बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ १३ ॥ | यह जो कुछ है, उस सबका यही पोषण करती है ॥ १३ ॥ |
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धर्मकी उत्पत्ति और उसके प्रभाव एवं स्वरूपका वर्णन
स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान्बलीयाँ२ समाशँ२सते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तँ२ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ १४॥
तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने श्रेयोरूप (कल्याणस्वरूप) धर्मकी अतिसृष्टि की। यह जो धर्म है, क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है। इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालोंको कहते हैं कि ‘यह धर्ममय वचन बोलता है’ तथा धर्ममय वचन बोलनेवालेसे कहते हैं कि ‘यह सत्य बोलता है’, क्योंकि ये दोनों धर्म ही हैं ॥ १४॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स चतुरः सृष्ट्वापि वर्णान्नैव व्यभवत्, उग्रत्वात्क्षत्रस्यानियताशङ्कया। तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत, किं तत् ? धर्मम्; तदेतच्छ्रेयोरूपं सृष्टं क्षत्रस्य क्षत्रं क्षत्रस्यापि नियन्तृ, | वह (ब्रह्म) चारों वर्णोंको रचकर भी—क्षत्रियजाति उग्र होती है, इसलिये वह नियन्त्रणमें नहीं रह सकती—इस आशङ्कासे विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। तब उसने अतिशयतासे श्रेयोरूप उत्पन्न किया। वह श्रेयोरूप कौन है? धर्म; वह यह रचा हुआ श्रेयोरूप धर्म क्षत्रका भी क्षत्र यानी क्षत्रियका भी नियन्ता है |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| उग्रादप्युग्रम्, यद्धर्मो यो धर्मः; तस्मात्क्षत्रस्यापि नियन्तृत्वाद्धर्मात्परं नास्ति; तेन हि नियम्यन्ते सर्वे। तत्कथम् ? इत्युच्यते—अथो अप्यबलीयान्दुर्बलतरो बलीयांसमात्मनो बलवत्तरमप्याशंसते कामयते जेतुं धर्मेण बलेन; यथा लोके राज्ञा सर्वबलवत्तमेनापि कुटुम्बिकः, एवम्; तस्मात्सिद्धं धर्मस्य सर्वबलवत्तरत्वात्सर्वनियन्तृत्वम्। | और उग्रसे भी उग्र है; 'यद्धर्मः' का अर्थ है जो धर्म; अतः क्षत्रियका भी नियन्ता होनेके कारण धर्मसे उत्कृष्ट कोई नहीं है, क्योंकि उसीके द्वारा सबका नियमन होता है। सो किस प्रकार ? यह बतलाया जाता है—जो अबलीयान् यानी बहुत दुर्बल होता है, वह भी बलीयान्—अपनी अपेक्षा अधिक बलवान्को धर्मरूपी बलके द्वारा जीतना चाहता है, जिस प्रकार लोकमें सबसे बलवान् राजाकी सहायतासे साधारण कुटुम्बी पुरुष अपनेसे अधिक बलवान्का पराभव करना चाहता है, उस प्रकार [ वह धर्मबलसे जीतना चाहता है। ] अतः सबकी अपेक्षा बलवत्तर होनेके कारण धर्म सबका नियन्ता है—यह सिद्ध होता है। |
| यो वै स धर्मो व्यवहारलक्षणो लौकिकैर्व्यवह्रियमाणः सत्यं वै तत्; सत्यमिति यथाशास्त्रार्थता; स एवानुष्ठीयमानो धर्मनामा भवति, शास्त्रार्थत्वेन ज्ञायमानस्तु सत्यं भवति। | वह जो लौकिक पुरुषोंद्वारा व्यवहार किया जानेवाला व्यवहाररूप धर्म है, वह निश्चय सत्य ही है। सत्य शास्त्रानुकूल अर्थका नाम है। वह (शास्त्रानुकूल अर्थ) ही अनुष्ठान किये जानेपर धर्म नामवाला होता है और शास्त्रके तात्पर्यरूपसे ज्ञात होनेपर वही सत्य कहलाता है।¹ |
| यस्मादेवं तस्मात्सत्यं यथाशास्त्रं वदन्तं व्यवहारकाले आहुः | क्योंकि ऐसा है, इसलिये व्यवहारकालमें सत्य यानी शास्त्रानुसार भाषण |
१. अभिप्राय यह है कि ज्ञात होनेवाला शास्त्रका तात्पर्य सत्य है और आचरणमें आनेपर वही धर्म कहलाता है।
२९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| समीपस्था उभयविवेकज्ञाः—धर्मं वदतीति, प्रसिद्धं लौकिकं न्यायं वदतीति। तथा विपर्ययेण धर्मं वा लौकिकं व्यवहारं वदन्तमाहुः—सत्यं वदति, शास्त्रादनपेतं वदतीति।<br><br>एतद्यदुक्तमुभयं ज्ञायमानमनुष्ठीयमानं चैतद्धर्म एव भवति। तस्मात्स धर्मो ज्ञानानुष्ठानलक्षणः शास्त्रज्ञानितरांश्च सर्वानिंव नियमयति। तस्मात्स क्षत्रस्यापि क्षत्रम्। अतस्तदभिमानोऽविद्वांस्तद्विशेषानुष्ठानाय ब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रनिमित्तविशेषमभिमन्यते। तानि च निसर्गत एव कर्माधिकारनिमित्तानि ॥ १४ ॥ | करनेवालेको उसके समीपवर्ती धर्म और सत्यका रहस्य जाननेवाले लोग 'यह धर्ममय वचन बोलता है, प्रसिद्ध लौकिकन्याय बोलता है' ऐसा कहते हैं और इसी तरह इससे विपरीत धर्म यानी लौकिक व्यवहार बतानेवालेको 'यह सत्य बोलता है, शास्त्रके अनुकूल बोलता है' ऐसा कहते हैं।<br><br>ये जो जानी जानेवाली और की जानेवाली दो बातें बतायी गयी हैं- ये दोनों धर्म ही हैं। अतः यह ज्ञान और अनुष्ठानरूप धर्म शास्त्रज्ञ और अशास्त्रज्ञ सभीका नियमन करता है। इसलिये वह क्षत्रका भी क्षत्र है। अतः उसका अभिमान रखनेवाला अज्ञानी पुरुष उसके किसी विशेष रूपका अनुष्ठान करनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्ररूप किसी निमित्तविशेषमें अभिमान करने लगता है। ये ब्राह्मणादि वर्ण स्वभावतः ही कर्माधिकारके कारण हैं ॥ १४ ॥ |
आत्मोपासनकी आवश्यकता
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्ये-
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९५
ष्वेताभ्याँ हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननुक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते । अस्माद्ध्ये वात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥
वे ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। [ इन्हें उत्पन्न करनेवाला ] ब्रह्म अग्निरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण हुआ। तथा मनुष्योंमें ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण, क्षत्रियरूपसे क्षत्रिय, वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ। इसीसे अग्निमें ही [ कर्म करके ] देवताओंके बीच कर्मफलकी इच्छा करते हैं तथा उसे मनुष्योंके बीच ब्राह्मणजातिमें ही कर्मफलकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्म इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था। तथा जो कोई इस लोकसे आत्मलोकका दर्शन किये बिना ही चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक [ शोक-मोहादिकी निवृत्तिके द्वारा ] पालन नहीं करता, जिस प्रकार कि बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान किया हुआ कोई अन्य कर्म। इस प्रकार (आत्मलोकको) न जाननेवाला पुरुष यदि इस लोकमें कोई महान् पुण्यकर्म भी करे तो भी अन्तमें उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है; अतः आत्मलोककी ही उपासना करनी चाहिये। जो पुरुष आत्मलोककी ही उपासना करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता। इस आत्मासे पुरुष जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसी-उसीको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥
| तदेतच्चातुर्वर्ण्यं सृष्टम्-ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्र इति; उत्तरार्थ उपसंहारः | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चारों वर्णोंको उत्पन्न किया— ऐसा जो उपसंहार है, वह आगेके अर्थसे सम्बन्ध दिखानेके लिये है। |
२९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| यत्तत्स्रष्टृ ब्रह्म, तदग्निनैव नान्येन रूपेण देवेषु ब्रह्म, ब्राह्मणजातिरभवत् । ब्राह्मणा ब्राह्मणस्वरूपेण मनुष्येषु ब्रह्माभवत्, इतरेषु वर्णेषु विकारान्तं प्राप्य, क्षत्रियेण क्षत्रियोऽभवदिन्द्रादिदेवताधिष्ठितः, वैश्येन वैश्यः, शूद्रेण शूद्रः। | वह जो उत्पत्तिकर्ता ब्रह्म था वह, किसी अन्यरूपसे नहीं, अग्निरूपसे ही देवताओंमें ब्रह्म यानी ब्राह्मण-जाति हुआ। तथा वह ब्रह्म मनुष्योंमें ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण हुआ। इसी प्रकार अन्य वर्णोंमें विकारान्तरको प्राप्त हो क्षत्रियरूपसे इन्द्रादि देवताओंसे अधिष्ठित क्षत्रिय हुआ तथा वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ। | | यस्मात्क्षत्रादिषु विकारापन्नम्, अग्नौ ब्राह्मण एव चाविकृतं स्रष्टृ ब्रह्म, तस्मादग्नावेव देवेषु देवानां मध्ये लोकं कर्मफलम्, इच्छन्त्यग्निसम्बद्धं कर्म कृत्वेत्यर्थः। तदर्थमेव हि तद्ब्रह्म कर्माधिकरणत्वेनाग्निरूपेण व्यवस्थितम्। तस्मात् तस्मिन्नग्नौ कर्म कृत्वा तत्फलं प्रार्थयन्त इत्येतदुपपन्नम्। | क्योंकि सृष्टिकर्ता ब्रह्म क्षत्रियादिमें विकारको प्राप्त हो गया है, केवल अग्नि और ब्राह्मणमें ही वह निर्विकार है, इसलिये लोग अग्निमें ही देवताओंके बीच लोक-कर्मफल-की इच्छा करते हैं। अर्थात् अग्निसम्बन्धी कर्म करके [ उसके फलकी इच्छा करते हैं ]। उसी प्रयोजनके लिये [ अर्थात् कर्मफल-दान करनेके लिये ही ] वह ब्रह्म कर्मके आधार-भूत अग्निरूपसे स्थित है। अतः उस अग्निमें कर्म करके लोग उसके फल-की प्रार्थना करते हैं—यह उचित ही है। | | ब्राह्मणे मनुष्येषु—मनुष्याणां पुनर्मध्ये कर्मफलेच्छायां नान्या- | तथा मनुष्योंमें अर्थात् मनुष्योंके बीचमें कर्मफल पानेकी इच्छा होनेपर अग्न्यादिके कारण होनेवाली क्रियाकी |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २९७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २९७
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| दिनिमित्तक्रियापेक्षा, किं तर्हि ? जातिमात्रस्वरूपप्रतिलम्भेनैव पुरुषार्थसिद्धिः । यत्र तु देवाधीना पुरुषार्थसिद्धिः, तत्रैवाग्न्यादि-सम्बद्धक्रियापेक्षा । स्मृतेश्च—<br><br>“जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः ।<br>कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥”<br>(मनु० २ । ८७) इति । | अपेक्षा नहीं है; तो फिर क्या बात है ? वहाँ ब्राह्मणमें अर्थात् ब्राह्मण-जातिमात्रका स्वरूप प्राप्त कर लेने-पर पुरुषार्थसिद्धि हो जाती है। जहाँ पुरुषार्थकी सिद्धि देवाधीन होती है, वहीं अग्नि आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंकी अपेक्षा होती है। यही बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है—<br><br>“इसमें संदेह नहीं, ब्राह्मण अन्य [अग्न्यादिसम्बन्धी] कर्म करे अथवा न करे जपसे ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है। मित्र (सूर्य)-देवतासम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करनेके कारण अथवा सम्पूर्ण भूतोंको मित्रकी भाँति अभय देने-वाला होनेसे ब्राह्मण मैत्र कहलाता है।” |
| पारिव्राज्यदर्शनाच्च । तस्माद्ब्राह्मणत्व एव मनुष्येषु लोकं कर्मफलमिच्छन्ति । यस्मादेताभ्यां हि ब्राह्मणाग्निरूपाभ्यां कर्मकर्त्रधिकरणरूपाभ्यां यत्स्रष्टृ ब्रह्म साक्षादभवत् । | इसके सिवा [ब्राह्मणके लिये ही] संन्यासका विधान होनेसे भी [मनुष्यलोकमें उसीकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है।] अतः मनुष्योंमें ब्राह्मणत्वमें ही लोक—कर्मफलकी इच्छा करते हैं; क्योंकि जो साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्म था, वह कर्मके कर्ता और अधिकरणरूप ब्राह्मण और अग्नि-इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था। |
| अत्र तु परमात्मलोकमग्नौ ब्राह्मणे चेच्छन्तीति केचित् । | यहाँ कोई-कोई (भर्तृप्रपञ्च आदि) ऐसी व्याख्या करते हैं कि ‘अग्नि [-में हवन करके] और ब्राह्मणमें [उसे दान देकर] परमात्मलोककी इच्छा |
२९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तदसत्, अविद्याधिकारे कर्माधिकारार्थं वर्णविभागस्य प्रस्तुतत्वात्, परेण च विशेषणात्; <br><br>यदि ह्यत्र लोकशब्देन पर एवात्मोच्येत, परेण विशेषणमनर्थकं स्यात् 'स्वं लोकमदृष्ट्वा' इति। | करते हैं।' किंतु यह अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि वर्णविभागका प्रस्ताव अविद्याके प्रकरणमें कर्माधिकारका निरूपण करनेके लिये किया गया है, इसके सिवा आगेके वाक्यमें 'स्वम्' ऐसा विशेषण दिया है; यदि यहाँ 'लोक' शब्दसे परमात्मा ही कहा जाय तो 'स्व लोकमदृष्ट्वा' इस आगेके वाक्यमें 'स्वम्' यह विशेषण निरर्थक होगा। | | स्वलोकव्यतिरिक्तश्चेदग्न्यधीनतया प्रार्थ्यमानः प्रकृतो लोकः, ततः स्वम् इति युक्तं विशेषणम्, प्रकृतपरलोकनिवृत्त्यर्थत्वात्; स्वत्वेन चाव्यभिचारात्परमात्मलोकस्य, अविद्याकृतानां च स्वत्वव्यभिचारात्। ब्रवीति च कर्मकृतानां व्यभिचारम्— 'क्षीयत एव' इति। | यदि अग्निकी अधीनतासे प्रार्थना किया जानेवाला प्रकृत लोक स्वलोकसे भिन्न हो तभी 'स्वम्' यह विशेषण प्रस्तुत परलोककी निवृत्तिके लिये होनेके कारण सार्थक होगा; क्योंकि स्वरूपसे परमात्मलोकका तो व्यभिचार (भेद) है नहीं, केवल अविद्याकृत लोकोंका ही व्यभिचार है। आगेके 'क्षीयत एव' इस वाक्यसे श्रुति कर्मजनित लोकोंका स्वलोकसे व्यभिचार बतलाती है। | | ब्रह्मणा सृष्टा वर्णाः कर्मार्थम्; तच्च कर्म धर्माख्यं सर्वानैव कर्तव्यतया नियन्तृ पुरुषार्थसाधनं च। तस्मात्तेनैव चेत्कर्मणा स्वो लोकः परमात्माख्योऽविदितोऽपि प्राप्यते, किं तस्यैव पदनी- | ब्रह्मने कर्म करनेके लिये वर्णोंकी रचना की थी। वह धर्मसंज्ञक कर्म कर्तव्यरूपसे सभीका नियन्ता और पुरुषार्थका साधन है। अतः यदि उसी कर्मसे परमात्म-संज्ञक स्वलोक अज्ञात होनेपर भी प्राप्त हो जाता है तो फिर प्राप्तव्यरूपसे उसीके लिये और क्या |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९९
| संस्कृत-भाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| यत्त्वेन क्रियत इत्यत आह—<br><br>अथेति पूर्वपक्षविनिवृत्त्यर्थः; यः कश्चित्, ह वै अस्मात्सांसारिकात्पिण्डग्रहणलक्षणादविद्याकामकर्महेतुकादग्न्यधीनकमीभिमानतया वा ब्राह्मणजातिमात्रकर्माभिमानतया वा आगन्तुकादस्वभूताल्लोकात्, स्वं लोकमात्माख्यम् आत्मत्वेनाव्यभिचारित्वात्, अदृष्ट्वा—'अहं ब्रह्मास्मि' इति, प्रैति म्रियते; स यद्यपि स्वो लोकः, अविदितोऽविद्यया व्यवहितोऽस्व इवाज्ञातः, एनम्—सङ्ख्यापूरण इव लौकिक आत्मानम्—न भुनक्ति न पालयति शोकमोहभयादिदोषापनयेन । | करनेकी आवश्यकता है ? इसपर श्रुति कहती है—यहाँ 'अथ' यह पद पूर्वपक्षकी निवृत्तिके लिये है। [ क्या कहती है—] जो कोई भी इस अविद्याकामकर्मजनित तथा अग्न्यधीन कर्माभिमानके कारण अथवा ब्राह्मणजातिमात्रके कर्माभिमानके कारण आगन्तुक पिण्डग्रहणरूप सांसारिक अनात्मभूतलोकसे, अपने 'आत्मा' संज्ञक लोकको, जो आत्मस्वरूप होनेके कारण अव्यभिचारी है, 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार न देखकर ( न जानकर ) चला जाता अर्थात् मर जाता है, वह यद्यपि स्वलोक है, तो भी अविदित—अविद्यासे व्यवहित अर्थात् अस्वलोकके समान अज्ञात रहनेपर, लौकिक दृष्टान्तमें दशम संख्याकी पूर्तिके समान, इस आत्माका शोक, मोह एवं भय आदि दोषोंकी निवृत्तिद्वारा भरण यानी पालन नहीं करता। |
| यथा च लोके वेदोऽननुक्तोऽनधीतः कर्माद्यवबोधकत्वेन न भुनक्ति, अन्यद्वा लौकिकं कृष्यादि कर्म अकृतं स्वात्मनानानभिव्यञ्जितम् आत्मीयफलप्रदानेन न भुनक्ति, एवमात्मा स्वो लोकः | तथा लोकमें जिस प्रकार अननुक्त—बिना अध्ययन किया हुआ वेद कर्मादिके अवबोधकरूपसे पालन नहीं करता एवं अन्य कृषि आदि लौकिक कर्म अकृत यानी अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अपने फलप्रदानके द्वारा पालन नहीं करता, उसी प्रकार स्वलोक आत्मा अपने |
३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स्वेनैव नित्यात्मस्वरूपेणानभिव्यञ्जितोऽविद्यादि प्रहाणेन न भुनक्त्येव । | नित्य आत्मस्वरूपसे अभिव्यक्त न होनेपर अविद्यादिके विनाशद्वारा पालन नहीं करता । |
| ननु किं स्वलोकदर्शननिमित्तपरिपालनेन ? कर्मणः फलप्राप्तिध्रौव्यात्, इष्टफलनिमित्तस्य च कर्मणो बाहुल्यात्, तन्निमित्तं पालनमक्षयं भविष्यति । | **शङ्का—**किंतु आत्मलोकके साक्षात्कार (ज्ञान) के कारण होनेवाले परिपालनकी आवश्यकता क्या है ? क्योंकि कर्मके फलकी प्राप्ति तो निश्चित है और इष्ट फलका हेतु होनेवाला कर्म [स्वभावतः] अधिक होता ही है, इसलिये उसके कारण उसका पालन अक्षय हो जायगा। |
| तन्न, कृतस्य क्षयवत्त्वात्; इत्येतदाह—यदिह वै संसारेऽद्भुतवत्कश्चिन्महात्मापि, अनेवंवित्—स्वं लोकं यथोक्तेन विधिना अविद्वान्, महद्बहु अश्वमेधादि पुण्यं कर्म इष्टफलमेव नैरन्तर्येण करोति, 'अनेनैवानन्त्यं मम भविष्यति' इति, तत्कर्म हास्याविद्यावतोऽविद्याजनितकामहेतुत्वात् स्वप्नदर्शनविभ्रमोद्भूतविभूतिवदन्ततोऽन्ते फलोपभोगस्य क्षीयत एव । | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि किया जानेवाला कर्म क्षीण होनेवाला होता है। इसीसे श्रुति ऐसा कहती है—जो कोई इस संसारमें, चाहे वह आश्चर्य-जैसा महात्मा भी हो, इस प्रकार न जाननेवाला अर्थात् आत्मलोकको उपर्युक्त रीतिसे जाननेवाला नहीं है, वह इस विचारसे कि मुझे अनन्तत्वकी प्राप्ति होगी निरन्तर महान् अर्थात् बहुत-से इष्ट फल देनेवाले अश्वमेधादि पुण्य-कर्म भी करे तो भी उस अविद्वान्का वह कर्म अविद्याजनित कामरूप हेतुवाला होनेसे स्वप्नदर्शनरूप भ्रमसे होनेवाले ऐश्वर्यके समान फलोपभोगके अन्तमें क्षीण हो ही जाता है, क्योंकि उसके |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३०१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३०१
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तत्कारणयोरविद्याकामयोश्चलत्वात्, कृतक्षयध्रौव्योपपत्तिः। तस्मान्न पुण्यकर्मफलपालनानन्त्याशास्त्येव। | कारणभूत अविद्या और काम चलायमान हैं, इसलिये उस कर्मफलके क्षयकी अनिवार्यता उचित ही है। अतः पुण्यकर्मफलके द्वारा अनन्तकालतक पालनकी आशा है ही नहीं। |
| अत आत्मानमेव स्वं लोकम्—<br><br>(स्वलोकशब्दार्थ-विवेचनम्) 'आत्मानम्' इति 'स्वं लोकम्' इत्यस्मिन्नर्थे, स्वं लोकमिति प्रकृतत्वात्, इह च स्वशब्दस्याप्रयोगात्— उपासीत। स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते, तस्य किम् ? इत्युच्यते—न हास्य कर्म क्षीयते; कर्माभावादेव, इति नित्यानुवादः। यथाविदुषः कर्मक्षयलक्षणं संसारदुःखं सन्ततमेव, न तथा तदस्य विद्यत इत्यर्थः। 'मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन' इति यद्वत्। | अतः स्वलोक आत्माकी ही उपासना करे। 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' इस वाक्यमें 'आत्मानम्' यह पद 'स्वं लोकम्' इस अर्थमें है, क्योंकि 'स्वं लोकमदृष्ट्वा' इस प्रकार 'स्व' शब्दसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है और यहाँ 'स्व' शब्दका प्रयोग किया नहीं गया। वह जो आत्मलोककी ही उपासना करता है, उसे क्या होता है, सो बतलाते हैं—उसका कर्म क्षीण नहीं होता; क्योंकि [वस्तुतः] उस आत्मवेत्तामें कर्मका अभाव ही है, अतः यह कथन तो नित्यका अनुवादमात्र है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अविद्वान्के लिये कर्मक्षयरूप संसारदुःख निरन्तर रहता है, उस प्रकार इस विद्वान्के लिये उसकी सत्ता नहीं है; जैसे कि राजा जनकने कहा था "मिथिलाके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता।" |
| स्वात्मलोकोपासकस्य विदुषो | [भर्तृप्रपञ्चादि] कुछ अन्य व्याख्याकारोंका कथन है कि स्वात्म- |
३०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विद्यासंयोगात्कर्मैव न क्षीयत इत्यपरे वर्णयन्ति । लोकशब्दार्थं च कर्मसमवायिनं द्विधा परिकल्पयन्ति किल—एको व्याकृतावस्थः कर्माश्रयो लोको हैरण्यगर्भाख्यः, तं कर्मसमवायिनं लोकं व्याकृतं परिच्छिन्नं य उपास्ते, तस्य किल परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शिनः कर्म क्षीयते । तमेव कर्मसमवायिनं लोकमव्याकृतावस्थं कारणरूपमापाद्य यस्त्वूपास्ते, तस्यापरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शित्वात्तस्य कर्म न क्षीयत इति । | लोकके उपासकका कर्म ज्ञानका संयोग होनेके कारण क्षीण नहीं होता। वे कर्मसे सम्बद्ध 'लोक' शब्दका अर्थ दो प्रकारसे कल्पना करते हैं¹—उनमें एक तो व्याकृत रूपसे स्थित कर्माधीन हैरण्यगर्भ-नामक लोक है, उस कर्मसम्बन्धी व्याकृत और परिच्छिन्न लोककी जो उपासना करता है, उस परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शीका कर्म क्षीण हो जाता है। और जो उसी कर्मसम्बन्धी लोकको अव्याकृतरूपसे स्थित अर्थात् कारणरूपको प्राप्त करके उपासना करता है, उसका वह कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि वह अपरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शी है। |
| भवतीयं शोभना कल्पना न तु श्रौती । स्वलोकशब्देन प्रकृतस्य परमात्मनोऽभिहितत्वात् । स्वं लोकमिति प्रस्तुत्य स्वशब्दं विहायात्मशब्दप्रक्षेपेण पुनस्तस्यैव प्रतिनिर्देशादात्मानमेव लोकमुपासीतेति । तत्र कर्मसम- | उनकी यह कल्पना है तो सुन्दर, परंतु श्रुतिसम्मत नहीं है, क्योंकि श्रुतिके द्वारा तो 'स्वलोक' शब्दसे प्रकरणप्राप्त परमात्माका ही प्रतिपादन किया गया है। कारण उसने 'स्वं लोकम्' इस प्रकार आरम्भ कर फिर 'स्व' शब्दको त्याग कर उसकी जगह 'आत्मा' शब्दका प्रयोग करके उसीका 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' |
१. यहाँ मूलमें जो 'किल' शब्द है वह इस बातका द्योतक है कि उनकी यह कल्पना केवल तर्कके आधारपर है, श्रुतिसम्मत नहीं है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वायिलोककल्पनाया अनवसर एव । | इस प्रकार पुनः निर्देश किया है इसलिये यहाँ कर्मसम्बन्धी लोककी कल्पनाका तो अवसर है ही नहीं। |
| परेण च केवलविद्याविषयेण विशेषणात्—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" (बृ० उ० ४।४।२२) इति। पुत्रकर्मापरविद्याकृतेभ्यो हि लोकेभ्यो विशिनष्टि 'अयमात्मा नो लोकः' इति। "न हास्य केनचन कर्मणा लोको मीयत एषोऽस्य परमो लोकः" इति च। तैः सविशेषणैरस्यैकवाक्यता युक्ता, इहापि स्वं लोकमिति विशेषणदर्शनात्। | इसके सिवा आगेके "किं¹प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" इस केवल ज्ञानविषयक वाक्यसे उसे विशेषित भी किया गया है। यहाँ श्रुति 'अयमात्मा नो लोकः' ऐसा कहकर उसे पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा प्राप्त होनेवाले लोकोंसे पृथक् करती है। तथा यह भी कहा है "इसका यह लोक किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता, यह इसका उत्कृष्ट लोक है।" उन विशेषणयुक्त वाक्योंसे इस वाक्यकी एकवाक्यता होनी चाहिये, क्योंकि यहाँ भी 'स्वं लोकम्' ऐसा विशेषण देखा जाता है। |
| अस्मात्कामयत इत्ययुक्तमिति चेत्—इह स्वो लोकः परमात्मा, तदुपासनात्स एव भवतीति स्थिते, यद्यत्कामयते तत्तदस्मादात्मनः सृजत इति तदात्मप्राप्तिव्यतिरेकेण फलवचनमयुक्तमिति चेत्, | यदि कहो कि [ऐसी बात है तो] 'इससे कामना करता है' ऐसा कहना उचित नहीं है। अर्थात् यदि ऐसी शङ्का की जाय कि यदि यहाँ स्वलोक परमात्मा ही है और उसकी उपासनासे पुरुष तद्रूप ही हो जाता है, तो ऐसा निश्चय होनेपर 'उससे जो-जो चाहता है उसी-उसीकी रचना कर लेता है' इस प्रकार आत्मप्राप्तिसे भिन्न फल बतलाना उचित नहीं है— |
१. जिन हमको केवल यह आत्मलोक ही अभीष्ट है, वे हम संतानको लेकर क्या करेंगे ?
३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न; स्वलोकोपासनस्तुतिपरत्वात्; स्वस्मादेव लोकात्सर्वमिष्टं सम्पद्यत इत्यर्थः; नान्यदतः प्रार्थनीयमाप्तकामत्वात्, "आत्मनः प्राण आत्मत आशा" (छा० उ० ७। २६। १) इत्यादिश्रुत्यन्तरे यथा। | तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यह वाक्य स्वलोककी उपासनाकी स्तुति करनेवाला है। इसका यही तात्पर्य है कि सारी इष्टसिद्धि आत्मलोकसे ही हो सकती है; इससे भिन्न और कोई वस्तु माँगने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञ पूर्णकाम होता है; जैसा कि "आत्मासे प्राण है, आत्मासे ही आशा है" इत्यादि अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | सर्वात्मभावप्रदर्शनार्थो वा पूर्ववत्। यदि हि पर एवात्मा सम्पद्यते तदा युक्तः 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इत्यात्मशब्दप्रयोगः, स्वस्मादेव प्रकृतादात्मनो लोकादित्येवमर्थः। अन्यथा 'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इति सविशेषणमवक्ष्यत् प्रकृतपरमात्मलोकव्यावृत्तये व्याकृतावस्थाव्यावृत्तये च। न ह्यस्मिन्प्रकृते | अथवा पूर्ववत् यह आत्मज्ञका सर्वात्मभाव प्रदर्शित करनेके लिये है। यदि आत्मज्ञ परमात्मा ही हो जाता है, तभी 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग उचित होगा। इसका अर्थ यह है कि इस स्वरूपभूत प्रकृत आत्मलोकसे। अन्यथा प्रकृत परमात्मलोक और व्याकृतावस्था (व्याकृतरूपसे स्थित ब्रह्मलोक) की व्यावृत्तिके लिये श्रुति [ लोकशब्दका ] २'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इस प्रकार विशेषणपूर्वक उल्लेख करती। अतः यहाँ 'स्व' ऐसा प्रकृत विशेषण रहते हुए, जिसकी श्रुति कोई चर्चा नहीं करती उस पर |
१. 'तस्मात्सर्वमभवत्' इस वाक्यके समान।
२. अव्याकृतरूपसे स्थित कर्मलोकसे।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५
| विशेषितेऽश्रुतान्तरालावस्था प्रतिपत्तं शक्यते ॥ १५ ॥ | और अपर ब्रह्मके मध्यकी [ अव्याकृत नामवाली ] अवस्थाको ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ १५ ॥ |
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कर्माधिकारी जीव किन-किन कर्मोंके कारण समस्त प्राणियोंका लोक है ?
| अथो अयं वा आत्मा। अत्राविद्वान् वर्णाश्रमाद्यभिमानो धर्मेण नियम्यमानो देवादिकर्मकर्त्तव्यतया पशुवत्परतन्त्र इत्युक्तम् । कानि पुनस्तानि कर्माणि यत्कर्त्तव्यतया पशुवत्परतन्त्रो भवति ? के वा ते देवादयो येषां कर्मभिः पशुवदुपकरोति ? इति तदुभयं प्रपञ्चयति— | अथो अयं वा आत्मा। यहाँ वर्णाश्रमादिका अभिमान रखनेवाला तथा धर्मसे नियन्त्रित अज्ञानी पुरुष देवादिसम्बन्धी कर्मकी कर्तव्यताके कारण पशुके समान परतन्त्र है—ऐसा बतलाया गया है। किंतु वे कर्म कौन-से हैं जिनकी कर्त्तव्यतासे वह पशुके समान परतन्त्र होता है ? और कौन वे देवादि हैं जिनका वह कर्मोंके द्वारा उपकार करता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति उन दोनोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करती है— |
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अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाꣳस्या पिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवꣳहैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमाꣳसितम् ॥ १६ ॥
बृ० उ० २०—
३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका लोक होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और संतानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एवं जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका लोक होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। उस इस कर्मकी अवश्य-कर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है॥ १६॥
| अथो इत्ययं वाक्योपन्यासार्थः। अयं यः प्रकृतो गृही कर्माधिकृतोऽविद्वाञ्छरीरेन्द्रियसङ्घातादिविशिष्टः पिण्ड आत्मेत्युच्यते; सर्वेषां देवादीनां पिपीलिकान्तानां भूतानां लोको भोग्य आत्मेत्यर्थः; सर्वेषां वर्णाश्रमादिविहितैः कर्मभिरुपकारित्वात्। | मूलमें 'अथो' यह निपात वाक्यका उपक्रम (आरम्भ) करनेके लिये है। यह जो कर्माधिकारी अज्ञानी गृहस्थरूप शरीरेन्द्रियसङ्घातविशिष्ट प्रकृत पिण्ड है, वह 'आत्मा' कहलाता है; वह देवताओंसे लेकर चींटीपर्यन्त समस्त प्राणियोंका लोक—भोग्य है; क्योंकि वर्णाश्रमादिविहित कर्मोंके द्वारा वह सबका उपकारी है। |
| कैः पुनः कर्मविशेषैरुपकुर्वन् केषां भूतविशेषाणां लोकः? इत्युच्यते—स गृही यज्जुहोति यद्यजते, यागो देवतामुद्दिश्य स्वत्व- | वह किन कर्मविशेषोंके द्वारा किन भूतविशेषोंका उपकार करनेके कारण उनका लोक (भोग्य) होता है? सो कहा जाता है—वह गृही जो हवन और यजन करता है—देवताके उद्देश्यसे वस्तुमें स्वत्व त्यागना याग |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
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| परित्यागः, स एव आसेचनेनाधिको होमः तेन होमयागलक्षणेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन देवानां पशुवत्परतन्त्रत्वेन प्रतिबद्ध इति लोकः। | है—उसीमें जब 'आहुति देना' इतना कर्म अधिक होता है तो उसे होम कहते हैं, उस होम-यागरूप कर्मसे, उसकी अवश्यकर्तव्यताके कारण पुरुष पशुके समान देवताओंके अधीन होनेसे बँधा हुआ है—इसलिये उनका लोक (भोग्य) है। |
| अथ यदनुब्रूते स्वाध्यायमधीतेऽहरहस्तेन ऋषीणां लोकः। अथ यत्पितृभ्यो निपृणाति प्रयच्छति पिण्डोदकादि, यच्च प्रजामिच्छति प्रजार्थमुद्यमं करोति—इच्छा चोत्पत्त्युपलक्षणार्था—प्रजां चोत्पादयतीत्यर्थः, तेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन पितॄणां लोकः पितॄणां भोग्यत्वेन परतन्त्रो लोकः। | तथा जो अनुवचन अर्थात् नित्य-प्रति स्वाध्याय करता है, उसके कारण वह ऋषियोंका लोक है। जो पितृगणको 'निपृणाति'—पिण्डोदकादि प्रदान करता है और जो प्रजाकी इच्छा यानी संतानके लिये प्रयत्न करता है—यहाँ 'इच्छा' शब्द उत्पत्तिका उपलक्षण करानेके लिये है, तात्पर्य यह कि वह जो प्रजा उत्पन्न करता है, उस कर्मके द्वारा उसकी अवश्य-कर्तव्यताके कारण वह पितृगणका लोक अर्थात् पितरोंके भोग्यरूपसे उनका परतन्त्र लोक होता है। |
| अथ यन्मनुष्यान्वासयते भूम्युदकादिदानेन गृहे, यच्च तेभ्यो वसद्भ्योऽवसद्भ्यो वा अर्थिभ्योऽशनं ददाति, तेन मनुष्याणाम्; अथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति लम्भयति, तेन पशूनाम्; यदस्य | तथा वह जो स्थान और जल आदि देकर मनुष्योंको घरमें ठहराता है तथा घरमें ठहरे हुए अथवा न ठहरे हुए भी भोजनार्थी मनुष्योंको जो भोजन देता है, उससे वह मनुष्योंका लोक है; और पशुओंको जो तृण और जल प्राप्त कराता है, उससे वह पशुओंका लोक है; एवं |
३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| गृहेषु श्वापदा वयांसि च पिपीलिकाभिः सह कणबलिभाण्डक्षालनाद्युपजीवन्ति, तेन तेषां लोकः। | इसके घरमें जो श्वापद, पक्षी एवं चींटी-पर्यन्त जीव-जन्तु कण, बलि तथा पात्रोंके धोवनके उपजीवी होते हैं, उससे वह उनका लोक है। | | यस्मादयमेतानि कर्माणि कुर्वन्नुपकरोति देवादिभ्यः, तस्माद्यथा ह वै लोके स्वाय लोकाय स्वस्मै देहायारिष्टिमविनाशं स्वत्वभावाप्रच्युतिमिच्छेत् स्वत्वभावप्रच्युतिभयात्पोषणरक्षणादिभिः सर्वतः परिपालयेत्, एवं हैवंविदे 'सर्वभूतभोग्योऽहमनेन प्रकारेण मया अवश्यमृणिवत्प्रतिकर्तव्यम्' इत्येवमात्मानं परिकल्पितवते सर्वाणि भूतानि देवादीनि यथोक्तानि अरिष्टिमविनाशमिच्छन्ति स्वत्वाप्रच्युत्यै सर्वतः संरक्षन्ति कुटुम्बिन इव पशून् — “तस्मादेषां तन्न प्रियम्” इत्युक्तम्। तद्वा एतत्तदेतद्यथोक्तानां कर्मणाम् ऋण- | क्योंकि इन कर्मोंको करता हुआ यह देवादिका उपकार करता है, इसलिये जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरके लिये पुरुष अरिष्टि—अविनाश अर्थात् अपनेपनके भावकी अप्रच्युति चाहता है तथा अपनेपनके भावकी च्युतिके भयसे उसका पोषण एवं रक्षण करके सब प्रकारसे पालन करता है, उसी प्रकार इस तरह जाननेवालेका अर्थात् 'मैं समस्त भूतोंका भोग्य हूँ, मुझे ऋणीके समान इन सबका इस प्रकार अवश्य प्रतीकार करना चाहिये' इस प्रकार अपने विषयमें कल्पना करनेवालेका उपर्युक्त देवतादि समस्त भूत अरिष्टि—अविनाश चाहते हैं। जिस प्रकार कोई कुटुम्बी अपने पशुओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार अपने अधिकारकी अप्रच्युतिके लिये वे इसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं; इसीसे पहले (१।४।१० मन्त्रमें) यह कहा गया है “अतः देवताओंको यह प्रिय नहीं है [ कि लोग आत्मतत्त्वको जानें ]”। वह यह अर्थात् उपर्युक्त कर्मोंका ऋणके |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९
| वदवश्यकर्तव्यत्वं पञ्चमहायज्ञप्रकरणे विदितं कर्तव्यतया मीमांसितं विचारितं चावदानप्रकरणे ॥ १६ ॥ | समान आवश्यकर्तव्यत्व पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें विदित है तथा अवदानप्रकरणमें कर्तव्यरूपसे इसकी मीमांसा हुई है—विचार किया गया है ॥ १६ ॥ |
[प्रवृत्तिबीज-विवेचनम्]
| ब्रह्म विद्वांश्चेत्तस्मात्पशुभावात्कर्तव्यताबन्धनरूपात्प्रविमुच्यते, केनायं कारितः कर्मबन्धनाधिकारेऽवश इव प्रवर्तते, न पुनस्तद्विमोक्षणोपाये विद्याधिकार इति ।<br><br>ननूक्तं देवा रक्षन्तीति ।<br><br>बाढम्, कर्माधिकारस्वगोचरारूढानैव तेऽपि रक्षन्ति, अन्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात् । | यदि ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष कर्तव्यताबन्धनरूप उस पशुभावसे मुक्त होता है तो यह किसकी प्रेरणासे विवश-सा होकर कर्मबन्धनके अधिकारमें प्रवृत्त होता है तथा उससे मुक्ति पानेके उपायस्वरूप ज्ञानाधिकारमें प्रवृत्त नहीं होता ।<br><br>पूर्व०—पहले कहा जा चुका है कि देवगण उसकी रक्षा करते हैं ।^३<br><br>सिद्धान्ती—ठीक है, परंतु वे भी कर्माधिकारके द्वारा अपनी विषयताको प्राप्त हुए लोगोंकी ही रक्षा करते हैं, अन्यथा [यदि ऐसा माना जाय कि सभीकी रक्षा करते हैं तो] बिना किये कर्मकी प्राप्ति और कृतकर्मका नाश होनेका प्रसंग उपस्थित होगा । वे |
१. भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंका जिसमें विधान किया गया है, वह पञ्चमहायज्ञप्रकरण है ।
२. एक आहुतिकी पूर्तिके लिये लिया हुआ घृतादि हव्य अवदान कहलाता है । 'तदेतदवदयते यद्यजते स यदग्नौ जुहोति' इत्यादि अवदानप्रकरण है । अर्थात् 'जो यजन करता है यानी वह जो अग्निमें हवन करता है, वह यह अवदान करता है' इत्यादि । इसमें 'ऋणं ह वाव जायते जायमानो योऽस्ति' अर्थात् जो उत्पन्न होनेवाला है, उसे निश्चय ऋण प्राप्त होता है—इस अर्थवादद्वारा कर्मकी अवश्य-कर्तव्यताका विचार किया है ।
३. इसलिये वह नियमसे प्रवृत्तिमार्गमें ही रहता है ।
३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न तु सामान्यं पुरुषमात्रं विशिष्टाधिकारानारूढम्; तस्माद्भवितव्यं तेन, येन प्रेरितोऽवश एव बहिर्मुखो भवति स्वस्माल्लोकात्। | विशिष्ट अधिकारपर आरूढ़ न हुए सामान्य पुरुषमात्रकी रक्षा नहीं करते; अतः कोई ऐसा होना चाहिये, जिससे प्रेरित होकर वह बलात्कारसे आत्मलोकसे बहिर्मुख हो जाता है। |
| नन्वविद्या सा, अविद्यावान् हि बहिर्मुखीभूतः प्रवर्तते। | पूर्व०—अच्छा तो वह अविद्या है, क्योंकि अविद्यावान् पुरुष ही बहिर्मुख होकर प्रवृत्त होता हैं। |
| सापि नैव प्रवर्तिका; वस्तुस्वरूपावर्णात्मिका हि सा; प्रवर्तकबीजत्वं तु प्रतिपद्यतेऽन्धत्वमिव गर्तादिपतनप्रवृत्तिहेतुः। | सिद्धान्ती—वह भी प्रवर्तिका नहीं है, वह तो वस्तुके स्वरूपका आवरण करनेवाली ही है। हाँ, जिस प्रकार अन्धत्व गढ़ेमें गिरनेका हेतु होता है, उसी प्रकार यह प्रवर्तकबीजरूपताको तो प्राप्त होती है। |
| एवं तर्ह्युच्यतां किं तद् यत्प्रवृत्तिहेतुरिति ? | पूर्व०—ऐसी बात है तो तुम्हीं बताओ, जो प्रवृत्तिका हेतु है, वह क्या है? |
| तदिहाभिधीयते—एषणा कामः सः, ‘स्वाभाविकीयामविद्यायां वर्तमाना बालाः पराचः कामाननुयन्ति’ इति काठकश्रुतौ, स्मृतौ च— “काम एष क्रोध एषः” (गीता ३। ३७) इत्यादि, मानवे च सर्वा प्रवृत्तिः कामहेतुक्येवेति। स एषो- | सिद्धान्ती—वह यहाँ बतलाया जाता है—वह एषणा यानी काम है। ‘स्वाभाविकी अविद्यामें रहनेवाले मूर्खलोग बाह्य कामनाओंका अनुसरण करते हैं’—ऐसा कठश्रुतिमें भी कहा है, तथा स्मृतिमें भी “यह काम, यह क्रोध” ऐसा कहा है। मानवधर्मशास्त्रमें भी सारी प्रवृत्ति कामसे ही होनेवाली है—ऐसा कहा है।¹ |
१. अकामतः क्रिया काचिद्दृश्यते न हि कस्यचित्।
यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे ३११
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे ३११
| ऽर्थः सविस्तरः प्रदर्श्यत इह आ अध्यायपरिसमाप्तेः— | वही विषय यहाँ अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त विस्तारसे प्रदर्शित किया जाता है— |
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प्रवृत्तिके बीजभूत काम और पाङ्क्तकर्मका वर्णन
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान्वै कामो नेच्छꣳश्च नातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवꣳश्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदꣳ सर्वं यदिदं किञ्च तदिदꣳ सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥
पहले एक आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं संतानरूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एक-एकको भी प्राप्त नहीं करता तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसको पूर्णता इस प्रकार होती है-मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण संतान है और नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैववित्तको) सुनता है। आत्मा