बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| हि क्रियेति भवद्भिरेवाभ्युपगतम् । तत्रानुमानं च क्रिया; सा शरीरेन्द्रियमनआत्मसाधनैः कारकैरात्मकर्तृका निर्वर्त्येत इत्येतत्प्रतिज्ञातम् । तत्र वयमनुमानकुशला इत्येवं वदद्भिः—शरीरेन्द्रियमनःसाधना आत्मानः प्रत्येकं वयमनेक इत्यभ्युपगतं स्यात् । अहो अनुमानकौशलं दर्शितमपुच्छशृङ्गैस्तार्किकबलीवर्दैः। यो ह्यात्मानमेव न जानाति स कथं मूढस्तद्गतं भेदमभेदं वा जानीयात् ? | द्वारा साध्य होती है—ऐसा तो आपने ही स्वीकार किया है। तथा अनुमान भी क्रिया ही है। उसके विषयमें आपकी यह प्रतिज्ञा है कि आत्मा जिसका कर्ता है, ऐसी वह क्रिया शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मारूप कारकोंद्वारा निष्पन्न होती है। ऐसी स्थितिमें 'हम अनुमानकुशल हैं' ऐसा कहकर आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम प्रत्येक शरीर, इन्द्रिय और मनरूप साधनवाले आत्मा अनेक हैं। अहो ! जिनके सींग और पूँछ नहीं हैं, ऐसे आप तार्किक-वृषभोंने यह अच्छा अनुमानकौशल दिखलाया। जो आत्माको ही नहीं जानता वह मूढ़ पुरुष किस प्रकार उसके भेद या अभेदको जान सकता है ? | | तत्र किमनुमिनोति ? केन वा लिङ्गेन ? न ह्यात्मनः स्वतो भेदप्रतिपादकं किञ्चिन्लिङ्गमस्ति,येन लिङ्गेनात्मभेदं साधयेत्; यानि लिङ्गान्यात्मभेदसाधनाय नाम- | ऐसी स्थितिमें वह क्या अनुमान करता है और किस लिङ्गके द्वारा करता है ? आत्माका अपनेसे भेद प्रतिपादन करनेवाला कोई लिङ्ग तो है नहीं, जिस लिङ्गके द्वारा कि वह आत्माओंका भेद सिद्ध कर सके। जिन नाम-रूपवान् लिङ्गोंका आत्मभेद सिद्ध करनेके लिये उल्लेख |