्वपक्षी जिस-जिसको आत्माके धर्मरूपसे स्वीकार करता है, उसी-उसीको नाम-रूपात्मक माना गया है और "आकाश ( ब्रह्म ) ही नाम एवं रूपका निर्वाह करनेवाला है, ये जिसके अन्तर्गत हैं, वह ब्रह्म है" इस श्रुतिसे तथा "मैं नाम-रूपोंको व्यक्त करूँ" इस वाक्यसे भी नाम और रूपोंसे आत्माका अन्यत्व स्वीकार किया गया है । नाम और रूप ही उत्पत्ति एवं प्रलयरूप हैं तथा ब्रह्म उनसे भिन्न है, अतः अनुमानका |
१. तात्पर्य यह है कि आत्मामें औपाधिक और स्वाभाविक दोनों ही प्रकारका भेद नहीं हो सकता ।
बृ० उ० ३२—
४९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| वाविषयत्वात्कुतोऽनुमानविरोधः? <br><br> एतेनागमविरोधः प्रत्युक्तः। <br><br> यदुक्तं ब्रह्मैकत्वे यस्मा उपदेशः, यस्य चोपदेशग्रहणफलम्, तदभावादेकत्वोपदेशानर्थक्यमिति, तदपि न, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणां कश्चोद्यो भवति। एकस्मिन्ब्रह्मणि निरुपाधिके नोपदेशः, नोपदेष्टा, न चोपदेशग्रहणफलम्; तस्मादुपनिषदां चानर्थक्यमित्येतदभ्युपगतमेव। अथानेककारकविषयानर्थक्यं चोद्यते—न, स्वतोऽभ्युपगमविरोधादात्मवादिनाम् । | विषय ही न होनेके कारण अनुमानसे उसका विरोध कैसे हो सकता है? इससे शास्त्रविरोधका भी परिहार कर दिया गया।१ <br><br> ऐसा जो कहा कि ब्रह्मकी एकता स्वीकार करनेपर तो जिसको उपदेश किया जायगा और जिसे उपदेशग्रहणका फल होगा, उन दोनोंका अभाव होनेके कारण उसकी एकताके उपदेशकी व्यर्थता ही सिद्ध होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली होती ही हैं, अतः इस विषयमें किससे प्रश्न किया जा सकता है। एक निरुपाधिक ब्रह्ममें तो न उपदेश है, न उपदेष्टा है और न उपदेशग्रहणका फल ही है। अतः [ब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर एकत्वोपदेशके साथ ही] सम्पूर्ण उपनिषदोंकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है; और यह हमें भी मान्य ही है। यदि [ब्रह्मज्ञानके पहले भी] अनेक कारकोंके विषयभूत उपदेशको व्यर्थ बतावें तो ठीक नहीं है; क्योंकि इसका तो स्वयं आत्मज्ञानियोंके मतसे विरोध है।२ अतः यह अल्पबुद्धि |
१. क्योंकि औपाधिक भेदसे व्यवहार होना तो सम्भव है ही।
२. यहाँ जो एकत्वके उपदेशको व्यर्थ बताया गया है, इसके दो अभिप्राय हो सकते हैं—एक तो यह कि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, अतः
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| तस्मात्तार्किकचाटभटराजाप्रवेश्यम् अभयं दुर्गमिदमल्पबुद्धथगम्यं शास्त्रगुरुप्रसादरहितैश्च, "कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति" (क० उ० १।२।२१) "देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा" (क० उ० १।१।२१) "नैषा तर्केण मतिरापनेया" (क० उ० | पुरुषोंके लिये अगम्य और शास्त्र एवं गुरुकी कृपासे रहित पुरुषोंद्वारा दुर्भेद्य अभय दुर्ग तार्किक-चाटभट-राजोंके¹ लिये प्रवेशयोग्य नहीं है। "उस सहर्ष और हर्षरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?" "इस विषयमें पूर्वकालमें देवताओोंने भी संदेह किया था," "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं |
उपदेशरूप क्रिया भी अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेके कारण एकत्वका उपदेश उत्पन्न नहीं हो सकता। दूसरा अभिप्राय यह हो सकता है कि जब ब्रह्म एक और नित्य मुक्तस्वरूप है तो उसमें कभी भी द्वैतरूप बन्धन न होनेके कारण मुक्तिके लिये एकत्वका उपदेश निरर्थक है। इनमेंसे पहले अभिप्रायके अनुसार एकत्वके उपदेशको निरर्थक बताया गया है—ऐसा यदि कोई कहे तो उसके विरोधमें सिद्धान्ती कहता है—'तदपि न' इत्यादि। अर्थात् उक्त अभिप्रायसे एकत्वोपदेशको निरर्थक नहीं बताया जा सकता; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली हैं ही, इसके लिये किससे प्रश्न किया जाय—कौन उत्तरदायी होगा ? इस अनेकताको ही दूर करनेके लिये तो एकत्वका उपदेश होता है, अतः वह असंगत नहीं हो सकता। यदि दूसरे अभिप्रायके अनुसार अर्थात् ब्रह्मके नित्यमुक्त होनेके कारण उक्त उपदेशकी व्यर्थता बतायी गयी हो तो यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मका ज्ञान हो जानेके बाद उक्त उपदेशकी व्यर्थता सिद्ध होती है या पहले ? यदि कहें बाद ही उसकी व्यर्थता है, तो इसको स्वयं भी स्वीकार करते हुए सिद्धान्ती कहता है—'एकस्मिन् ब्रह्मणि' इत्यादि। अर्थात् सब प्रकारकी उपाधियोंसे रहित एकमात्र ब्रह्ममें उपदेश, उपदेशक और उपदेशग्रहणका फल—यह कुछ भी नहीं है, इसलिये केवल एकत्वका उपदेश ही नहीं समस्त उपनिषदें ही उस अवस्थामें निरर्थक हैं और इसे हम भी स्वीकार करते ही हैं। यदि कहें 'ब्रह्मज्ञानके पहले भी एकत्वका उपदेश व्यर्थ है; क्योंकि यह अनेक कारकोंद्वारा साध्य होनेवाला है' तो ठीक नहीं, कारण कि अपनी मान्यताके विरुद्ध है। ज्ञानके पहले अविद्याकी निवृत्तिके लिये सभी आत्मज्ञानी एकत्वोपदेशकी सार्थकता स्वीकार करते हैं।
१. चाट=आर्यमर्यादाको तोड़नेवाले; भट=मिथ्यावादी।
| ५०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
| ५०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ | | :--- | :--- |
| १।२।९)—वरप्रसादलभ्यत्व-श्रुतिस्मृतिवादेभ्यश्च; “तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके” ( ईशा० उ० ५ ) इत्यादि-विरुद्धधर्मसमवायित्वप्रकाशकमन्त्रवर्णेभ्यश्च। गीतासु च— “मत्स्थानि सर्वभूतानि” ( ९ । ४ ) इत्यादि। तस्मात्परब्रह्मव्यतिरेकेण संसारी नाम नान्यद्वस्त्वन्तरमस्ति। तस्मात्सुष्ठूच्यते “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेद् अहं ब्रह्मास्मि” ( १ । ४ । १०) “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतॄ” ( ३ । ८ । ११ ) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः। तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः ‘सत्यस्य सत्यम्’ नामोपनिषत्परा। २०। | है” तथा देवतादिके वर और कृपाद्वारा उसके प्राप्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी वाक्योंसे एवं “वह चलता है और वह नहीं चलता, वह दूर है और वह समीप भी है” इत्यादि ब्रह्ममें विरुद्ध धर्मोंका समवायित्व प्रकाशन करनेवाले मन्त्रवर्णोंसे भी यही सिद्ध होता है। गीतामें भी कहा है— “सब भूत मुझमें स्थित हैं” इत्यादि। अतः परब्रह्मसे भिन्न संसारी नामकी कोई अन्य वस्तु नहीं है। इसलिये “पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना कि मैं ब्रह्म हूँ” “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है और इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है। अतः ‘सत्यका सत्य है’ यह परम उपनिषद् परब्रह्मकी ही है॥ २०॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथममजातशत्रुब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
| उपक्रमः | ‘ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि’ इति प्रस्तुतम्; तत्र यतो जगज्जातं यन्मयं | ‘मैं तुम्हें ब्रह्मका बोध कराऊँगा’ इस प्रकार यहाँ प्रसंग आरम्भ हुआ है। सो, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ |
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
| यस्मिंश्च लीयते तदेकं ब्रह्मेति ज्ञापितम्। किमात्मकं पुनस्तज्जगज्जायते, लीयते च? पञ्चभूतात्मकम्; भूतानि च नामरूपात्मकानि; नामरूपे सत्यमिति ह्युक्तम्; तस्य सत्यस्य पञ्चभूतात्मकस्य सत्यं ब्रह्म। <br><br> कथं पुनर्भूतानि सत्यमिति मूर्तामूर्तब्राह्मणम्। मूर्तामूर्तभूतात्मकत्वात्कार्यकरणात्मकानि भूतानि प्राणा अपि सत्यम्। तेषां कार्यकरणात्मकानां भूतानां सत्यत्वनिर्दिधारयिषा ब्राह्मणद्वयमारभ्यते सैवोपनिषद्व्याख्या! कार्यकरणसत्यत्वावधारणद्वारेण हि सत्यस्य सत्यं ब्रह्मावधार्यते। अत्रोक्तम् 'प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्' इति। तत्र के प्राणाः? कियत्यो वा प्राणविषया उपनिषदः? काः? इति च ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन करणानां प्राणानां स्वरूपमवधार- | है, जो इसका स्वरूप है और जिसमें यह लीन हो जाता है, वह एक ही ब्रह्म है—ऐसा यहाँ बतलाया गया है। तो भला, यह जगत् किस रूपसे स्थित हुआ उत्पन्न और लीन होता है? पञ्चभूतरूपसे। वे भूत नाम-रूपात्मक हैं और नाम-रूप 'सत्य' हैं—ऐसा बतलाया जा चुका है। उस पञ्चभूतस्वरूप 'सत्य' का ब्रह्म सत्य है। <br><br> किंतु भूत सत्य किस प्रकार हैं, यह बतलानेके लिये ही यह मूर्तामूर्त ब्राह्मण है। मूर्तामूर्त भूतस्वरूप होनेके कारण देह-इन्द्रियरूप भूत और प्राण भी सत्य हैं। उन देहेन्द्रियस्वरूप भूतोंकी सत्यताका निश्चय करनेकी इच्छासे ये दो ब्राह्मण आरम्भ किये जाते हैं, यही इस उपनिषद्की व्याख्या है; क्योंकि देह और इन्द्रियोंके सत्यत्वका निश्चय करनेके द्वारा ही सत्यके सत्य ब्रह्मका निश्चय होता है। यहाँ यह बतलाया गया है कि 'प्राण ही सत्य हैं और यह उनका भी सत्य है;' सो प्राण कौन-से हैं? तथा प्राणविषयक उपनिषदें कितनी और कौन-कौन-सी हैं? इस प्रकार ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे, मार्गमें पड़नेवाले कुएँ और बगीचों आदिके |
५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ५०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यति-पथिगतकूपारामाद्यवधारणवत् । | निश्चयके समान, श्रुति इन्द्रियों और प्राणोंके स्वरूपका निश्चय करती है। |
शिशुसंज्ञक मध्यम प्राणका उसके उपकरणोंसहित वर्णन
यो ह वै शिशुँ साधानँ सप्रत्याधानँ सस्थूणँ सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि । अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम ॥ १ ॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम (बन्धनरज्जु) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह (शरीर) ही आधान है, यह (शिर) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा है और अन्न दाम है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद, तस्येदं फलम्; किं तत् ? सप्त सप्तसंख्याकान् ह द्विषतो द्वेषकर्तॄन् भ्रातृव्यान् । भ्रातृव्या हि द्विविधा भवन्ति, द्विषन्तोऽद्विषन्तश्च, तत्र द्विषन्तो ये भ्रातृव्यास्तान् द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि; सप्त ये शीर्षण्याः प्राणा विषयोपलब्धिद्वाराणि तत्प्रभवा विषयरागाः सहजत्वाद् भ्रातृव्याः । ते ह्यस्य स्वात्मस्थां दृष्टिं विषयविषयां | जो भी आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दामके सहित शिशुको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह फल क्या है ? वह द्वेष करनेवाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। भ्रातृव्य दो प्रकारके होते हैं—द्वेष करनेवाले और द्वेष न करनेवाले, उनमें जो द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य होते हैं, उन द्वेषी भ्रातृव्योंका वह अवरोध करता है। शिरमें स्थित जो सात प्राण विषयोपलब्धिके द्वार हैं, उनसे होनेवाले विषयसम्बन्धी राग साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण भ्रातृव्य हैं; क्योंकि वे ही उसकी आत्मस्थ दृष्टिको |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०३ |
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| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
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| कुर्वन्ति, तेन ते द्वेष्टारो भ्रातृव्याः। प्रत्यगात्मेक्षणप्रतिषेधकरत्वात्। काठके चोक्तम्—"पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्" इत्यादि। (२।१।१) तत्र यः शिश्वादीन्वेद, तेषां याथात्म्यमवधारयति, स एतान् भ्रातृव्यानवरुणद्ध्यपावृणोति विनाशयति। | विषयोन्मुख करते हैं, अतः वे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य हैं; कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शनको रोकनेवाले हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है—"स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि। सो, जो कोई इन शिशु आदिको जानता है, इनके यथार्थ स्वरूपका निश्चय करता है, वह इन भ्रातृव्योंका अवरोध-अपावरण अर्थात् विनाश कर देता है। |
| तस्मै फलश्रवणेनाभिमुखीभूतायाह—अयं वाव शिशुः। कोऽसौ? योऽयं मध्यमः प्राणः, शरीरमध्ये यः प्राणो लिङ्गात्मा, यः पञ्चधा शरीरमाविष्टः—बृहन्पाण्डरवासः सोम राजन्नित्युक्तः, यस्मिन्वाङ्मनःप्रभृतीनि करणानि विषक्तानि-पड्वीशशङ्कुनिदर्शनात्; स एष शिशुरिव, विषयेष्वितरकरणवदपटुत्वात्; | इस प्रकार फलश्रवणसे अभिमुख हुए उस (गार्ग्य) से [अजातशत्रु] कहता है—निश्चय यही शिशु है। यह कौन? जो यह मध्यम प्राण है। शरीरके मध्यमें जो यह लिङ्गात्मा प्राण है, जो पाँच प्रकारसे शरीरमें प्रविष्ट होकर बृहन्, पाण्डरवास, सोम और राजन् इन नामोंसे कहा जाता है, जिसमें वाणी और मन आदि इन्द्रियाँ विशेषरूपसे निबद्ध हैं, जैसा कि घोड़ेके पैर बाँधनेके मेखोंके दृष्टान्तसे बतलाया गया है; वह यह प्राण शिशुके समान अन्य इन्द्रियोंकी तरह विषयोंमें पटु न होनेके कारण शिशु है। |
| शिशुं साधानमित्युक्तम्। किं पुनस्तस्य शिशोर्वत्सस्थानीयस्य | मूल मन्त्रमें 'शिशुं साधानम्' ऐसा कहा गया है। सो उस वत्सस्थानीय |