बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१
| ब्रह्मस्वरूपप्रतिपत्तिविषये ब्रह्मणोंऽशांश्येकदेशैकदेशिविकारविकारित्वकल्पना कार्या, सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम् ।<br><br>अतो हित्वा सर्वकल्पनामाकाशस्येव निर्विशेषता प्रतिपत्तव्या—<br>“आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः”<br>“न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः” (क० उ० २।२।११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; नात्मानं ब्रह्मविलक्षणं कल्पयेत्—उष्णात्मक इवाग्नौ शीतैकदेशम्, प्रकाशात्मके वा सवितरि तमएकदेशम्—सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम्। तस्मान्नामरूपोपाधिनिमित्ता एव आत्मन्यसंसारधर्मिणि सर्वे व्यवहाराः; “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” (क०उ० २।२।९-१०) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा- | को ब्रह्मस्वरूपके ज्ञानके विषयमें ब्रह्मके अंशांशी, एकदेश-एकदेशी अथवा विकार-विकारित्वादिकी कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सारी उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है।<br><br>इसलिये सारी कल्पनाओंको छोड़कर “ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है” “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उससे बाह्य है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंके अनुसार आकाशके समान उसकी निर्विशेषताका ही अनुभव करना चाहिये, उष्णस्वरूप अग्निमें एक शीतल देशके समान तथा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें एक अन्धकारमय देशके समान ब्रह्मसे भिन्न आत्माकी कल्पना न करे; क्योंकि सब उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है। अतः असंसारधर्मी आत्मामें सारे व्यवहार नाम एवं रूपकृत उपाधिके कारण ही हैं, जैसा कि “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया है” “धीर पुरुष समस्त रूपोंकी रचना कर उनके नाम रखकर उनके द्वारा बोलता |
बृ० उ० ३१—