भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 504
४९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| वाविषयत्वात्कुतोऽनुमानविरोधः? <br><br> एतेनागमविरोधः प्रत्युक्तः। <br><br> यदुक्तं ब्रह्मैकत्वे यस्मा उपदेशः, यस्य चोपदेशग्रहणफलम्, तदभावादेकत्वोपदेशानर्थक्यमिति, तदपि न, अनेककारकसाध्यत्वात्क्रियाणां कश्चोद्यो भवति। एकस्मिन्ब्रह्मणि निरुपाधिके नोपदेशः, नोपदेष्टा, न चोपदेशग्रहणफलम्; तस्मादुपनिषदां चानर्थक्यमित्येतदभ्युपगतमेव। अथानेककारकविषयानर्थक्यं चोद्यते—न, स्वतोऽभ्युपगमविरोधादात्मवादिनाम् । | विषय ही न होनेके कारण अनुमानसे उसका विरोध कैसे हो सकता है? इससे शास्त्रविरोधका भी परिहार कर दिया गया।१ <br><br> ऐसा जो कहा कि ब्रह्मकी एकता स्वीकार करनेपर तो जिसको उपदेश किया जायगा और जिसे उपदेशग्रहणका फल होगा, उन दोनोंका अभाव होनेके कारण उसकी एकताके उपदेशकी व्यर्थता ही सिद्ध होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि क्रियाएँ तो अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न होनेवाली होती ही हैं, अतः इस विषयमें किससे प्रश्न किया जा सकता है। एक निरुपाधिक ब्रह्ममें तो न उपदेश है, न उपदेष्टा है और न उपदेशग्रहणका फल ही है। अतः [ब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर एकत्वोपदेशके साथ ही] सम्पूर्ण उपनिषदोंकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है; और यह हमें भी मान्य ही है। यदि [ब्रह्मज्ञानके पहले भी] अनेक कारकोंके विषयभूत उपदेशको व्यर्थ बतावें तो ठीक नहीं है; क्योंकि इसका तो स्वयं आत्मज्ञानियोंके मतसे विरोध है।२ अतः यह अल्पबुद्धि |


१. क्योंकि औपाधिक भेदसे व्यवहार होना तो सम्भव है ही।
२. यहाँ जो एकत्वके उपदेशको व्यर्थ बताया गया है, इसके दो अभिप्राय हो सकते हैं—एक तो यह कि क्रियाएँ अनेक कारकोंद्वारा साध्य होती हैं, अतः