बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 317, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे ३११
| ऽर्थः सविस्तरः प्रदर्श्यत इह आ अध्यायपरिसमाप्तेः— | वही विषय यहाँ अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त विस्तारसे प्रदर्शित किया जाता है— |
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प्रवृत्तिके बीजभूत काम और पाङ्क्तकर्मका वर्णन
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान्वै कामो नेच्छꣳश्च नातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवꣳश्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदꣳ सर्वं यदिदं किञ्च तदिदꣳ सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥
पहले एक आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं संतानरूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एक-एकको भी प्राप्त नहीं करता तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसको पूर्णता इस प्रकार होती है-मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण संतान है और नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैववित्तको) सुनता है। आत्मा