बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९७ |
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| रूपवन्त्युपन्यस्यन्ति, तानि नामरूपगतान्युपाधय एवात्मनो घटकरकापवरकभूच्छिद्राणीवाकाशस्य । यदाकाशस्य भेदलिङ्गं पश्यति, तदात्मनोऽपि भेदलिङ्गं लभेत सः; न ह्यात्मनः परतोऽपि विशेषमभ्युपगच्छद्भिस्तार्किकशतैरपि भेदलिङ्गमात्मनो दर्शयितुं शक्यते; स्वतःस्तु दूरादपनीतमेव, अविषयत्वादात्मनः । यद्यत्पर आत्मधर्मत्वेनाभ्युपगच्छति, तस्य तस्य नामरूपात्मकत्वाभ्युपगमात्, नामरूपाभ्यां चात्मनोऽन्यत्वाभ्युपगमात्, "आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म" ( छा० उ० ८ । १४ । १ ) इति श्रुतेः "नामरूपे व्याकरवाणि" ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) इति च । उत्पत्तिप्रलयात्मके हि नामरूपे, तद्विलक्षणं च ब्रह्म—अतोऽनुमानस्यै- | किया जाता है, वे तो आकाशकी उपाधि घट, कमण्डलु, अपवरक ( झरोखा ) और भूच्छिद्रके समान आत्माकी नाम-रूपगत उपाधियाँ ही हैं। यदि वह आकाशके भेदका अनुमापक लिङ्ग देखता है तो आत्माके भेदका लिङ्ग भी पा सकता है । किंतु अन्य ( उपाधियों ) से भी आत्माका भेद माननेवाले सैकड़ों तार्किकोंद्वारा भी आत्माके भेदका वास्तविक लिङ्ग नहीं दिखलाया जा सकता है, स्वतः तो आत्मामें भेद होना दूरकी ही बात है; क्योंकि वह किसीका विषय नहीं है,^१ पूर्वपक्षी जिस-जिसको आत्माके धर्मरूपसे स्वीकार करता है, उसी-उसीको नाम-रूपात्मक माना गया है और "आकाश ( ब्रह्म ) ही नाम एवं रूपका निर्वाह करनेवाला है, ये जिसके अन्तर्गत हैं, वह ब्रह्म है" इस श्रुतिसे तथा "मैं नाम-रूपोंको व्यक्त करूँ" इस वाक्यसे भी नाम और रूपोंसे आत्माका अन्यत्व स्वीकार किया गया है । नाम और रूप ही उत्पत्ति एवं प्रलयरूप हैं तथा ब्रह्म उनसे भिन्न है, अतः अनुमानका |
१. तात्पर्य यह है कि आत्मामें औपाधिक और स्वाभाविक दोनों ही प्रकारका भेद नहीं हो सकता ।
बृ० उ० ३२—