बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| भिवदन्यदास्ते" इत्येवमादिमन्त्रवर्णेभ्यः।<br><br>न स्वत आत्मनः संसारित्वम्, अलक्तकाद्युपाधिसंयोगजनितरक्तस्फटिकादिबुद्धिवद्भ्रान्तमेव, न परमार्थतः। "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४ । ३ । ७) "न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्" (४ । ४ । २३) "न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (४ । ४ । २३) "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम्" (गीता १३ । २७) "शुनि चैव श्वपाके च" (गीता ५ । १८) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परमात्मनोऽसंसारित्वैव। अत एकदेशो विकारः शक्तिर्वा विज्ञानात्मा अन्यो वेति विकल्पयितुं निरवयवत्वाभ्युपगमे विशेषतो न शक्यते। अंशादिश्रुतिस्मृतिवादाश्चैकत्वार्थाः, न तु भेदप्रतिपादकाः, विवक्षितार्थैकवाक्ययोगात्—इत्यवोचाम।<br><br>(उपनिषत्प्रामाण्यमीमांसा)<br>सर्वोपनिषदां परमात्मैकत्वज्ञापनपरत्वे अथ किमर्थं तत्प्रतिकूलोऽर्थो विज्ञानात्मभेदः परि- | रहता है" इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध होता है।<br><br>आत्माका संसारित्व स्वतः नहीं है, अपितु लाक्षा आदि उपाधिके संयोगसे होनेवाली 'स्फटिक लाल है' इत्यादि बुद्धिके समान भ्रान्तिजनित ही है, परमार्थतः नहीं। "मानो ध्यान करता है, मानो अधिक चलता है", "यह कर्मसे न बढ़ता है, न छोटा होता है" "यह पापकर्मसे लिप्त नहीं होता" "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित", "कुत्ते और चाण्डालमें" इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे परमात्माका असंसारित्व ही सिद्ध होता है। अतः विशेषतः आत्माका निरवयवत्व स्वीकार करनेपर ऐसा विकल्प नहीं किया जा सकता कि विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश, विकार, शक्ति अथवा और कुछ है। उसके अंशादि होनेका प्रतिपादन करनेवाले श्रुतिस्मृतिवाद भी आत्माके एकत्वके ही लिये हैं, भेदका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि उपनिषदोंके विवक्षित अर्थकी एकवाक्यता होनी चाहिये—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।<br><br>समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य परमात्माके एकत्वमें है, फिर विज्ञानात्माके भेदरूप उससे प्रतिकूल विषयकी कल्पना किस लिये की जाती |