बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
| कल्प्यत इति ? कर्मकाण्डप्रामाण्यविरोधपरिहारायेत्येके; कर्मप्रतिपादकानि हि वाक्यानि अनेकक्रियाकारकफलभोक्तृकर्त्राश्रयाणि, विज्ञानात्मभेदाभावे ह्यसंसारिण एव परमात्मन एकत्वे कथमिष्टफलासु क्रियासु प्रवर्त्तयेयुः? अनिष्टफलाभ्यो वा क्रियाभ्यो निवर्त्तयेयुः? कस्य वा बद्धस्य मोक्षायोपनिषदारभ्येत ? अपि च परमात्मैकत्ववादिपक्षे कथं परमात्मैकत्वोपदेशः ? कथं वा तदुपदेशग्रहणफलम् ? बद्धस्य हि बन्धनाशायोपदेशस्तदभाव उपनिषच्छास्त्रं निर्विषयमेव । | है ? इसपर किन्हीं (मीमांसकों) का तो कहना है कि यह कल्पना कर्मकाण्डके प्रामाण्यसे प्रतीत होनेवाले विरोधका परिहार करनेके लिये है, क्योंकि कर्मका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य अनेकों क्रिया, कारक, फल, भोक्ता और कर्त्ताओंको आश्रय करनेवाले हैं, विज्ञानात्माका भेद न होनेपर असंसारी परमात्माका एकत्व रहते हुए वे किस प्रकार लोगोंको इष्टफलोंवाली क्रियाओंमें प्रवृत्त अथवा अनिष्ट फलोंवाली क्रियाओंसे निवृत्त कर सकेंगे। तथा किस बद्ध जीवकी मुक्तिके लिये उपनिषद्का आरम्भ किया जायगा ? इसके सिवा परमात्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवालोंके मतमें किसीको परमात्माके एकत्वका उपदेश भी क्यों दिया जायगा और किस प्रकार उसके उपदेशग्रहणका फल होगा ? क्योंकि बद्ध जीवके बन्धनका नाश करनेके लिये ही इसका उपदेश किया जाता है, बन्धन न होनेपर तो उपनिषच्छास्त्रका कोई विषय ही नहीं रहता । | | एवं तर्हि उपनिषद्वादिपक्षस्य कर्मकाण्डवादिपक्षेण चोद्यपरिहार- | पूर्वं०—ऐसी स्थितिमें तो उपनिषद्वादी पक्षके शङ्का-समाधानका मार्ग कर्मकाण्डवादी पक्षके समान ही |