बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 490, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 490
| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| योः समानः पन्थाः—येन भेदाभावे कर्मकाण्डं निरालम्बनमात्मानं न लभते प्रामाण्यं प्रति तथोपनिषदपि। एवं तर्हि यस्य प्रामाण्ये स्वार्थविघातो नास्ति, तस्यैव कर्मकाण्डस्यास्तु प्रामाण्यम्; उपनिषदां तु प्रामाण्यकल्पनायां स्वार्थविघातो भवेदिति मा भूत्प्रामाण्यम्। न हि कर्मकाण्डं प्रमाणं सदप्रमाणं भवितुमर्हति; न हि प्रदीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति, न प्रकाशयति चेति। | है, क्योंकि जिस प्रकार भेद न होनेपर कर्मकाण्ड निरालम्ब (अधिकारि-शून्य) होकर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार उपनिषद् भी स्वयं प्रामाणिक नहीं हो सकती। यदि ऐसी बात है, तब तो जिसकी प्रामाणिकता माननेपर स्वार्थका¹ विघात नहीं होता, उस कर्मकाण्डकी ही प्रामाणिकता माननी चाहिये। उपनिषदोंके प्रामाण्यकी कल्पना करनेमें तो स्वार्थका विघात होता है, इसलिये उनकी प्रामाणिकता भले ही न हो। कर्मकाण्ड प्रामाणिक होकर अप्रामाणिक नहीं हो सकता, क्योंकि दीपक अपने प्रकाश्य पदार्थको प्रकाशित करता है और प्रकाशित नहीं भी करता—ऐसा नहीं होता। |
| प्रत्यक्षादिप्रमाणविप्रतिषेधाच्च—<br>न केवलमुपनिषदो ब्रह्मैकत्वं प्रतिपादयन्त्यः स्वार्थविघातं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातं च कुर्वन्ति; प्रत्यक्षादिनिश्चितभेदप्रतिपत्त्यर्थप्रमाणैश्च विरुध्यन्ते। तस्माद- | इसके सिवा अभेद-श्रुतियोंका प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध भी है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें केवल स्वार्थविघात और कर्मकाण्डके प्रामाण्यका विघात ही नहीं करतीं अपितु निश्चित भेदका ज्ञान करनेवाले प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उनका विरोध भी है। |
१. शब्दकी शक्तिवृत्तिसे प्रतीत होनेवाले सृष्ट्यादि भेदका।